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लौट आना सिम्मी

लौट आना सिम्मी

  • लेखक - चन्द्र विजय प्रसाद 'चन्दन
  • भाषा - हिंदी
मात्रा  

रु 200


संक्षिप्त विवरण

'राजमहल की श्रंखलाबद्ध पहाडि़याँ' मेरी स्मृतियों में इस कदर समाई है कि मैं चाहूँ तो भी इसे कुरेदकर मिटा नहीं सकता, मेरे स्वप्न संसार की सुखद अनुभूतियाँ भी हैं वहीं मेरे अंतस अंतहीन वेदना का अमिट प्रतीक भी ..! नहीं जानता इसे कैसे अभिव्यक्त करूँ, कहते हैं प्रथम प्रेम का बिरवा जब अंकुरित आकृति लिए दृष्टिगत होता है तो यह सर्वोत्तम क्षण होने के साथ-साथ अत्यंत सुखद होता है जिसे अभिव्यक्त कर पाना बहुत मुश्किल -सा होता है ...वहीं प्रखर सूर्य की प्रदीप्त किरण से सम्पर्कित होने पर वही विरवा जब कुम्हला जाता है तब मन में तिरते एहसास ..विषाद की अंतर्छाया को प्रकट करना संभव नहीं जान पड़ता है, वैसे ही राजमहल की श्रंखलाबद्ध पहाडि़यों की अनुभूति आज भी बसी है मेरे मन में ---सहज कहूँ तो राजमहल की श्रंखलाबद्ध पहाडि़याँ अपने नयनाभिराम दृश्यावलियाँ, नैसर्गिक सौन्दर्य के कारण यद्यपि मेरे अंतस बसा ही था पर इससे इतर यहाँ जीवन की कतिपय त्रासद कहानियाँ अंतर्भुक्त भी रही हैं जो किशोरवय के प्रेम के प्रस्फुटन और उसके अंत से जुड़ कारुणिक कथानक प्रस्तुत करते हैं .... 'लौट आना सिम्मी' सिर्फ कथानक ही नहीं अपितु विषादयुक्त, अकालग्रस्त प्रेम की कारुणिक पृष्ठभूमि भी है ... जिसे भोग रहा हूँ प्रतिक्षण ....., मैं कथानक के साथ न्याय कर पाऊँगा या नहीं, यह तो नहीं जानता किन्तु सत्य है की प्रेम कभी मरता नहीं, अभिव्यक्त करूँ तो नैसर्गिक प्रेम की दशा ही कुछ ऐसी थी कि 'क्षणभर' के लिए उसका दिख जाना ही सदियाँ जी लेने के बराबर था..... भले ही आज आज पृष्ठांकन थे परिदृश्य में ना हो और ना ही मानस-पटल पर स्वरूप ही शेष बचा हो किन्तु मेरे अन्दर कथानक यथावत बना हुआ है मानो यह मेरा वर्तमान ही हो ...! - चन्द्र विजय प्रसाद 'चन्दन'

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