हर एक साँस मैं तुम्हे लौटा दूँगी

सबकी नज़रों में सबकुछ था मेरे पास , लेकिन सच कहूँ तो खोने को कुछ भी नहीं था मेरे पास ,एक रेगिस्तान सी जमीन थी ,जिसपर पौधा तो था लेकिन सब काँटेदार ,धूप की गर्दिश में मुझे मेरी ही जमीन तपती थी ,कुछ छाले थे ह्रदय पर ,जो रेत की छुअन



नन्ही परी

जिंदगी की खिड़की पे सुबह हुई,खुशियों की एक किरण हमें जगाने आई है।ख्वाबों के फूल खिलते हैं यहां,इस बागबान को मोहब्बत से सजाने आई है।यादों को भुला देते हैं हम वक्त के साथ चलते हुएअब हर लम्हें को यादगार बनाने आई है।जिंदगी में कोई कमीं महसूस ना हुई हमें,अब सच्ची खुशियों का राज बताने आई है।हारी-थकी हुई थी



साजन बेस परदेश

साजन बेस परदेश सूनी - सूनी लगे नाचे गायें घर चौबारे नगरी नगरी द्वारे द्वारे जहर लागे हंसी ठिठोली सून सून लागे होली !चारो और रंग बरसे है मेरा सूखा मन तरसे है खाली अबीर गुलाल झोली सूनी सूनी लागे होली | आँखे सबकी ,खुशियां वांचे पीली पीली सरसो नाचे रंगीले परिधान में टोली सूनी सूनी लागे होली | होड़ म



हश्र

हश्र✒️ओस के नन्हें कणों ने व्यंग्य साधा पत्तियों पर,हम जगत को चुटकियों में गर्द बनकर जीत लेंगे;तुम सँभालो कीच में रोपे हुवे जड़ के किनारे,हम युगों तक धुंध बनकर अंधता की भीख देंगे।रात भर छाये रहे मद में भरे जल बिंदु सारे,गर्व करते रात बीती आँख में उन्माद प्यारे।और रजनी को सुहाती थी नहीं कोई कहानी,ज्ञा



चलता रहा मैं

उम्मीदों के साए में पलता रहा मैं,अपने जख्मों पर मरहम मलता रहा मैं,जिंदगी गोल राहों पर घुमाती रही मुझे,और चाहत का हाथ थामकर चलता रहा मैं।हर चाहत के लिए पतंगे सा जलता रहा मैं,मुट्ठी भर जीत के लिए मचलता रहा मैं,हीरे-सी तेज चमक लेकर भी आंखों में ,हर श्याम को सूरज सा ढलता रहा मैं।दर्द को खामोशी से कुचलता



सच कहूँ तो आज बाबा की मजबूरी सी हूँ

आज फिर मैं बोझ सी लगी हूँ , यूँ तो मैं बाबा की गुड़िया रानी हूँ ,पर सच कहाँ बदलता है झूठे दिल्लासों से ,सच कहूँ तो आज बाबा की मजबूरी सी हूँ ा उनके माथे की सिलवटें बता रही है ,कितने चिंतित है मगर जताते नहीं है वो ,अपनी गुड़िया को ए



मैं करती हूँ नृत्य

मैं करती हूँनृत्यदोनों हाथ ऊपरउठाकर, आकाश की ओरभर लेने कोसारा आकाश अपने हाथों में |चक्राकार घूमतीहूँ कई आवर्तनघूमती हूँ गतों और परनोंके, तोड़ों और तिहाइयों के |घूमते घूमते बनजाती हूँ बिन्दु हो जाने को एक ब्रह्माण्ड केउस चक्र के साथ |खोलती हूँ अपनीहथेलियों को ऊपर की ओर बनाती हूँनृत्य की एक मुद्रादेने



जिंदगी

जिंदगी एक मौका है कुछ कर दिखाने का,एक बढ़िया रास्ता है खुद को आजमाने का,मत डरना कभी सामने आई मुसीबत से,कुदरत का इंसान पर किया एहसान जिंदगी है।धर्म-जात में बाँट दिया संसार को कुछ शैतानों ने,दिलों को बाँट दिया नफरत की हदों से,सहुलियत के लिए बनाई थी ये सरहदें हमने,मगर इंसान को मिली असली पहचान जिंदगी है।



चुनावी मौसम में

चुनावी मौसम में झूठ पर झूठ बोली जाएगी,खाई जाएगी,परोसी जाएगी,झूठ चासनी में डुबायी जाएगी। बड़े प्यार से खिलायी जाएगी। उसकी बन्दिशें हटायी जाएंगी। चुनाव की होली है। कई हफ्तों खेली जायेगी। कीचड़ उछाल खेली जायेगी। झूठ को मौका है अभी जी भर के इतराएगी । आखिर में उसकी असली जगह जनमत द्वारा दिखा दी जायेगी।



उस फागुन की होली में

जीना चाहूं वो लम्हे बार बार जब तुमसे जुड़े थे मन के तारजाने उसमें क्या जादू था ? ना रहा जो खुद पे काबू था कभी गीत बन कर हुआ मुखर हंसी में घुल कभी गया बिखर प्राणों में मकरंद घोल गया बिन कहे ही सब कुछ बोल गया इस धूल को बना गय



मुक्तक

महिला दिवस पर हार्दिक बधाई"मुक्तक"कण पराग सी कोमली, वनिता मन मुस्कान।खंजन जस आतुर नयन, माता मोह मिलान।सुख-दुख की सहभागिनी, रखती आँचल स्नेह-जगत सृष्टि परिचायिनी, देवी सकल विधान।।-1गौतम जो सम्मान से, करता महिला गान।लक्ष्मी उसके घर बसे, करे विश्व बहुमान।महिला है तो महल है, बिन महिला घर सून-घर-घर की यह



महिला



महिला

'महिला' सृष्टि का अनमोल ख़जाना महिला है बहुत महाना त्याग, बलिदान की सच्ची मूरत नारी की है सृष्टि पर



कुंडलिया

"चित्रलेखा""कुंडलिया"बचपन था जब बाग में, तोते पकड़े ढ़ेर।अब तो जंगल में कहाँ, मोटे तगड़े शेर।।मोटे तगड़े शेर, जी रहे अब पिजरे में।करते चतुर शिकार, नजर रहती गजरे में।।कह गौतम कविराय, उमर जब आती पचपन।मलते रहते हाथ, लौट आता क्या बचपन।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



नारी - हिम्मत कर हुंकार तू भर ले

#नारी - हिम्मत कर हुंकार तू भर ले#नारी के हालात नहीं बदले,हालात अभी, जैसे थे पहले,द्रौपदी अहिल्या या हो सीता,इन सब की चीत्कार तू सुन ले। राम-कृष्ण अब ना आने वाले,अपनी रक्षा अब खुद तू कर ले,सतयुग, त्रेता, द्वापर युग बीता,कलयुग में अपनी रूप बदल ले।लक्ष्य कठिन है, फिर भी



छंद मुक्त काव्य

महिला दिवस को समर्पित"छंद मुक्त काव्य"महिला का मनसुंदर मधुवनतिरछी चितवननख-सिख कोमलता फूलों सीसर्वस्व त्याग करने वालीकाँटों के बिच रह मुसुकाएमानो मधुमास फाग गाए।।महिला सप्तरंगी वर्णी हैप्रति रंग खिलाती तरुणी हैगृहस्त नाव वैतरणी हैकल-कल बहती है नदियों सीहर बूँद जतन करने वालीनैनों से सागर छलकाएबिनु पान



कोई उसकी फिक्र क्यों नहीं करता ?

आजकल वो लड़की बड़ी गुमसुम सी रहती है , हमेशा बेफिक्र रहने वाली ,आजकल कुछ तो फिक्र में रहती है ा अल्हड़ सी वो लड़की ,हर बात पर बेबाक हंसने वाली ,आजकल चुप-चुप सी रहती है ा आँखों में मस्ती , चेहरे पर नादानी ,खुद में ही अलमस्त रहने वाली ,हमेश



सच कहाँ हैं?

सच कहाँ हैं?कब्रिस्तानमे राख़ नहीं मिलती, मिट्टी-मिट्टी मे दफन हो जाती हैं लाशे।समशान मे हैंराख़,एक चिंगारी सेआग लगकर शांत हो जाती चिताए। लौट जाते हैंवह लोग, ख्वाबोंके समुंदर मे भ्रमित गोते लगाते हुए।दफन हो जाना, भसम हो जाना,ताबबूतों मे सिमट कर रह जाना अंत हैं।यह सारा दृश्य, आंखो की पालको को भिंगोते ह



सुंदरी सवैया

"सुंदरी" सवैया सरल मापनी --- 112/112/112/112/112/112/112/112/2"सुंदरी सवैया"ऋतु में बसंत उतिराय गयो, घर से सजना रिसियाय गयो क्यों।जब फागुन की रसदार कली, बगिया अपने पछिताय गयो क्यों।रसना मधुरी नयना कजरा, करते मधुपान बिलाय गयो क्यों।मन की मन में सब साध रही, अँगना चुनरी उलझाय गयो क्यों।।गलियाँ कचनार अल



"आतंकवाद जहाँ "

"आतंकवाद जहाँ "--------------------सिर - बांधे लाल पगड़िया दुनिया को बताएगा तेरी करतूतों - कहर तुझको ही समझायेगा |गांती बांधे चलता था दुनिया पर कहर वर्षाया मैं! बातों से समझाता सब मिलजुल लतियायेंगे |धरा - अमन सभी चाहते कसमें सभीने खाई इ हर्षित रहते सारे बच्चे कौन तुझे





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