🔱🔱⚜️शिव⚜️🔱🔱🔱

शिव को चाहिये🔱⚜️ॐ⚜️🔱भगवान् शिव का स्थानमूलाधार चक्र में है।कुलकुण्डलिनी त्रिशूलधारीशिव अधिष्ठाता हैं।।प्राणवायु उठ वहीं सेसुसुम्ना नाड़ी का नाता।नाद सुन भक्त त्रिनेत्र तकजब अंत:यात्रा पर जाता।।भ्रिकुटी पर चारों तीर्थधाम एक साधक देख पाता।त्रिकालदर्शिता का स्वामि बन सिद्ध वह कहलाता।।द्रव्य नहीं सदाश



साहित्यकार

साहित्यकार के लियेसम्मान अपमानबेअसर है।रमता जोगी बहता पानीरखता सबकीखबर है।।गुरु कहता धरती कोजिसपर धरता कविआगे पग है।सूर्य नमन करताजिसकी उष्णता से४तत्व वाष्पित हैं।।चँद्रमा की शितलता देख मुग्ध,छाया भले सघन है।निहारिकाओं संग विचरता,कहता कवि निर्मल है।।डॉ. कवि कुमार निर्मल "आशुकवि"समिक्षार्थ🙏🙏🙏🙏



सावन का झूला

🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃सावन का झूला🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃पिछला सावन बीता उदास-इसबार भी उदास हीं जाएगा।सत् त्याग तम् का संक्रमणयह सावन भी सूना जाएगा।।प्रदूषण कम कर हीं सावनसुहाना फिर आ पायेगा।बाढ़ से जलजला झूलाबगियन में कैसे लटकायेगा।।रिम झिम फुआर सावन की पुकार रहा साजन को।अकेला देख इज़हार कर,मना रूठे अपने



सावन आयो रे

आषाढ़ मास समाप्तहो चुका है और आज से श्रावण मास आरम्भ हो रहा है और इस मदमस्त कर देने वाली रुतमें मेघराज अपनी प्रियतमा रत्नगर्भा को अपने अमृतरस की धार से आप्लावित करना नहींभूल रहे हैं, ताकि ग्रीष्म का ताप झेलती प्रेयसि वसुन्धरा पुनःप्रफुल्लित होकर और अधिक रत्नराशि अपने गर्भ में धारण कर सके... इसी माह म



नमोऽस्तु गुरुसत्तायै

नमोऽस्तुगुरुसत्तायैमातृवत्लालयित्री च, पितृवत् मार्गदर्शिका,नमोऽस्तुगुरुसत्तायै, श्रद्धाप्रज्ञायुता च या ||वास्तवमें ऐसी श्रद्धा और प्रज्ञा से युत होती है गुरु की सत्ता – गुरु की प्रकृति – जोमाता के समान ममत्व का भाव रखती है तो पिता के समान उचित मार्गदर्शन भी करती है… औरसच पूछिये तो मित्र के समान हर



शहीदों के प्रति

शहीदों के प्रतिशहीदों की कुर्बानी,हर साल याद कर लेते हैं हम।शहादत का कलाम पढ़,मंचों पे वाह-वाही सुनते हैं हम।।जंजीरों के रिसते धाव,नजरअंदाज करते हैं हम।जश्न आजादी का मनाते-हर बार सँवरते-सजते हैं हम।।बेेबस- लाचार- गरीब कोनसिहत-दिलासा बेहिसाब देते हैं हम।हाय-तौबा कर चिल्लाते तोसलाखों के पीछे किए जाते



आहिस्ता आहिस्ता

आहिस्ता आहिस्ता, मुझमें तू आ खुद को हो ना खबर, रुह में यूं समा रहे सांसें थमी थमी, रहे नब्ज जमी जमी सुनें धड़कनों की सदा, दोनों यहाँ,दोनों यहाँ सर्दियों के नर्म धुप में, तेरे मेरे अक्स जब जमीं पे पड़ते हैं ऐसा लगता है जैसे, बादलों के दो टुकड़े जमीं पे झुमते हैं आओ झु


इंद्रधनुष और स्वप्न विज्ञान

🌈🌈🌈इंद्रधनुष एवं स्‍वप्‍न विज्ञान🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈लता-गुल्म-पुष्प वन्यजीवअगर दिख जाये।हमारी मन:स्थितिभावी सु:ख-दु:ख बतायें।इंद्रधनुष जीवन में सुख-समृद्धि के संकेत देती है।ये स्वप्न व्‍यक्ति की प्रतिष्ठाप्रसिद्धि में वृद्धिकरक है। नौकरी-व्‍यवसाय में सफलता काप्रतीक माना जाता है।न‍िवेश कर



मेघ इठलाए रहे हैं

बरखा की सुहानी रुत मेंमेघों की बात न हो, उनकी प्रिय सखी दमयन्ती की बात न हो, प्रकृति के कण को मेंव्याप्त मादकता की बात न हो - ऐसा तो सम्भव ही नहीं... निश्चित रूप से कोई योगी याकोई विरह वियोगी ही होगा जो इस सबकी मादकता से अछूता रह जाएगा... तो प्रस्तुत हैहमारी आज की रचना "मेघ इठलाए रहे हैं"... सुनने क



बरखा की रुत

हीरों के हारों सी चमकेंफुहारें, और वीणा के तारों सी झनकें फुहारें | धवल मोतियों सी जो झरती हैंबूँदें, तो पाँवों में पायल सी खनकें फुहारें || जी हाँ, जैसा कि हम सभी जानतेहैं, पूरा देश कोरोना महामारी की मार से बाहर निकला है...हालाँकि ख़तरा अभी भी टला नहीं है... 2019 के अन्त से लेकरअभी तक भी इसस



मुठ्ठी भर रौशनी

मुठ्ठी भर रौशनीबंगाल प्रवास (१९९१-'०४) में एकमनभावन नृत्य नाटिका देखा १९९४ ई.मकरसंक्रांति (कपिलमुनि गुहा, झालिदा)के दिन।दो पंक्तियाँ याद हैं-सबारे कोरी आह्वान,सबाइ आमार प्राणचाँद सूर्य की रौशनी से चमकता है, हम हमारी यह दुनिया चमकती है, सूर्य भी किसी अन्य ग्रह नक्षत्रकी रौशनी से हीं चमकता है, उसकी अप



प्रभुकृपा कवि हूँ

प्रभुकृपा कवि हूँउभयहस्‍तकुशल, सव्यसाची हूँ मैं,प्रभुकृपा हूँ एक अकिंचन कवि।कटु हो या मृदु भाव- लकिरेंउकेर लिखता सत्य कवि।हिन्दू हिन्दुस्तान तुम्हारा है१९५७ में लिखा यह कवि। संविधान कहता देशद्रोही-क्रांति दूत बना था कवि।नेता जाते लुकछुपमंदीर-मस्जिद-चर्च सभी।ईद में गले मिल सेवई खाने जाता म कवि।होली-द



तपस्वी समाधि तोड़ो

तपस्वी समाधि तोड़ोओ' मूक तपस्वी ध्यान किसका? नित करते हो।नवचक्रों का शोधन कर 'मंत्राधात्' कर थकते हो।वृत्तियों पर नियंत्रण कर समाधिस्थ हो जाते हो।सिद्धियों के स्वामि बन शक्तिसंपात तक करते हो।व्यर्थ सारा तेरा यह अध्यात्मिक महाप्रपंच,अगर जग का हित तुम नहीं कर थकते हो।सुवासित पुष्प चुन उद्यान से माला नि



कड़वी दवाई हो तुम

एक कड़वी दवाई हो तुम...जिसे लेने से पहले साथ पानी रखना पड़ता हैलेना ही पड़ेगा मुझे मेरी भलाई हो तुम...अब अच्छी सेहत के लिए कड़वाहट को तो चखना पड़ता हैएक कड़वी दवाई हो तुम...लेने के बाद पानी पी भी लूं तब भी कड़वाहट रह जाती हैजैसे टूटे रिश्तों में भी हल्की सी मुस्कुराहट रह जाती हैगुण तो बहुत है पर कीमत नहीं,



समझा क्या है आपने

बस नाराज होने तक का हक दिया आपनेउसमें भी खुद मान जाने को कह दिया आपनेइतनी अकड़ है किस बात की...अरे ! हम भी इंसान हैं हमें समझा क्या है आपनेबस आपकी चले ये वो राह नहीं है...कोई पकड़ के झटक दे ये वो बांह नहीं हैईमान-धर्म आप देखो, बात बढ़ाई थी आपनेअरे ! हम भी इंसान हैं हमें समझा क्या है आपनेसुना है आपने हम



चैनल ही बदल दीजिए

जी लीजिये अपनी जिंदगी न किसी की परवाह कीजिएउसूल है जिंदगी का एक हाथ लीजिए एक हाथ दीजिए सनसनी खबर सी चल रही हो गर जिंदगी लेकर उसूलों का रिमोट चैनल ही बदल लीजिएठीक है तुम जीत गए हम हार मान गएजानते नहीं थे ज्यादा तुम्हें पर अब तो पहचान गएन अब हमें इस तरह सार्वजनिक ताना दीजिएलेकर उसूलों का रिमोट चैनल ही



द्रुतविलम्बित छंद "गोपी विरह"

द्रुतविलम्बित छंदमन बसी जब से छवि श्याम की।रह गई नहिँ मैं कछु काम की।लगत वेणु निरन्तर बाजती।श्रवण में धुन ये बस गाजती।।मदन मोहन मूरत साँवरी।लख हुई जिसको अति बाँवरी।हृदय व्याकुल हो कर रो रहा।विरह और न जावत ये सहा।।विकल हो तकती हर राह को।समझते नहिँ क्यों तुम चाह को।उड़ ग



दादी ने इश्क किया।

दादी ने इश्क किया।साठ साल पहले दादी ने, गैर गाँव के लड़के से इश्क किया।लड़का लम्बा तगड़ा मूँछ अपनी टाईट किए, दादी अपनी छोटी हाईट लिए।वह सुर-सरगम, हारमोनियम, मौहर, बीन सुंदर बजाती थी।उसके मन को मोह लिया, खुद के परिवार से रिश्ता तोड़ लिया।इश्क बग़ावत झेल न पाया वह, दुनियाँ से नाता तोड़ लिया।हो अकेली जग संसा



दाग

बादल का एक टुकड़ा तोड़ा मैने और माटी की कोख़ में दबा दिया एक उम्र से हर उमर तक इंतज़ार करती रही यह सोचती रही कि एक रोज़ बादल फटेगाऔर माटी के कोख से एक दरख्त उगेगालेकिन जो हुआ वह मेरी कल्पना में कभी घटित नहीं हुआ थाएक सुबह माटी की



जब से घर से दूर रहने लगें है

जब से घर से दूर अकेले रहने लगें है मुश्किलों को भी हँसकर सहने लगें हैखुद से ही ढूंढ़ लेते अब तो जवाब हम सवाल भी कुछ अहमियत खोने लगें है कोई मनाता ही नहीं अब हमें खाने को न ही आवाज़ लगाता सुबह जगाने को खुद से ही खुद को सुला देते है रात में खुद से ही खुद को सुबह जगाने लगें है एक मज़बूत सा ताला इंतज़ार में





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