दिगपाल (भाग-१)

11 अगस्त 2018   |  pradeep   (55 बार पढ़ा जा चुका है)

दिगपाल, मेरे बचपन का साथी था, दोस्त था या यूँ कहे कि वो मेरा मुण्डू(बेबी सिटर) था. दरअसल दिगपाल हमारी मौसी का नौकर था, उसकी उम्र कितनी थी मैं नहीं जानता पर शायद 12 या 14 साल का रहा होगा. पहाड़ी था या नेपाली ये भी मुझे नहीं पता पर शायद वो गोरखा था. उस ज़माने में लोग पहाड़ी इलाको या नेपाल से छोटे बच्चे घरों में काम करने के लिए लाया करते थे, जिन्हे पहाड़ी नौकर कहा जाता था. आज के परिवेश में यह अपराध है, और इस तरह किसी का संबोधन करना भी अपराध की ही श्रेणी में आता है, पर सवाल आज भी यही है कि समाज के कमज़ोर वर्गो पर अत्याचार आज भी बरकरार है. भले ही कानून हो पर उसकी परवाह कौन करता है. गरीब क्षेत्रों से आये लोगो की दशा आज भी वैसी ही है. बिहार या उत्तर प्रदेश से काम की खोज में आये लोगो की दशा दिल्ली या मुंबई जैसे बड़े शहरो में आज भी दयनीय हैं. आज भी कितने पहाड़ी या नेपाली घरों में चौकीदारी का काम कर रहे है, आज भी छोटे छोटे बच्चों को ढाब्बे पर काम करता देखा जा सकता है. लेकिन दिगपाल की दशा ऐसी ख़राब नहीं थी वो मौसी के घर में काम ज़रूर करता था पर परिवार के सदस्य की ही तरह रहता था, घर का काम खत्म कर वो मुझे ले जाता और कभी छत पर तो कभी बाहर चबूतरे पर मेरे साथ खेलता. मेरी आदत थी खेलते खेलते सो जाने की, और मैं ऐसी जगह ढूंढता खेलने की जहाँ कोई मुझे ढूंढ ना सके. मौसीजी के कमरे में पलंग के नीचे , घर में कोठे( छोटा सा स्टोर रूम) के अंदर. दिगपाल को मेरे इन जगहों का पता होता था. जब भी घरवाले मुझे ढूंढते तो दिगपाल ही मुझे ढूंढ निकालता. एक रोज़ दिगपाल बाहर सामन खरीदने गया हुआ था और घरवाले मुझे ढूंढ रहे थे, जब मुझे मौसी के घर में या पड़ौस के घरो में नहीं ढूंढ पाए तो पुलिस में मेरे खोने की रपट लिखवा दी. दिगपाल जब घर आया और उसे पता चला कि घरवाले मुझे ढूंढ रहे है तो उसने झट से मुझे ढूंढ निकाला, क्योकि मैं बड़ी मौसी के घर में उनके पलंग के नीचे सो गया था. जब हमने घर बदला तब भी वो सामान खरीदने के बहाने हमारे घर आ जाता और मुझे छत पर ले जाकर मेरे साथ खेलता. मुझे याद है कि जब हमने घर बदला मेरे पैर की हड्डी टूट गई थी और प्लास्टर चढ़ा हुआ था, मैं चल फिर नहीं पाता था, इसलिए मेरे खेलने के लिए कबूतर पाल लिए थे जिन्हे छत पर दड़बे में रखते थे. दिगपाल मुझे गोद में छत पर ले जाता और देर तक कबूतरों और मुझसे खेलता. फिर अचानक उसका आना जाना बंद हो गया. मैं छोटा था इसलिए नहीं जानता था कि उसका आना जाना क्यों छूट गया. जब कुछ बड़ा हुआ तो यही जान पाया कि वो फ़ौज़ में भर्ती हो गया. काफी साल बाद जब वो छुट्टियों में आया तो मौसीजी से मिलने आया, तब हमारे घर भी आया ,तब तक मैं काफी बड़ा हो चूका था स्कूल जाने लगा था और शायद वो भी जवान हो गया था शक्ल पहचान में नहीं आती थी, और उससे बात करने में भी शर्म आती थी. कुछ देर घर में बैठ कर चाय-नाश्ता कर वो चला गया और फिर उसके बाद उसकी कोई खबर नहीं आई.

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