दिल या दिमाग (भाग-१)

09 अगस्त 2018   |  pradeep   (117 बार पढ़ा जा चुका है)

कहते है कि जब दिल और दिमाग के बीच किसी मुद्दे को लेकर जंग चल रही हो तो दिल की बात सुननी चाहिए ना कि दिमाग की. ऐसी ही सोच लोगो को भक्ति की तरफ ले जाती है जहाँ लोग दिमाग से काम लेना बंद कर देते है. भक्ति योग और कर्म योग दोनों ही रास्ते मुक्ति की तरफ ले जाते है और अगर हम कहे कि यदि मौत का ही दूसरा नाम मुक्ति है तो वो हर उस को प्राप्त है जिसका जन्म हुआ है या जो पैदा हुआ है. जब मुक्ति हर एक को मिलनी ही है या मौत आनी ही है तो कोई भी योग क्यों किया जाए? पूजा, उपासना, प्रार्थना, इबादत किसी से भी मौत को टाला नहीं जा सकता, तो इसका लाभ क्या है ? जब व्यक्ति की सोच इस तरह हो जाती है तो वो नास्तिक हो जाता है. आज दुनिया की बहुत बड़ी आबादी नास्तिक है, जो किसी धर्म को नहीं मानती. चीन के 90 सदी लोग नास्तिक है, जापान और कोरिया में भले ही मरने पर बुद्धिष्ट तरीका अपनाये या ईसाई, पर आज का जापानी और कोरियन किसी भी धर्म में विश्वास नहीं रखता. अमेरिका, यूरोप कितने लोग है जो चर्च जाते है या प्रार्थना में शामिल होते है? सबसे ज्यादा धार्मिक लोग अरब देशो और भारतीय उपमहाद्वीप के लोग है.यही कारण है कि इन्ही देशो में अमीरी गरीबी की असमानता दूसरे देशो से ज्यादा है. धर्म के नाम पर हत्याएं इन्ही देशो में सबसे ज्यादा है. कोई धर्म युद्ध लड़ रहा है तो कोई जिहाद कर रहा है. सब धार्मिक हत्यारों के अपने तर्क है और वो उससे हटने को तैयार नहीं है. (आलिम)

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