अंतर - व्यथा

08 जून 2019   |  P N misra

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एक वृद्ध की अंतर -व्यथा !


मेरी चिंता, मेरा मरना नहीं,
मेरे बाद, तुम्हारा जीना है,
संबंध न होगा बाकी कोई
बच्चों ने भी इसको छीना है ।

बदले मौसम, बदली धारा,
बदले जीवन के दर्शन भी,
दे दे के थपेड़े बदल दिया
इस कालचक्र ने यह तन भी।

बदलीं परिपाटी और रिवाज़,
बदले हैंं लोग अब चिंतन से,
जो कभी रहे प्रांगण-तुलसी
वे आज प्रताड़ित यौवन से।

सलवटें लिए पैरों पर तुम
खुरदुरी धरातल पर कैसे
बोलो,चल पाओगे साथी!
काग़ज़ हो बवंडर मे जैसे ?

जितनी मिलती, उतनी रखना
साँसों को, विकलित मत करना,
मुझे, सूर्य - रश्मि मे पाओगे
अभिसार श्वास देकर करना।

तुम नेत्र निमीलित कर लेना
और छूना मुझको आसपास
मै तब तक मोक्ष नहीं लूँगा
जब तक ना हो तुम संग प्रवास ।

- प्राणेन्द्र नाथ मिश्र

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