जिंदगी धूल हो गई

छोटे तो सब अच्छा था बड़े होकर जैसे भूल हो गईपहले खेलते थे मिट्टी से जनाब लेकिन अब तो जिंदगी ही धूल हो गई कोई डांट देता था तो झट से रो जाया करते थे फिर पापा मम्मी के सहला देने से तो आराम से सो जाया करते थे अब कोई डांट दे तो रोते नहीं अब आराम से सोते नहीं दोस्तों अब तो



बसेरा

बसेरातिनतिन बिन, बना बसेरा लेती चिड़ियाँ।सांझ से रह बसेरे मे, रात गुजार लेती चिड़ियाँ।उड़ भोर परे खेतों से, दाना चुँग लेती चिड़ियाँ ।कुछ दबा चोच मे दाना, उड़ आती चिड़ियाँ ।बैठ बुने बसेरे मे, बच्चो को दाना चुनती चिड़ियाँ।कर प्यार पूरा, उड़ेल दाना बच्चे के मुँह मे,दूर गगन मे उड़ जाती चिड़ियाँ।न मांगती भीख किस



मुक्तक, हिंदी दिवस

हिंदी दिवस की हार्दिक बधाई ( "हिंदी है पहचान हमारी" शब्द साधना सबसे न्यारी" "मुक्तक"हिंदी ही पहचान है, हिंदी ही अभिमान।कई सहेली बोलियाँ, मिलजुल करती गान।राग पंथ कितने यहाँ, फिर भी भारत एक-एक सूत्र मनके कई, हिंदी हुनर महान।।-1एक वृक्ष है बाग का, डाल डाल फलदार।एक शब्द है ब्रम्ह का, पढ़ न सका संसार।पूज



बेरोजगारी

सरकारें बदलती हैं यहाँ पर नवयुवकों को आश्वासन देती हैं झूठे भाषण देती हैं पर नौकरियां नहीं देती हैं हर जगह लम्बी हैं कतारें व्यवस्था में हैं खामियां बड़बड़ाते हुये घिसट जाती हैं ,देखो कितनी जिन्दगानियाँ आत्मनिर्भरता का स्वप्न दिखाती झूठी दिलासाएँ देती है सब कुछ है कागजों पर पर नौकरियां नहीं देती हैं



कुछ कविताएँ



बैरी चाँद

मोरी अटरिया पे ठहरा ये “बैरी चाँद”देखो कैसे मोहे चिढायेदूर बैठा भी देख सके है मोरे पिया कोमोहे उनकी एक झलक भी न दिखाए .. कभी जो देखूं पूरा चाँद, याद आती है वो रातजब संग देख रहा था ये बैरी, हम दोनों को टकटकी लगाये … बिखरी थी चांदनी पुरे घर में, रति की किरण पड़ रही थी तन मन मेंऔर खोये थे हम दोनो, घर क



भरी भीड़ में मन बेचारा

आज अमावस्या तिथि है...हम सभी ने अपने पितृगणों को विदा किया है पुनः आगमन की प्रार्थना के साथ...अमावस्या का सारा कार्यक्रम पूर्ण करके कुछ पल विश्राम के लिए बैठे तो मन में कुछविचार घुमड़ने लगे... मन के भाव प्रस्तुत हैं इन पंक्तियों के साथ...भरी भीड़ में मन बेचाराखड़ा हुआ कुछ सहमा कुछसकुचाया साद्विविधाओं क



हर पल हलचल

भूमिका:-प्रस्तुत कविता में जीवन के विभिन्न रूपों व पारिस्थितियों को, समय के माध्यम से समेटने की कोशिश रही है। साथ ही पाठक को यह दर्शाने का प्रयासहै कि नकारात्मक हालात जीवन का ही अंग हैं,अतः इनसे चिंतित न हो। अंत तक मानसिकता कोसकारात्मक बनाए रखने की कोशिश ही एक दिन सफलता दिलाएगी।हर पल, हलचलVIMAL KISH



सिंदूर

"सिंदुर''ब्रह्मरंध नियंत्रण सिंदूर कापारा करता है।सुहागन का जीवनतनाव मुक्त करता है।।अनिद्रा मुक्त कर श्नायु तंत्र कोचैतन्य रखता है।।🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩परंपरा, धर्म जब ताखे पर रख डालाब्रह्मरंध्र का क्या दे फिर मित्र हवालानींद गई-सुख-चैन गया- झेलें तुर्राचित्त चंचल- स्वप्नों की हलचल 🌊🌊🌊🌊🌊🌊



"सोमनाथ मंदिर "

"सोमनाथ मंदिर "सोमनाथ मंदिर पे महमूद गजनवी का ,आक्रमण समझाने आया !सं १०२६ ई.के उस पुराना काले दिवस का इतिहास बताने आया | वैभवशाली ज्योतिर्लिंग की कीर्ति का सोमनाथ वारहवां प्रतीक | ईसा पूर्व अस्तित्व में आया जिसे सातवीं सदी में वल्लभी के मैत्रेय बनवाया | बार बार आक्रमण सहकर सन्देश दे जाता धैर्य और



हिंदी दिवस पर बाल गीत

🌹"बाल गीत हिंदी दिवस पर"🌹🌹👯👯👯👯👯👯👯👯👯👯आज "हिंदी दिवस" सप्ताह में ''बाल गीत'' हम गायेंगेअपने बच्चों को हिंदी से प्यार करना आज सिखायेंगेनन्हे-मुन्हें बच्चों बहुत लाढ लढाया, मेधावान् बनायेंगेअपनी भाषा हिंदी के गुण-सभी बच्चों को बतलायेंगेहिंदी में पढ़ना-लिखना और बातें करना- सिखलायेंगेअकाडमी मे



हिंदी

अनेकों को लिखता देख मेरे मन में उठा ख्याल, मैं भी लिखूं कुछ ऐसा जिस पर उठे सवाल। फिर चाहे उस पर होता रहे हैं जितना बवाल , सोचा कविता को शीर्षक क्या दूँ, क्यों ना इस कविता का नाम अपना ही रख दूँ। कविता में



हिन्दी की सामर्थ्य

हिन्दी की सामर्थ्यएक भाषा है जो मुझसे, बात करती है मैं कहीं भी जाऊँ, मुलाक़ात करती है , चाँदनी में दिखती, तारों में छिप जाती, जुगनुओं की तरह मेरेसाथ चलती है,हमने अपने बेटे से कहा,हिन्दी मे पहाड़ेसुनाओ,बोला पापा हमें खामखां मत गड़बड़ाओ,मेडम कहती है, नौकरी तभी मिलेगी जब अँग्रेजी पढ़ोगे,नहीं तो ज़िंदगी भरह



भारती का प्यार हिन्दी...

भारती का प्यार है ये हिंदवी,भारतेन्दु ,शुक्ल और द्विवेदी प्रसाद ,जैसे , गोमुखी से गंगा काप्रयास है ये हिंदवी,हिम कन्दराओं दे उदित वेद मंत्रों युक्त,ऋषि मुनियों का इतिहास है ये हिंदवी,सूर का आभास है ये मीरा हरी प्यास है ये,पीड़ा महादेवी



हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ

अभी 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस था और आज हिन्दी दिवस है... हमने अपने सदस्यों सेआग्रह किया क्यों न इस अवसर पर एक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया जाए... तो आज उसीगोष्ठी के साथ आपके सामने उपस्थित हैं... यदि हम ज़ूम पर या किसी भी तरह से ऑनलाइनगोष्ठी करते हैं तो वहाँ कुछ समस्याओं का हमने अनुभव किया है... जिनमें स



मैं क्यों विरोध नहीं करूं

आखिर मैं क्यों ना करूं विरोध, इन राष्ट्रद्रोहियों का; स्वार्थ प्रेरित हो राष्ट्र की सुरक्षा भी, दांव पे लगा देते हैं जो।ऐसे लोगों का विरोध क्यों ना करूं मैं,जो सरकार का विरोध करने हेतु हाथ मिला लेते हैं , देश के दुश्मनों से।विरोध मैं अवश्य करूंगा, उन कथित विद्वानों का



व्यंग्य की धार

एक :सुनो !!व्यंग्य के धागे मेंमत लपेटना काँच का पाउडरतेज़ माँझा झटके में काट देगा गरदनसमझने से पहले ही प्राण त्याग देगा लक्ष्यधागे को रखो मोटामध्य में बाँधो तमाम गाँठेगाँठों से छिली त्वचा पर अंकित संकेततमाम उम्र रहेंगे प्रासंगिकरगड़ की जलन अधिक स्थायी होती है अचानक आई मृत्यु की पीड़ा से दो :पतंग के साथ



इंतज़ार

लहरें होकर अपने सागर से आज़ादतेज़ दौड़ती हुई समुद्र तट को आती हैं ,नहीं देखती जब सागर को पीछे आतातो घबरा कर सागर को लौट जाती हैं ,कुछ ऐसा था मेरा प्यारखुद से ज्यादा था उसपे विश्वास,के मुझसे परे, जहाँ कही भी वो जायेगाफिर लौट कर मुझ तक ही आएगा ,इंतजार कैसा भी हो सिर्फसब्र और आस का दामन थामे ही कट पाता है



कोई रोता है।

( 1)क्यों? मुझको ऐसा लगता है। दूर कहीं कोई रोता है।कौन है वो? मैं नही जानता। पर,मानो अपना लगता है।कहीं दूर कोई रोता है। मुझसे मेरा मन कहता है। ( 2)अक्सर अपनी तन्हाई में, ध्



कोई रोता है।

क्यों मुझको ऐसा लगता है?, दूर कहीं कोई रोता है।कौन है वो? ,मैं नही जानता, पर मुझको ऐसा लगता है,दूर कोई अपना रोता है। क्योंमुझको ऐसा लगता है?दूर कहीं कोई रोता है। 2पर्वत की हरी-भरी वादियाँ





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