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04 मार्च 2020   |  असग़र वजाहत

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चंद्रभान 'ब्राह्मण' (1574-1662) फारसी के उन कुछ भारतीय कवियों में हैं जिन्हें इरान में भी मान्यता दी जाती है . लाहौर के सूबेदार अफजल बेग 'ब्राह्मण' के फारसी ज्ञान से इतना प्रभावित हुए थे कि उन्होंने 'ब्राह्मण' को शाहजहां के सामने पेश किया था. सम्राट ने ब्राहमण को 'फारसी जाने वाले हिंदू' और राय की उपाधिया़ं दी थीं. शाहजहां ने ब्राह्मण को दरबार में अपना विशेष सचिव और इतिहासकार नियुक्त किया था . 'ब्राह्मण' ने दारा शिकोह के संस्कृत से फारसी अनुवाद 'प्रोजेक्ट' में भी काम किया था . ब्राह्मण का एक फारसी शेर बहुत अर्थपूर्ण है जो युगीन सहिष्णुता का परिचय भी देता है -

बेबिन करामते बुतखान-ए-मरा ऐ शैख़
के चूं खराब शुवद खान-ए-ख़ुदा गर्दद

ऐ शैख़ मंदिरों की करामात (चमत्कार) देखो
ये जब खराब (तोड़ दिए जाते हैं ) हो जाते हैं तो ख़ुदा का घर (मस्जिद) बन जाते हैं

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