विम्ब का ये प्यार

गीत(09/05/1978)विम्ब का ये प्यारविजय कुमार तिवारीकौन दूर से रहा निहार?दिल ने कहा-खोलता हूँ द्वार, विम्ब का ये प्यार। पोखरी से फिसल चले हैं पाँव ये,जिन्दगी की कैसी है ढलाँव ये। आज हाथ केवल है हार,दिल ने कहा-खोलता हूँ द्वार,विम्ब का ये प्यार। धड़कने सिसकाव का सहारा ले,मिट रही बढ़त यहाँ किनारा ले। अदाय



मानस गीत मंजरी

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देश बचाना

कवितादेश बचानाविजय कुमार तिवारीस्वीकार करुँ वह आमन्त्रणऔर बसा लूँ किसी की मधुर छबि,डोलता फिरुँ, गिरि-कानन,जन-जंगल, रात-रातभर जागूँ,छेडूँ विरह-तानरचूँ कुछ प्रेम-गीत,बसन्त के राग। या अपनी तरुणाई करुँ समर्पित,लगा दूँ देश-हित अपना सर्वस्व,उठा लूँ लड़ने के औजारचल पड़ूँ बचाने देश,बढ़ाने तिरंगें की शान। कु



आसान नहीं था वो दिन मेरे लिए

उस दिन चूड़ियों से मैंअपने हाथ की नब्ज नहीं काटी , और न ही स्लीपिंग पिल्स का एक्स्ट्रा डोज लेकर , गहरी नींद में हमेशा के लिए सो गयी थी ,जैसा की फिल्मों में अक्सर नायिका करती है ा आसान नहीं था वो दिन मेरे लिए ,टूटे दिल के तमाम टुकड़े को समेटकर ,बनावटी मुस्कुराहट के पू



अस्त व्यस्तजीवन

प्लेटफार्म मन ही मन सोचता है मेर जीवन भी क्या जीवन है। हर आती जाती रेल मुझे कोसती है। किसका सगा हूँ ये प्रश्न पूछती है। रेलों का शोर है, हजारों की भीड़ है लेकिन मन में सन्नाटा क्यों है? बाहर इतनी रौनक,लेकिन मन में ये चुभता सा कौन है? रेल तो जीवन भर मुझ तक आएगी मुझसे कभी वो कुछ नहीं पायेग



"छंद दुर्मिल सवैया" चित भावत नाहिं दुवार सखी प्रिय साजन छोड़ गए बखरी। अकुलात जिया मन लागत का छड़ राजन काहुँ गए बहरी।

दुर्मिल सवैया ( वर्णिक )शिल्प - आठ सगण, सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा 112 112 112 112 112 112 112 112, दुर्मिल सवैया छंद लघु से शुरू होता है ।छंद मे चारों पंक्तियों में तुकांत होता है"छंद दुर्मिल सवैया" चित भावत नाहिं दुवार सखी प्रिय साजन छोड़ गए बखरी।अकुलात जिया मन लागत का छड़ राजन काहुँ गए



चुनावी समर

इस चुनावी समर का हथियार नया है। खत्म करना था मगर विस्तार किया है। जिन्न आरक्षण का एक दिन जाएगा निगल, फिलहाल इसने सबपे जादू झार दिया है। अब लगा सवर्ण को भी तुष्ट होना चाहिए। न्याय की सद्भावना को पुष्ट होना चाहिए। घूम फिर कर हम वहीं आते हैं बार बार, सँख्यानुसार पदों को संतु



दास्तां हकीकत की

बयाँ मैं ये हकीकत कर रहा हूँ मैं धीरे धीरे हर पल मर रहा हूँ तुझे कमियाँ नज़र आतीं हैं मुझमें मुझे लगता है मैं बेहतर रहा हूँ ख़ुदा जाने मिलेंगी मंजिलें कब मैं ख़ुद में हौसला तो भर रहा हूँ नहीं अब ज़िन्दगी से कोई निस्बत मैं आती मौत से भी डर रहा हूँ ये बुत अब भी गवाही दे रहे हैं मैं अपने वक़्त का आ



मेरी उडान

मैं चाहें जितना उडूं वो उतार ही देगा चलाके तीर मेरे दिल पे मार ही देगा मेरे नसीब में ताउम्र शोहरतें ही नहीं खुदा जो देगा बुलंदी उधार ही देगा मैं खुद भी जीतने के ख्वाब मार बैठा हूँ मैं जानता हूँ मुझे तू तो हार ही देगा मुझे खुद अपने ही चेहरे पे ऐतबार नहीं छुपाऊं लाख ग़मों को उभार ही देगा मैं रिस्क



"मुक्तक"

"मुक्तक"मंदिर रहा सारथी, अर्थ लगाते लोग।क्या लिख्खा है बात में, होगा कोई ढोंग।कौन पढ़े किताब को, सबके अपने रूप-कोई कहता सार है, कोई कहता रोग।।-1मंदिर परम राम का, सब करते सम्मान।पढ़ना लिखना बाँचना, रखना सुंदर ज्ञान।मत पढ़ना मेरे सनम, पहरा स्वारथ गीत-चहरों पर आती नहीं, बे-मौसम मुस्कान।।-2महातम मिश्र, गौत



कुंडलिया

"कुंडलिया"मेला कुंभ प्रयाग का, भक्ति भव्य सैलाबजनमानस की भावना, माँ गंगा पुर आबमाँ गंगा पुर आब, लगे श्रद्धा की डुबकीस्वच्छ सुलभ अभियान, दिखा नगरी में अबकीकह गौतम कविराय, भगीरथ कर्म न खेलाकाशी और प्रयाग, रमाये मन का मेला।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



हर बात मेरी एक प्रश्न बन गई l

हर बात मेरी एक प्रश्न बन गई lश्वेत चादर मेरी कृष्ण बन गई llहर बात मेरी एक प्रश्न बन गई lअश्रुओं ने कही जिंदगी की कहानी,शत्रु बन गए चक्षु और पानी,जिंदगी से लड़ता रहा मौत से ना हार मानी,त्रासदी भी मुझे छूकर एक जश्न बन गई lहर बात मेरी एक प्रश्न बन गई lश्वेत चादर मेरी कृष्ण बन गई llअधरों की मूक स्वीकृति



अब अपने मन से जीव।

अब अपने मनसे जीव।आटा-लाटा ख़ाके, ताजा माठा पीव।देख पराई कमाई, मत ललचाव जीव।हो घर मे जो, उसको खा-पी के जीव।चाईना ने तिब्बतके बॉर्डर मे मिसाईल तान दी।1965 मे सहस्रसिपाहियो ने अपनी बलिदानी दी ।जो घर मे होघीव, देख उसे शकुनसी जीव।देख राजा-नेताओके झगड़े मे, मत जलाओअपना जीव।छोड़-छाड़ जातीधर्म आरक्षण का वहम खुद



गरीबों की बस्ती

कहते है कि.... गरीबों की बस्ती मे... भूक और प्यास बस्ती है... आँखों में नींद मगर आँखें सोने को तरसती है... गरीबों की बस्ती मे... बीमारी पलती है... बीमारी से कम यहा भूक से ज्यादा जान जलती है... गरीबों की बस्ती मे... लाचारी बस्ती है... पैसे की लेनदेन मे ही जिंदगी यहा कटती है... गरीबों की बस्ती मे... श



नगीने

मुहब्बत खुद उमड़ती है कभी हम तुम जो मिलते हैंमहकते फूल देखो कितने फिर बगिया में खिलते हैं भले आवाज़ ना आए पर हम सब कुछ समझ लेंगेतेरे लब क्या बताने को इतने धीमे से हिलते हैंकठिन राहों पे उल्फ़त की सभी तो चल नहीं पाते डटे रहते हैं जो इन पे बदन उनके ही छिलते हैंये क्या दुनिया बन



खजाना

मैं तो तेरी दीवानी हूँ तू भी मेरा दीवाना हैंहर हाल में हमको तो ये रिश्ता निभाना हैतलाशा उम्र भर जिसको उसे मैं छोड़ दूँ कैसेमुहब्बत से भरा ए मीत तू ऐसा खजाना हैसुकूँ मिलता है मेरी रूह को जो गुनगुनाने सेओ मेरे साथियां तू ही तो वो मीठा तराना हैमुझे एहसास है देखो नहीं अब दूर तू मुझसेतभी तो बन गया ये आलम



प्यासा

सुकूँ पाना ज़माने में कभी होता ना आंसा हैकमी जल की नहीँ है पर समुन्दर देख प्यासा हैराह मंज़िल की पाने को चला हूँ मैं तो मुद्दत सेमगर ना रोशनी बिखरी ना ही हटता कुहासा हैबड़ा मजबूत हूँ मैं तो दिखावा सबसे करता हूँ मेरे अशआर में पर हाल ए दिल का सब खुलासा हैगैर तो गैर थे पर चोटें तो अपनों ने दीं मुझकोमगर त



ख्याल न आया

ख्याल न आया पहली रोटी गाय को दी अंतिम रोटी कुत्ते को किड़नाल को सतनजा भी डाल आया मछलियों को आटा भी खिलाया श्राद्ध में कौवों को भी भोज कराया नाग पंचमी पर नाग को भी दूध पिलाया भुखमरी के शिकार वंचितों का ख्याल न आया निवाले के अभाव में जिसने जीवन गंवाया -विनोद सिल्ला©



बूढ़ा आदमी

कविता(मौलिक)बूढ़ा आदमीविजय कुमार तिवारीथक कर हार जाता है,बेबस हो जाता है,लाचारजबकि जबान चलती रहती है,मन भागता रहता है,कटु हो उठता है वह,और जब हर पकड़ ढ़ीली पड़ जाती है,कुछ न कर पाने पर तड़पता है बूढ़ा आदमी। कितना भयानक है बूढ़ा हो जाना,बूढ़ा होने के पहले,क्या तुमने देखा है कभी-तीस साल की उम्र को बूढ



चुनाव चिन्ह जूता।

चुनाव चिन्हजूता।लोकलाज सबत्याग, जूता निशानबनाया।झाड़ू से सफाईकर, बाद मे जूतादीना।पढ़ लिख करमति बौराई, कौन इन्हेसमझाए?लोक सभा चुनावसे पहले जूता निशान बनाए।हरि बैल,खेत-किसान, खत का निशान मिटाया।वीर सपूतोकी फाँसी वाली रस्सी को ठुकराया।उन वीरांगनाओको भूल गए जिसने खट्टे दाँत किये।दिल्ली कोबना के चमचम, पूरे





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