जोगी बनना कहां आसान है ?

आसान नहीं है ज़िंदगीजीने का तरीका सीखलाना.आसान नहीं किसी कोसही राह दिखाना.आसान नहीं है खुद को भी बदलना, कुछ ख़्वाहिशोंको छोड़ना, कुछ सुविधाओं को त्यागना.त्याग की अग्नी में तपना औरउम्मीद के दीपक जलाना.धूप, बारिश, और ठंडको सहना.होंठो पर शिकायत कम और समाधाननिकालना.हां सचम



छंद ॒ चौपाई

सहज वचन बोली कर जोरी।चञ्चल चितवन चन्द्र चकोरी।मन अनंग रति प्रेम पियासा।भाव विभाव सहज दुर्वासा।चन्द्र योग द्वय लखि विज्ञानी।पूर्वोत्तर साहित्य भवानी।।अकथनीय गुण बरनि न जाई ।शब्द विशेष समय प्रभुताई।अवसर परम पुनीत सुहावन lशब्द विशेष शेष मनभावन llपावन दिवस सुहावन कैसे ?प्रेम सुमित्र चित्र लखि जैसे ।lशंख



वो भी क्या बचपन के दिन थे

वो भी बचपन के क्या दिन थेजब हम घूमते थे और खुस होते थेतब हम रोते थे फिर भी चुप होते थेना वादे होते थे ना शिकवे होते थेबस थोड़ा लड़ते थे फिर मिलते थेवो भी क्या बचपन के दिन थेतब सब कुछ अच्छा लगता थाचाहे जो हो सब सच्चा लगता थागांव की गालिया नानी के यहाँ अच्छा लगता थाना झूठ था ना फरेब था एक दूसरे की रोटिय



सनातनी विधाता छन्द

सनातनी विधाता छन्द===============================१२२२ १२२२ १२२२ १२२२नज़ारे देखकर सावन बरसने मेघ आते हैं lशराफ़त देखकर उनकी तड़पते लोग जाते हैंllइमारत यह खड़ी कैसे पसीनें खून हैं उनके ,कयामत देखती दुनियाँ शराफ़त भूल जाते हैंllनज़ाकत वक्त का देखो कहर ढाते रहे नित दिन,तवायफ़ बन लुटी शबनम ग़रीबी को भुना



छन्दस नगरी

पावन दिवस सुहावन कैसे ?प्रेम सुमित्र चित्र लखि जैसे ।अवसर परम पुनीत सुहावन शब्द विशेष शेष मनभावन पावन प्रेम सनेह में,आनन्दित हरि गेह।चंदन वन सुरभित हुआ,पाया साधु सनेह। राजकिशोर मिश्र 'राज' प्रतापगढ़ी



रोला छंद

रोला- रोला छंद दोहा का उलटा होता है l विषम चरण में ग्यारह मात्रा एवं सम चरण में तेरह मात्रा के संयोग सेनिर्मित [११+१३=२४ मात्रिक ] लोकप्रिय रोला छंद है l रोला छंद में ११,१३ यति २४ मात्रिक छंद है दो क्रमागत चरण तुकांत होते हैं काव्य रम



जीवन साथी

प्रकृति में भांति-भांति के रंगबिखेरमन को मेरे- छोड़ दिए प्रभुसादामनमोहक संध्या हो या सुहानी भोरप्रिये बिन न रखना कभी मुझे तुम आधाडॉ. कवि कुमार निर्मल©®



देश भक्ति गीत नीतेश शाक्य अजनबी

एमां मेरी यादों को, दिल में बसा लेना| अब जाता है लड़ने को, ये देश भक्त दीवाना| विजयपाकर के ही आए, बस इतनी दुआ देना| ऐ मां मेरी यादों को दिल में बसा लेना|<!--[if !supportLineBreakNewLine]--><!--[endif]-->हैदिल में मां मेरे, सरहद के बसे छाले| ये जख



लोकतंत्र .......?

कैसा है ये लोकतंत्र ?जहाँ जनता है, ओछी मानसिकता और भ्रष्ट राजनीति की शिकार !यहाँ हर दिन नया मुद्दा , मुद्दे पर बहस होती है ,मरती है तो केवल जनता , राजनीति आराम से सोती है। त्रस्त हो चुकी है जनता , अवसाद की शिकार, मासूम जल रहे हैं या जला दिए जा रहे हैं। इंसानियत को गिरता देखकर भी हम गूंगे , बहरे ब



सतरंगी थी जिंदगी

दोहावली मार्गशीर्ष की ठण्ड में , प्रियतम गए विदेश lपूस माघ रोता फिरे, फागुन दे सन्देश ll सतरंगी थी जिंदगी , सात वचन के साथ l मन की रंगत ले गए , मुझको किया अनाथ llसधवा मन विधवा हुआ ,कर



नीतेश शाक्य अजनबी

वर्ण व्यवस्था-4जाति पांति मेंबांट दिया, इन्सान बना अछूत से।मानव को सम्मान नहीं,पवित्र पशु का मूत रे॥ पहनने को कपडे नहीं मिलते, पानी नहीं तालाब से।भूख प्यास से मरते हैं, ये कैसा हिन्द का हाल रे॥ मान नहीं सम्मान नहीं, वहांकैसे जिंदगी जीते



जीने की कला

हां दर्द सहना भी एक कला है। गम बर्दाश्त कर लेना भी एक कला है। खुद नाखुशी के दौर में रहकरदूसरों से ना जलना भी एक कला है। छिपकर रोना भी एक कला है । अंधेरे में भी जुगनू बनकर जीनाएक कला है। कहती है अगर खुदगर्ज़ दुनिया तोकहने तो कहने दो। क



मधुधवर्षण

*मधुवर्षण* अंबर में मेघों को देखो लिए हाथ में प्याले हैं। रवि,शशि दोनों दिखते छिपते सब पी कर मतवाले हैं। सभी देव पीकर लड़खाते देखो कैसी गर्जन हो रही। देखो सखी मधुवर्षण हो रही। अंबर में ज्यों लुढ़का प्याला तरु पतिका से मदिरा टपके। वर्षों से आश लगाऐ बैठा प्यासा चातक रस को झपके। उसी रसो में डूबी लतिक



प्याज में लगी आग

"प्याज में लगी आग"सात्विक हो आहारतनिक लो फलाहारठप भले हो व्यापारसुस्वागत् है सरकारसफैद या काली टोपीसरकार होती है मोटीतामसिकों की किस्मत खोटीराजसिक भी खाए दाल रोटीदो रुपये चावल किलोएक रुपया आंटा जीलोआलु राजा- "सदाबहार"थूको प्याज नहीं आहारऋषियों से करलो प्यारभगवान् खड़ा तेरे द्वारडॉ. कवि कुमार नि



मानव महा प्रयाण

मापनी- 221 2121 1221 212 (ताराजराजभासलगाराजभालगा) मिश्रितगीता क़ुरान प्रेम ज़रा जान लीजिएlमानव महा प्रयाण विधा ज्ञान लीजिएllदुनियाँ अजीब मित्र मकड़ जाल में फँसी,माया महल विशाल सुधी ठान लीजिएlधरती वियोग अम्बरविधना विचार है,नदियाँ मिले समुंदर स्वर मान लीजिएlमन मापनी विचित्र सखे धर्म वीरताकायर विचार धर



बसे आँख में श्याम सुंदर हमारेl

मापनी--- १२२, १२२, १२२, १२२बसे आँख में श्याम सुंदर हमारेl सखी प्रीति पावन समुंदर सहारेl बसाया हिए ज्ञान गीता विधाता- सुधा सार संसार अंदर तुम्हारेl राजकिशोर मिश्र'राज' प्रतापगढ़ी



बिना महिष गौ कहाँ दही है

मापनी - १२१२२ 12122=============================समझ नहीं है यही सही है lबिना महिष गौ कहाँ दही है llकरें मिलावट जहाँ विदेशी -कहाँ सुखी वे , जगत वही है llगजल लिखूँ मैं कहाँ जहाँ में ,सखे सिखाते विधा यही है llमहा मिलन मन विधा सुसंगम ,सुरभि सुधा ऱस सकल मही है llनहीं लिखे हम कभी कलम से ,कहाँ सुभाषित धरा



छन्द रूप घनाक्षरी

रूप घनाक्षरी=आठ आठ आठ आठ , छन्द रूप घनाक्षरी,लघु दीर्घ यति गति, छ्न्द में प्रवाह सार ।शब्द भावना विधान , अंत गाल गुरु लघुशोध शोध वर्ण लिख, बत्तीस तुकांत प्यार ।सार प्यार देख कर, यामिनी द्रवित हुईचाँद रोहिणी नक्षत्र , पत्र पत्रिका विचार।रोहिणी सुअर्थ लाल , पाँच तारिका समूहदक्ष की सुता प्रबल, चंद्र प्



कृपाण घनाक्षरी [अंत्यानुप्रास ]

कृपाण घनाक्षरी [अंत्यानुप्रास ]कृपाण अंत्यानुप्रास , छ्न्द गेयता विकाश, यति गति हो प्रवाह, आठ चौगुना विवेक।वर्ण वर्ण घनाक्षरी, कवित्त चित्र चाल से, अंत गाल गुरु लघु, भाव भावना प्रत्येक।अनुप्रास पाँच पुत्र, छेक वृत्य श्रुत्य अंत्य, संग में लाटानुप्रास , छ्न्द अलंकार ने



आहत मानवता

"आहत मानवता"यह सदी भी यूँ हींव्यतीत हो आदतन चिढ़ायेगी।माँ क गोद सूनी कीसूनी हीं रह जीभ बिलाएगी॥सपूतहीन बंजर हींभूमि यह रे रह जाएगी।अहिंसा के नावेंबली रोज चढ़ाई जायेगी॥सत्यवादिता पर मिथ्या कीहवि आहुति बन राख बनेगी।सदाचारियों पर चापलूसी कीसरकार कल थी, आज चलेगी॥हाहाकार चहुदिसि व्याप्त,"त्राहिमाम्" गुँजा





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