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बूँद  बूँद गंगाजल

बूँद बूँद गंगाजल

  • लेखक - डॉ. भावना तिवारी
  • भाषा - हिंदी
मात्रा  

रु 100


संक्षिप्त विवरण

अब 200 नहीं मात्र 100 रूपए में , डिस्काउंट सीमित समय तक ही 


गीतों के क्षेत्र में कवयित्री डॉ. भावना तिवारी का नाम अनजाना नहीं है। अपने गीतों के माध्यम से उन्होंने साहित्याकाश में सशक्त उपस्थिति दर्ज करायी है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और वेबपत्रिकाओं में भी भावना जी के गीत निरन्तर प्रकाशित होते रहते हैं। सद्यः प्रकाशित गीत-संग्रह ‘बूँद-बूँद गंगाजल’ उनकी पुष्ट लेखनी का ही प्रमाण है। गीत-नवगीत लेखन और प्रस्तुतीकरण में भावना जी का एक अलग ही मिजाज व अंदाज है। जीवन के उन तमाम खट्टे-मीठे पलों को बहुत ही शालीनता के साथ उन्होंने गीतों में सँजोया है, जिनके बिना जीवन की सच्ची अभिव्यक्ति सम्भव नहीं है। ये गीत सृष्टि के प्राण हैं। गीत लय एवं प्रवाह हैं।


हिन्दी साहित्य की सर्वाधिक खूबसूरत विधाओं में गीतों का, कोई सानी नहीं है। गीत सृष्टि के प्राण हैं, तो साहित्य बगैर गीतों के लयविहीन और सौन्दर्यहीन हो जायेगा। दुनिया की कोई भी भाषा हो, उसके साहित्य का सर्वाधिक सबल पक्ष गीत ही हैं। समर्थ गीत जन-जन की धमनियों में अनवरत् अनन्त काल तक प्रवाहित होते हैं। साहित्य की आम-जनमानस में लोकप्रियता का प्रमुख आधार गीत ही होते हैं। कवि की कलम से निकले गीत जनमानस के कण्ठ में रच-बस जाते हैं। ये गीत समाज को सदियों तक प्रेरणा देते हैं और उसका रंजन-अनुरंजन भी करते हैं। 


आसान नहीं होता इन गीतों का सृजन। हृदय जब वेदना से तरल हो जाता है, मस्तिष्क आंदोलित हो उठता है, धैर्य जवाब दे देता है, साहस अपने चरम पर होता है और लेखनी कठिन साधना करती है, तब गीत का सृजन होता है। गीतकार डॉ. भावना भी स्वीकार करती हैं- आहत होकर, दृग-कोरों से स्वप्न विलग रहता है। अथक साधना अभिलाषा की व्यर्थ विहग करता है। अर्थ बदल जाते जब पल में शब्द सजग जगता है। तब जाकर जीवन-पृष्ठों पर गीत नया रचता है। (शब्द सजग जगता है, पृ. ७४ व ७५) लयात्मकता गीतों की पहचान होती है और इसके अभाव में गीत कुंद हो जाते हैं। ‘बूँद-बूँद गंगाजल’ के गीतों की एक विशिष्टता यह भी है कि इसके अधिकांश गीतों का प्रवाह बहुत ही तीव्र है, ठीक वैसे ही जैसे माँ गंगा अपने उद्गम स्थल गंगोत्री से आगे की ओर प्रवाहित होती हैं। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि इन गीतों की रचयिता स्वयं गायन में भी परिपक्व हैं। ऐसे में माँ इरा की कृपा इन गीतों को धारदार भी बनाती है और वेदना के साथ दार्शनिकता भी परिलक्षित होती है- बुझे चिरागों से मत पूछो उन्हें चाह क्यों रही भोर की। मुकुट विजय का बँधा जहाँ से हार गये क्यों उसी छोर से। देखा साथ जनम के मिटना सजने के ही साथ उजड़ना। (खुशियों को पाने की धुन में, पृ. ९५) ऐसा भी देखा गया है कि वेदना और व्यक्तिगत अनुभूति के गीतों को पढ़ने के साथ ही कुछ लोगों की दृष्टि सतह तक ही सीमित रह जाती है। ऐसे में पूर्वाग्रह से मुक्त होना पड़ेगा। 


कई बार जीवन की यथार्थता को रचनाकार के व्यक्तिगत अनुभवों से भी समझा जा सकता है। इस स्तर पर जीवन का यथार्थ-बोध स्वतः परिलक्षित होने लगता है- आज सियन फिर खुलने को है टूटे बखिये सिलते-सिलते। सौ पैबंद टँकी है चादर उससे दूना अंतस् में। (पृ. ५२) यह जीवन का यथार्थ है और वह मर्म, जिसे अनुभवों से ही जाना जा सकता है। कुछ लोग इन सन्दर्भों को केवल रुदन कहते हैं। ऐसे लोगों को मालूम होना चाहिए कि जीवन का आरम्भ ही रुदन से होता है। आत्मिकता के सामाजिक सरोकार भी होते हैं। भारतीय संस्कृति में दाम्पत्य-जीवन की अपनी ही रोचकता है। आश्रम व्यवस्था में इस गृहस्थ आश्रम को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। गृहस्थ आश्रम से ही अन्य आश्रमों का विस्तार और उत्थान सम्भव है। यही कारण है कि इसे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ, दोनों कहा गया है। गौतम धर्मसूत्र(९, १) में कहा गया है कि इस आश्रम में पति और पत्नी एक-दूसरे..

मधुसूदन दीक्षित
14 दिसम्बर 2016

अति उत्तम

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