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एक टुकड़ा चाँद

13 मार्च 2017   |  गोविन्द सिंह

(0 उत्तर)

एक टुकड़ा चाँद की ख्वाहिश दिल में है आज।
वक्त का सितम है,चाँद तो पूरा हाथों में था।।

कतरा-कतरा प्यासी आरजुओं में जी रहे है आज।
तबस्सुम होटों का तेरा ,मेरे लबों के करीब था।।

फरियाद कर सुकूँ-ए-दिल तलाश करते है आज।
कभी गुलशन का यह मुसाफिर हमराहों में था।।

तकदीर के लिखे बेबस किस्सों का बयाँ हूँ आज।
कभी जुल्फों के साये,सांसों की सरगम में था।।

हक हासिल है ,गुजरे रात उनकी बाँहों में आज।
रहमत से बेजार हूँ,जिन्दगी का तलबगार में भी था।।
गोविन्द सिंह "सुरेन्द्र"

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