जिंदगी माँग ले।

जिंदगी माँग ले।हम तो यारा एवन साइकिल के, तू माँग करे, कार फरारी की। ऐसा युग जिसमे, इंसान, इंसान से डरे कोरोना महामारी से। अपने अपने साधन खोज लो, न डिमांड करो जागवारा की।आदमी की कीमत से ज्यादा, गैस तेल पानी महंगा हो गया।इस दौर के वायरस से, अपना, अपने से पराया हो गया।इस मौत के तांडव से, जीवन देने वाल



मोरे पिया की चिट्ठी आई है

हट री सखी, न कुछ बोल अभी, सुन तो सही वह टेर भली,कर जोड़ तोसे विनती करूँ, तोहे तनिक देर की मनाही है,तू ठहर यहीं, कहीं जा नहीं, झटपट फिर मैं आ रही यहीं,न चली जाए वह डाक कहीं, मोरे पिया की चिट्ठी आई है।चिठिया पाते ही अपने सजन की, उसे हृदय से लगाऊँगी,धक-धक करेगो जियरा ऐसे



विश्वास की चादर

विश्वास की चादर फैला, उस पे ईमानदारी को बैठा, इतिहास बदल दिया उसने भारत का है।वर्षों से विश्वभर में जो स्थिति हमारी थी,आज पूरे विश्व में वो साख देश ने कमाई है।स्वच्छता का संदेश फैला जनमानस में,गांव गांव गली गली आज साफ सुथरी है।भ्रष्टाचार ,काली कमाई ,बेईमानी,कामचोरी,नह



कृष्ण सुदामा मिलन

आरोहण- अवरोहण अति दूभर,जल-थल-नभ है ओत-प्रोत,समय की यह विहंगम,दहकती ज्वाला हैअंध- कूप सेखींचनिकालोहे प्रभु शीध्र,अकिंचन मित्र आया है!कृष्ण! तेरा बालसखा आया हैधटा-टोप अंधेरा, सन्नाटा छाया हैअन्धकार चहुदिस, मन में तम् छाया हैगोधुली बेला की रुन- झुन रुन- झुन,मनोहर रंगोली, दीपों की माला हैदीर्ध रात्रि का



तुम

मैंने तुम्हें सपने में देखा, अब तुम्हें देखने का, यही तो एक जरिया बचा है। इन दिनों... अब तुम तो हमें देखने या मिलने से रहें। भूलने की आदत जो है तुम्हें। खैर ! अब तुम्हें लेकर बुरा भी क्या मानें? क्योंकि उसके लिए भी, हक‌ जो ढूंढने पड़ेंगे हमें। हां, आजकल तुम सपने में भी, मोबाइल में नजरें गड़ाए हुए द



कई राज ऐसे कई जख्म ऐसे

कई राज ऐसे कई जख्म ऐसे जीवन की एक कहानी प्रकाशित न हो जैसे कई दर्द ऐसे कई ख्वाब ऐसे अपने ही उजाड़े हो एक बाग जैसे कई भोर पर एक रात भाड़ी है ऐसे प्रियतम रात गुजारे गैरों की बाँहों में जैसे सारा जहाँ मुझको ढूँढे ,हम तुमको ढूँढे ऐसे कृष्णा को ढूँढे विकल राधा जै



राधा बनकर हो जाने दो तेरी. ..

राधा बनकर हो जाने दो तेरी. .. रोज़ रात, एक दस्तक आती है,शायद, वह कुछ कहना चाहती है,उठकर, देख पाता हूँ, साफ़ एक चेहरा,पता नहीं कैसे, चाहे, जितना भी हो अँधेरा,किसी से, कह भी नहीं सकता, करेगा नहीं कोई विश्वास,अंतर्मन की महिमा का, सिर्फ़ होता है एहसास,डर भी लगा, पहली बार जब आय



सावन आएगा झूम के

☁🌧️☁🌧️⛈️🌧️☁️⛈️☁️☆☆☆★12/07/202★☆☆☆🌧️सावन आएगा झूम के🌨️🌧️⛈️ सावन झूम के आया ⛈️🌧️⚡⚡⚡⚡⚡⚡⚡⚡⚡⚡भादो भी मन की तिश्नगी मिटाएगा।नयन मटक्का करती चपला बाला काझूला ऊँची-ऊँची पेंगें अब लगाएगा।।युवाओं का चंचल मन यहाँ- वहाँ लखजाल फेंक डोर खींच पास ले आएगा।बरसाने का कान्हा प्यारा हर बार कुँज-गलियन में रास र



तुम मिलना मुझे

★☆तुम मिलना मुझे☆★ ★☆★☆★☆★☆★☆★आँखों में जब भी डूबना चाहाझट पलकें झुका ली आपनेछूना लबों को जब भी चाहाहाथ आगे कर दिया आपनेसरगोशी कर रुझाना चाहाअनसुना कर दिया आपनेगुफ़्तगू की ख़्वाहिश जगी पुरजोरतन्हा



पावस

पावस की सुषमा है छाई ||सजे कसुम्भी साड़ी सर पर, इन्द्रधनुष पर शर साधे थिरक रही है घटा साँवरी बिजली की पायल बाँधे |घन का मन्द्र मृदंग गरजता, रिमझिम रिमझिम की शहनाई ||पूरा सुनने के लिए क्लिककरें...https://youtu.be/zRVx57amQzs



कोरोना से कानपुर वाया चीन लद्दाख - दिनेश डाक्टर

कोरोना से कानपुर वाया चीन लद्दाख - दिनेश डाक्टरपहले थी दिन रातखबरें सिर्फ कोरोना की छाईकितने मरेकितनो ने निज़ात पायीहो रही थी कोविड सेहर वक़्त आरपार की लड़ाईफिर जैसे ही चीनियों ने लद्दाख में सेंध लगाईएंकरों



शाश्वत थकन - दिनेश डाक्टर

क्यों रहता हैबिना बात व्यथितऔर मानता हैखुद को अभिशप्त- बाधितसुख गर सुख दे पातेतो तू सही में सुखी होतापर यहाँ तो मूक वेदना की धार बहती है अनवरत निरन्तर तेरे भाल पर पता नही अंदर से बाहर को या बाहर से अंदर कोक्षरित देह क्षरित मनदिनोंदिन बुढाता तन चल शून्य होया खो जा शून्



धरा कुपित

💮🌍🌎🌎धरा विचलित🌏🌎🌍💮धरती माँ की पीड़ा- अकथनीय- अतिरेक,दिवनिशि धरती माँ रे! अश्रुपूरित रहती है,मन हुआ क्लांत - म्लान - अतिविक्षिप्त है।व्यथा-वेदना सर्प फणदंश सम- असह्य है।।जागृति की एषणा प्रचण्ड- अति तीव्र है।शंख-प्रत्यंचा सुषुप्त- रणभूमि रिक्त है।।पौरुषत्व व्यस्त स्वप्नलोक में-चिर निंद्रा में



बदल‌ गया

मशीनों के बलबूते बहती धाराओं पर, मनुष्य के लालच ने अवरोध लगाये। लहलहाती फसलों के लिए रसायनों के प्रयोग अपनाएं, आश्रित जीवों के क्रम को भेद, मनुष्य के लालच ने धरा को बंजर कर डाला है। ज़मीं के गड्ढे पाटें जातें नहीं, अंतरिक्ष में गेंद उछाला जाता है। धरा का स्वर्ग नरक कर डाला, इंसान अपने मतलब के लिए ह



शिवभक्त

शिवत्वचित्त कभी शुष्क नहीं होशिवत्व हेतु उद्यत सब होआप्लावन हेतु जल नहींपूर्ण समर्पण भाव प्रचण्डशिव जल तत्व- चंद्रधारी-जल-दुग्ध एवं विल्वपत्र नहींनवचक्रों का जागरण चाहिएछाले नहीं पड़े पैरों में भक्त के,तर्पण, अर्पण एवं भाव समर्पणप्रसन्न हों शिव, मन उनका दर्पणनहीं अन्य कोई वरदान चाहिए☆डॉ. कवि कुमार नि



गीतिका

"गीतिका" नदियों में वो धार कहाँ से लाऊँराधा जैसा प्यार कहाँ से लाऊँकैसे कैसे मिलती मन की मंजिलआँगन में परिवार कहाँ से लाऊँ।।सबका घर है मंदिर कहते सारेमंदिर में करतार कहाँ से लाऊँ।।छूना है आकाश सभी को पल मेंचेतक सी रफ्तार कहाँ से लाऊँ।।सपने सुंदर आँखों में आ जातेसचमुच का दीदार कहाँ से लाऊँ।।संकेतों क



दोहा

तेरे बहिष्कार का आगाज़ भारत की जनता व सरकार दोनों ने कर दिया है रे पापी चीन, अब तेरा क्या होगा कालिया.......धाँय धाँय धाँय......."दोहा" उतर गया तू नजर से, औने बौने चीन।फेंक दिया भारत तुझे, जैसे खाली टीन।।नजर नहीं तेरी सही, घटिया तेरा माल।सुन ले ड्रेगन कान से, बिगड़ी तेरी चाल।।सुन पाक बिलबिला रहा, अब



कुंडलिया

"कुंडलिया"मधुवन में हैं गोपियाँ, गोकुल वाले श्याम।रास रचाने के लिए, है बरसाने ग्राम।।है बरसाने ग्राम, नाम राधिका कुमारी।डाल कदम की डाल, झूलती झूला प्यारी।।कह गौतम कविराय, बजा दो वंशी उपवन।गोवर्धन गिरिराज, आज फिर आओ मधुवन।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



कुंडलिया

"कुंडलिया"बचपन में पकड़े बहुत, सबने तोतारामकिये हवाले पिंजरे, बंद किए खग आमबंद किए खग आम, चपल मन खुशी मिली थी कैसी थी वह शाम, चाँदनी रात खिली थीकह गौतम कविराय, न कर नादानी पचपनहो जा घर में बंद, बहुरि कब आए बचपन।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



मुक्तक

"मुक्तकसुनते रहिये गीत गायकी अपने अपने घर में।धोते रहिए हाथ हमेशा साबुन अपने घर में।आना जाना छोड़ कहीं भी धीरज के संग रहिए-पानी गरम गला तर रखिए हँसिए अपने घर में।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी





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