वो भी क्या दिन थे.......

वो भी क्या दिन थे ....बचपन के वो दिनअसल जिंदगी जिया करते थे कल की चिंता छोड़ आज में जिया करते थे ईर्ष्या,द्वेष से परे,पाक दिल तितली की मानिंद उड़ते ना हाथ खर्च की चिंता,ना भविष्य के सपने बुनते हंसी ख़ुशी में गुजरे दिन ,धरती पर पैर ना टिकते छोटे छोटे गम थे,छोटी छोटी



तृष्णा मन की -

मिले जब तुम अनायास - मन मुग्ध हुआ तुम्हे पाकर ; जाने थी कौन तृष्णा मन की - जो छलक गयी अश्रु बनकर ? हरेक से मुंह मोड़ चला - मन तुम्हारी ही ओर चला अनगिन छवियों में उलझा - तकता हो भावविभोर चला- जगी भीतर अभिलाष नई- चली ले उमंगों की नयी डगर ! !प्राण



अलग

कब ,कहां ,क्यों और कैसे होता है प्यार ? इन सभी शब्दो से अलग ,अजब है प्यार. एक दरिया है भावनाओ का, दुआओ का,ढूंढती आँखों सी नाव, पानी की है पतवार.सागर से गहरा, नामुकिन जिस पर पहरा ,आजाद बेख़ौफ़ जांबाज हवा पर है सवार .ये कोई खेल नहीं, किसी का भी मेल नहीं, इसका अपना समय, लाडली भी है बहार .रुकता नहीं रोकन



22 सितम्बर 2018

तृष्णा

मदिर प्रीत की चाह लिये हिय तृष्णा में भरमाई रे जानूँ न जोगी काहे सुध-बुध खोई पगलाई रे सपनों के चंदन वन महके चंचल पाखी मधुवन चहके चख पराग बतरस जोगी मैं मन ही मन बौराई रे "पी"आकर्षण माया,भ्रम में तर्क-वितर्क के उलझे क्रम में सुन मधुर गीत रूनझुन जोगी राह ठिठकी मैं चकराई रे उड़-उड़कर हुये पंख शिथिल



तुझे भुला ना पाया हूँ

कोशिशें लाख की मगर तुझे भुला ना पाया हूँ तस्वीर तेरी दिल से हटा ना पाया हूँ खुदा के घर में बैठा हूँ मगर नाम तेरा ही है लबों पर उसकी इबादत भी कर ना पाया हूँमहफ़िलों में मिलते हैं हसीन कई, मगर ढूँढती है जिसे नज़रदीदार उसके कर ना पाया हूँ मोहब्बत की वजह से है ज़िंदगी मेरीमगर, जिससे की है मोहब्बतउसे बात



ज़रूरी तो नहीं

जो बसा है मेरे दिल मेंउसकी तस्वीर ले कर घूमूँ ज़रूरी तो नहींजो समाया है मेरी रूह मेंउसके साथ हर घड़ी रहूँज़रूरी तो नहींजिसकी ख़ुशबू है मेरी साँसों मेंउसके नज़दीक ही रहूँज़रूरी तो नहींजो घुल गया है मेरी शायरी मेंउससे गुफ़्तगू हर पल करूँज़रूरी तो नहीं२० सितम्बर २०१८जिनेवा



अक्सर समझ नहीं पाते हैं लोग

अक्सर समझ नहीं पाते हैं लोग मन से मन की बातों को,शब्दों के जज्बातों को, सोचती जागती रातों को, अक्सर समझ नहीं पाते हैं लोग.......संबंधों की गहराई को, समय की दुहाई को, अपनों की अच्छाई को,अक्सर समझ नहीं पाते हैं लोग....... नेह से



तेरा संदेश

किसी उजड़े हुए गुलशन को जैसे साख दे दी हो...किसी गुजरे हुए लम्हें की जैसे राख़ दे दी हो...हृदय की कश्मकश आग़ोश में थामे हुए पल-पलकिसी उम्मीद के आँशू को जैसे प्यास दे दी हो...कभी हर पल जहाँ रहती थी बस यादों की बीनाई...अचानक थम गई कुछ पल मुक़म्मल दर्द-ए-तन्हाई...असम्भव है मग़र फ़िर भी अनोखा सा नज़ारा है...कि



खफा

वक्त से आज अभी मुलाकात हुई मेरी, कहने लगा, देरी से बहुत खफा हूँ तेरी.जो जब करना था तब तूने नहीं किया,सुधर जा,गलतियां हो चुकी है बहुतेरी.जाग जा आलस को कह कि भाग जा,मेहनत से किस्मत चमक जाएगी तेरी.रुकना नहीं अब झुकना भी नहीं कहीं ,तभी तो होगी मंजिल से पहचान तेरी. कुछ नय



"कुंडलिया"

“कुंडलिया”कितना कर्म महान है, व्यर्थ न होती नाल सरपट घोड़ा दौड़ता, पाँव रहे खुशहाल पाँव रहे खुशहाल, सवारी सुख से दौड़े मेहनती मजदूर, स्वस्थ रहता जस घोड़े कह गौतम कविराय, कर्म फलता है इतनाजितना फलता आम, काम सारथी कितना॥ महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



इश्क़ का रोग ना लगाना

और सब कुछ लगाना इश्क़ का रोग ना लगाना केसर कस्तूरी है ये माया भूल के भी इसको अंग ना लगाना चाहे बनो चिराग चाहे बनो दीया कभी किसी के घर को आग ना लगाना ये जिस्म एक सफ़ेद



हो सके तो मुझे माफ़ करना नम्बी!

समाचार आया है -"इसरो के वैज्ञानिक को मिला 24 साल बाद न्याय"न्याय के लिये दुरूह संघर्ष नम्बी नारायण लड़ते रहे चौबीस वर्ष इसरो जासूसी-काण्ड में पचास दिन जेल में रहे पुलिसिया यातनाओं के थर्ड डिग्री टॉर्चर भी सहे सत्ता और सियासत के खेल में प



कितनी वांछित है?

कितनी वांछित है?✒️युवा वर्ग जो हीर सर्ग है, मर्म निहित करता संसृति काअकुलाया है अलसाया है, मोह भरा है दुर्व्यसनों कापिता-पौत्र में भेद नहीं है, नैतिकता ना ही कुदरत का;ऐसी बीहड़ कलि लीला में, आग्नेय मैं बाण चलाऊँकहो मुरारे ब्रह्म बाण की, महिमा तब कितनी वांछित है?जो भविष्य को पाने चल दे, वर्तमान का भा



19 सितम्बर 2018

गीत सुनो

दुःख,व्यथा,क्षोभ ही नहीं भरा बस विरह, क्रोध ही नहीं धरा मकरंद मधुर उर भीत सुनो जीवन का छम-छम गीत सुनो ज्वाला में जल मिट जाओगे गत मरीचिका आज लुटाओगे बनकर मधुप चख लो पराग कुछ क्षण का सुरभित रंग-राग अंबर से झरता स्नेहप्रीत सुनो कल-कल प्रकृति का गीत सुनो क्यूँ उर इतना अवसाद भरा? क्यूँ तम का गहरा गाद



मातृभाषा एवम विदेशी भाषा

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"मुक्त काव्य" जी करता है जाकर जी लू , बोल सखी क्या यह विष पी लू

"मुक्तकाव्य" जी करता है जाकर जीलूबोल सखी क्या यहविष पी लूहोठ गुलाबी अपना सीलूताल तलैया झीलविहारसुख संसार घरपरिवारसाजन से रूठा संवादआतंक अत्याचारव्यविचारहंस ढो रहा अपनाभारकैसा- कैसा जगव्यवहारहोठ गुलाबी अपना सीलूबोल सखी क्या यहविष पी लू॥ डूबी खेती डूबेबाँधझील बन गई जीवन साधसड़क पकड़ती जबरफ्तारहो जाता जी



गीत

मानव जब राह भटक जाता , -नैतिक मूल्यों से हट जाता , - तब मानवता अपने पावन आदर्श बता उससेकहती -



"कुंडलिया" खेती हरियाली भली, भली सुसज्जित नार।

"कुंडलिया"खेती हरियाली भली, भली सुसज्जित नार।दोनों से जीवन हरा, भरा सकल संसार।।भरा सकल संसार, वक्त की है बलिहारी।गुण कारी विज्ञान, नारि है सबपर भारी।।कह गौतम कविराय, जगत को वारिस देती।चुल्हा चौकी जाँत, आज ट्रैक्टर की खेती।।-1होकर के स्वछंद उड़े, विहग खुले आकाश।एक साथ का है सफर, सुंदर पथिक प्रकाश।।सुं



मुरझाई इक शाम में -

मुरझाई इक शाम में -जब तुम मिले -यादों की अंजुमन में कुछ याद आया -कह्कशो ,गुफ़्तगू ,कुछ चुभने जैसी बाते -यादों में लिपटी -मखमली सी सिलवटों में परत दर परत खुलने लगी -जैसे सुबह की पहली किरन के साथ -महकते फूल खिलते हो -मुरझाई शाम की बेला महक उठी -तुम्हारे साथ बिताये समय को याद कर के ,ख़ैर चलो तुम्हारी याद



“मुक्तक” हिंदी सिर बिंदी सजी, सजा सितंबर माह।

हिन्दी दिवस के सुअवसर पर आप सभी को दिल से बधाई सह शुभकामना, प्रस्तुत है मुक्तक....... ॐ जय माँ शारदा......!“मुक्तक”हिंदी सिर बिंदी सजी, सजा सितंबर माह। अपनी भाषा को मिला, संवैधानिक छाँह।चौदह तारिख खिल गया, दे दर्जा सम्मान- धूम-धाम से मन रहा, प्रिय त्यौहारी चाह॥-1बहुत बधाई आप को, देशज मीठी बोल। सगरी





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