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मीरा - मेरी यात्रा

मीरा - मेरी यात्रा

  • लेखक - मंजू रानी
  • भाषा - हिंदी
मात्रा  

रु 300


संक्षिप्त विवरण

साहित्य में मनुष्य की बुद्धि और भावना इस प्रकार मिल जाती है जैसे धूप-छांही वस्त्र के दो रंगों के तार, जो अपनी-अपनी भिन्नता के कारण ही अपने रंगों से भिन्न एक तीसरे रंग की सृष्टि करते हैं। हमारी मानसिक वृत्तियों की ऐसी-सामंजस्यपूर्ण एकता साहित्य के अतिरिक्त और कहीं संभव नहीं। उसके लिए न हमारा अन्तर्जगत त्याज्य है और न बाह्य, क्योंकि उसका विषय सम्पूर्ण जीवन है, आंशिक नहीं। मंजु रानी की स्वाध्याय एवं साहित्यिक विकास यात्रा का साक्षी बनने का सद्भाग्य मुझे मिला है। कृष्ण भक्ति शाखा एवं मीराबाई में इनकी विशेष रुचि रही है। व्यथा, वेदना एवं करुणा इनके जीवन-पथ पर छाये रहे, फिर भी 'कांटों में भी हंसते रहना और पथरीले पथ पर बढ़ते रहना' मंजु का जीवन-मंत्र सा रहा। किसी अज्ञात शक्ति ने इन्हें मीराबाई तक उचित रूप में पहुंचाकर यह कृतित्व सार्थक कराया है। समानुभूति का ऐसा प्रतिफल अपने आपमें मूल्यवान है। इस पुस्तक का लगभग एक चैथाई अंश मीराबाई का व्यक्तित्व निरूपण एवं मूल्यांकन प्रस्तुत करता है तो शेष इनके कृतित्व का सुचारु अध्ययन अंकित करता है। इनमें काव्य-विवेचन तथा पद्य-शिल्प पर अध्येता का विशेष बल देना उचित ही है। सृजन के मूल में प्रवहमान अंतःप्रेरणा (inspiration) की समृद्धि इनमें जन्मजात है तथा उसे परिपोषित करने वाला सघन पर्यावरण इन्हें आलिंगित करता-सा प्रतीत होता है। मंजु रानी ने जोधपुर और जयपुर निवास के दौरान इसका बखूबी अनुभव किया है ...।

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