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कलाम को सलाम

कलाम को सलाम

  • लेखक - मंजू रानी
  • भाषा - हिंदी
मात्रा  

रु 200


संक्षिप्त विवरण

मलूकदास, भक्तिकाल में ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रमुख कवि और रचनाकार थे । उनका भक्तिकालीन निर्गुणवादी भक्त कवियों में प्रमुख स्थान है। वे रामानंदी संप्रदाय के आचार्य थे। उनमें जन्मसिद्ध चमत्कारिता व विलक्षण साधुता थी। उनके अंदर विश्व कल्याण की भावना कूट-कूट कर भरी थी। उन्होंने अपनी काव्य रचनाओं के द्वारा देशभर में सत्यम, शिवम, सुंदरम की अलख जगाई। आजीवन संपूर्ण सृष्टि को भगवत स्वरूप मानकर संत प्रवर उसकी तन-मन से सेवा में वे जुटे रहे। संत मलूकदास को उनके पिता ने जीविकोपार्जन हेतु कंबल के व्यवसाय में लगाया, परंतु उसमें उनका मन नहीं रमा। वह संतों और निर्धनों को कंबल मुफ्त में ही दे दिया करते थे। उनके पास जो भी याचक आता था, उसे वे निराश वापस नहीं करते थे। वह अभ्यागतों की यथाशक्ति अन्न-वस्त्र से सेवा किया करते थे। वे जब संतों की सेवा करते थे, तो उनके प्रताप से पहले से ही मौजूद वस्तुएं शतगुणित हो जाती थीं। वह एक टिक्कर में से ही लाखों व्यक्तियों को प्रसाद दे दिया करते थे। उनके भंडार में कभी भी किसी चीज की कमी नहीं होती थी। उन्होंने अनगिनत निर्धन कन्याओं के हाथ पीले करवाए। अनेक विधवाओं का पालन-पोषण किया। गांव में जब प्लेग फैला, तो प्लेग पीडि़तों की अहर्निश सेवा की। वह अपने आश्रम में कोढ़ी व्यक्तियों को भी प्रश्रय देकर उनके घावों की मरहम-पट्टी कर दिया करते थे। उन्होंने व्यापक जनहित में निजी खर्च से सड़कों का निर्माण कार्य तक कराया। वस्तुतः वह निष्काम भाव से परमार्थ में लगे रहे। बाबा मलूकदास मूर्ति पूजा और आडंबरों के घोर विरोधी थे। उनका मानना था कि दूसरे व्यक्तियों की पीड़ा को जानना और उसे दूर करना ही सच्ची सेवा, सच्चा धर्म है। यही सच्चे संत व पीर की पहचान है।

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