महादेवी वर्मा की 11 प्रसिद्ध कवितायेँ - Mahadevi verma poems in hindi

अधिकारवे मुस्काते फूल, नहींजिनको आता है मुर्झाना,वे तारों के दीप, नहींजिनको भाता है बुझ जाना;वे नीलम के मेघ, नहींजिनको है घुल जाने की चाहवह अनन्त रितुराज,नहींजिसने देखी जाने की राह|वे सूने से नयन,नहींजिनमें बनते आँसू मोती,वह प्राणों की सेज,नहीजिसमें बेसुध पीड़ा सोती;ऐसा तेरा लोक, वेदनानहीं,नहीं जिसम



माँ

ये कविता एक माँ के प्रति श्रद्धांजलि है। इस कविता में एक माँ के आत्मा की यात्रा स्वर्गलोक से ईह्लोक पे गर्भ धारण , बच्ची , तरुणी , युवती , माँ , सास , दादी के रूप में क्रमिक विकास और फिर देहांत और देहोपरांत तक दिखाई गई है। अंत में कवि माँ क



क्या यह समझदारी है

* क्या यह समझदारी है * ? ? ?हर समय समझदारी का बोझ लिये रहना (गंभीर बने रहना), क्या समझदारी है;हर बार समझदारी दिखलाते रहना, क्या समझदारी है। ???कुछ कुछ गलती करते रहना (सीखते रहना), भी समझदारी है;कभी कभी समझदारी न दिखलान



यह मेरा जीवन कितना मेरा है ?

** यह मेरा जीवन कितना मेरा है ? ** यह जीवन जो मैं जी रहा हूं, वो किस का है? वो किस किस का है? हम में से प्रत्येक यह प्रश्न, इस तरह के प्रश्न स्वयं से कर सकता है। यह जीवन जो मैं जी रहा हूं, मैं उसको मेरा कहता हूं, समझता हूं। पर यह मेरा जीवन कितना मेरा है? हम कह



ख़ामोशी : खामोश हूँ आज मैं कुछ तो बात है

Hindi poem - Hidden Feeling of Love खामोश हूँ आज मैं कुछ तो बात है ये ख़ामोशी क्यूँ है पता नहीं , कुछ तो बात है...हर दिन हर पल एक अजीब एहसास है ज़िंदगी का ये मेरे साथ अच्छा मज़ाक है फिर भी में खामोश हूँ कुछ तो बात है….साथ रहता है कोई तो अच्छा लगता है उस कोई का मतलब क्या



कोशिश करने वालों की हार नहीं होती - सोहनलाल द्विवेदी

Hindi poem - koshish karne walon ki लहरों से डर कर नौका पार नहीं होतीकोशिश करने वालों की हार नहीं होतीनन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती हैचढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती हैमन का विश्वास रगों में साहस भरता हैचढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता हैआख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होतीकोशिश करने वालों की हार नहीं



बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ

ये कविता बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ कार्यकर्म के अंतर्गत दूरदर्शन हिसार में काव्य पथ कार्यकर्म में प्रस्तुत हुई है. ज्यादा से ज्यादा सुने शेयर करे और अपने दोस्तों को सुनाये . यूट्यूब पर ही सुने. धन्यवाद् आपके सुझाव का स्वागत है



प्राइमरी का मास्टर

हर एक काम निपुणता से करता हूँ,फिर क्यूं सबकी आँखों को खलता हूँ,गाँव -गाँव शिक्षा की अलख जगाता हूँ,नित प्रति बच्चों को सबक सिखाता हूँ गर्व मुझे कि मैं प्राइमरी का मास्टर कहलाता हूँ।।सबको स्वाभिमान से रहना सिखलाता हूँ,सबको हर एक अच्छी बात बताता हूँ प्रतिदिन मेन्यू से एम.डी.एम बनवाता हूँ,खुद चखकर तब बच



ऐतराज़...

ऐतराज़...एक दौर है ये जहाँ तन्हां रात में वक़्त कट्टा नही... वो भी एक दौर था जहाँ वक़्त की सुईयों को पकड़ू तो वक़्त ठहरता नही... एक दौर है ये जहाँ नजर अंदाज शौक से कर दिए जाते है... वो भी एक दौर था... जहाँ चुपके चुपके आँखों मैं मीचे जाते थे... एक दौर है ये जहाँ आंसू बहते



उल्टा सीधा

शीर्षक - उल्टा सीधा प्रस्तुत है उल्टा पर सीधा करके। जीवन में पूरी पूरी स्वतंत्रता है;जीवन में पूरी पूरी छूट है।हम स्वयं की ऐसी तैसी करते रहें; स्वयं की ऐसी की तैसी करते रहें;स्वयं की पूरी दुर्दशा करते रहें;इसकी भी पूरी पूरी छूट है;हम इसका उल्टा भी कर सकते हैं, यहां इ



मैं कट्टर नहीं हूं

मैं कट्टर नहीं हूं स्वयं को भारतीय कहना, मानव कहना कट्टरता नहीं है; अपनी जड़ों से जुड़े रहना; जो समूचे विश्व को एक माने, एक कुटम्ब माने, ऐसी जड़ों से जुड़े रहना कट्टरता नहीं है।



प्रेम है शब्द ऐसा

हज़ारो दीप भी कम है अंधेरो को मिटाने के लियेहो संकल्प मन में अगर तो एक दीप काफी है उजाले के लिये प्रेम है शब्द ऐसा किभेद आपस के मिटाता मगरएक कटु वचन ही काफी है दोस्ती मिटाने के लियेअगर भूल जाये रास्ता कोईअगरतो दिया झोपड़ी का ही काफी है रास्ता दिखाने के लिएजीवन में लग



जीवन और परम्परा

जीवन और परम्परा परम्परा होती है परम्परा, जीवन नहीं; परम्परा होती है जीवन केलिए, परम्परा केलिए जीवन नहीं; जीवन प्रथम है परम्परा नहीं; जो परम्परा जीवन विरोधी हो जाए उसको कभी मानना नहीं; समय में पीछे झांक



"कुंडलिया"

"कुंडलिया"वीरा की तलवार अरु, माथे पगड़ी शान।वाहेगुरु दी लाड़िली, हरियाली पहचान।।हरियाली पहचान, कड़ा किरपाण विराजे।कैसी यह दीवार, बनाई घर-घर राजे।।कह गौतम कविराय, नशा मत करना हीरा।मत हो कुड़ी निराश, कलाई थाम ले वीरा।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



प्रकृति और हम ( बच्चों केलिए )

((( बच्चों केलिए, जो दिल और दिमाग से बच्चे हैं उनके लिए, जिन्होंने स्वयं के अंदर स्वयं का बचपन जीवित रखा है ))) *प्रकृति और हम*प्रकृति का साथ देने का वादा करें;हम सब मिलकर, प्रकृति का साथ देने का वादा करें। सब में ऊर्जा भरने को, सूरज नित काम करता;हमारे जीवन हेतु,



सपने ..

कुछ सपने केवल सपने ही रह जाते हैं बिना पूरे हुये, बिना हकीकत हुये और हमे वो ही अच्छे लगते हैं अधूरे सपने, बिना अपने हुये हम जी लेते हैं उसी अधूरेपन कोउसी खालीपन कोसपने की चाहत मेंजानते हुये भी ....सपने तो सपने हैंसपने कहाँ अपने हैंयथार्थ को छोड़करपरिस्थिति से मुह मोड़करहम जीते हैं सपने मेंसपने हम रोज



"पिरामिड"

"पिरामिड"क्याहुआसहाराबेसहाराभूख का मारालालायित आँखनिकलता पसीना।।-1हाँचोरसिपाहीसहायतापक्ष- विपक्षअपना करमबेरहम मलम।।-2महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



बचपन के दिन

कल याद आ गया मुझको भी अपना बचपनखुश हुई बहुत पर आँख तनिक सी भर आयीगांवों की पगडण्डी पर दिन भर दौड़ा करतीकुछ बच्चों की दीदी थी, दादी की थी राजदुलारीरोज़ सुनती छत पर दादाजी से



बादल ने पूछा धरती से

बादल ने पूछा धरती से तुंम इतनी सहनशील कैसे रहती होमें बदली बरसा दूँ तो तुममिटटी की सुगंध बिखेर देती होझूम झूम कर बरसूं तो जल समेट लेती होबरसा दूँ ओले तो दर्द सहकर भी कुछ नही कहती होधरती मुस्काई, बोली तुंम भी पिता की तरहबच्चों के



एक अधूरी कहानी लिखकर, एक शायरा गुमनाम हो जाएगी

जो दिल में है वो मेरी जिंदगी नहीं ,जो जिंदगी हैवो मेरे दिल में नहीं ,हाथ पकड़ चल रहा है कोई ,डोर मन का खींचता है कोई,आज और कल में उलझकर , खुद से ही बगाबत कर रही हूँ मैं ,आगोश में पल रही हूँ किसी के ,आँखों में है छवि किसी और की ा जो दर्द मेरे दिल में ऊपजा है ,न





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