नज़्म बेरोज़गार

नज़्म- "बेरोज़गार" तो और इक बार फिर मेरा सेलेक्शन हो नहीं पाया मेरी हर एक नाकामी पे रस्सी मुस्कुराती है ख़ुशी से ऐंठती है और नये बल उसमें पड़ते हैं मुझे अपना गला घुटता हुआ महसूस होता है........ मैं अपनी छत से जब नीचे गली में झांकता हूँ तो ये लगता है सड़क मुझको उछलकर खीं



वक़्त

ये कविता वक़्त के बदलते मिज़ाज से सम्बंधित है इसमें ये बताया गया है ,कि किस तरह से समय व्यक्ति के जीवन में बदलाव ला सकता है वक़्त आज सवार



इस्तीफा

कांग्रेस में बढ़ते इस्तीफे का चलन देखकर मेरी पत्नी का शौक चर्राया.. और उसने कुछ लिख कर एक कागज़ का टुकड़ा मेरी तरफ बढ़ाया .."चालीस साल तक तुम्हारे साथ रहने के बाद तुम्हारी जवानी खो जाने की ज़िम्मेदारी ले रही हूँ,और इसीलिए "गृहणी " के पद से इस्तीफा दे रही हूँ."बेबस कांग्रेस की तरह मैंने भी चारो तरफ नज़र



तुमसे हे पिता

पिता पर लिखी अपनी एक बहुत पुरानी रचना याद आ गयी..कुछ अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ.."तुमसे हे पिता !"कितनी मन्नत कितनी पूजा,कितनी कामना किया होगा,पुत्रों का पथ हो निष्कंटक पल पल आशीष दिया होगा...मेरे लिए कभी तुमने रूखी सूखी रोटी खायी ,दरदर भटके मेरी खातिर संचित की पाई-पाई .



बंधे बंधे से साथ चलें

बंधे बंधे से साथ चलें ...मैं अक्षर बन चिर युवा रहूं, मन्त्रों का द्वार बना लो तुम,हम बंधे बंधे से साथ चलें, मुझे भागीदार बना लो तुम.जीवन की सारी उपलब्धि, कैसे रखोगे एकाकी? तुमको संभाल कर मैं रखूँ, मेरे मन में जगह बना लो तुम.कोई मुक्त नहीं है दुनिया में, ईश्वर, भोगी या संन्यासी,प्रिय! कैसे मुक्



शहर के पेड़ से उदास लगते हो...

दबी जुबां में सही अपनी बात कहो,सहते तो सब हैं......इसमें क्या नई बात भला!जो दिन निकला है...हमेशा है ढला!बड़ा बोझ सीने के पास रखते हो,शहर के पेड़ से उदास लगते हो...पलों को उड़ने दो उन्हें न रखना तोलकर,लौट आयें जो परिंदों को यूँ ही रखना खोलक



तुम से मिलने को जी चाहता है.

तुम से मिलने को जी चाहता है. ना हकीकत से भाग सकता हूँ, ना ख्वाबों में जी सकता हूँ, ना जाने क्यों फिर भी तेरे ख्वाबों में जीने को जी चाहता है. हकीकत में मिलना मुमकिन ना सही, ख़्वाबों में आना कुछ कम तो नहीं.



तू कविता हैं मुझ बंजारे की

तू कविता हैं मुझ बंजारे की, सुबह की लाली, शाम के अँधियारे की, वक्त के कोल्हू पे रखी, ईख के गठियारे की, हर पल में बनी स्थिर, नदियों के किनारे की, सूरज की, धरती की, टमटमाते चाँद सितारे की, हान तू कविता है मुझ बंजारे की। तू कविता हैं मुझ बंजारे की, रुके हुए साज पर, चुप्पी के इशारे की, इस रंगीन समा में



चटकांगनाएँ

सज सवंरके आती हैं जब वो सखियों के संग में लजाती लुभाती स्वयं में सकुचाती हर क़दम हर आहट पे रखती हैं ध्यान कहीं कोई अनजाना रस्ता न रोक ले कोई छू न ले उन अनछुई कोमल कलियों को



"मंगल गीत "

"मंगल गीत "-------------जालिम सर चढ़ बोल रहा है, बंदूकों के साये में वन्देमातरम में कब तक हम, कौम को जगायेंगे | नरमुण्ड माला वाली माँ, कितना उसे दिखाएँगेखून के प्यासे कातिल भरमाते आएंगे- भरमाएंगे ||तीर -त्रिशूल पे कहाँ तक, विषधर का थूक लगाएंगे जावाज़ खड़ा भारत मेरा कब हम जय हिंद गाएंगे | माना युद्ध



हास्य व्यंग्य आधारित सृजन

"चमचा भाई"काहो चमचा भाई कैसे कटी रात हरजाईभोरे मुर्गा बोले कूँ कूँह ठंडी की ऋतु आईहाथ पाँव में ठारी मोरे साजन की बीमारीसूरज ओस हवाई घिरि बदरी दाँत पिराई।।आज का चमचा, चमचों की के बात कर, हरदम रहते चुस्तचखें मसाला रस पियें, छौंक लगे तो सुस्त।।बड़े मतलबी यार हैं, हिलते सुबहो शामकंधे पर आसन धरें, चमची सह



बातचीत की खिड़की

एक दिन जी मेल पर…अवसर मिला लॉग इन करने का.…सोचा सब दोस्तों से कर लूँगा बातचीत…जान लूँगा हाल उनके …और बता दूंगा अपने भी.…एक दोस्त को क्लिक किया …. चैटिंग लिस्ट में से ढूंढ कर…चेट विंडो में उसकी … लाल बत्ती जल रही थी.…जो एक चेतावनी दे रही थी.…दोस्त इज बिजी, यू मे इन्टरुप्टिंग.…हमे आया गुस्सा … बोले चे



महान कवि सुमित्रानंन्दन पंत जी की जीवनशैली व उनकी अमर कवितायें

सुमित्रानन्दन पन्त जी का जीवन परिचय - ( Biography of Sumitranandan Pant) महान कवि सुमित्रानंदन पन्त जी का जन्म कुर्मांचल प्रदेश में अल्मोड़ा जिला के कौसानी नामक ग्राम में सन् 1900 ई. में हुआ था और इनके माता-पिता द्वारा रखा गया बचपन का नाम गुसाईं दत्त था | इनके जन्म के कुछ घंटों बाद ही इनकी माता ज



महारानी लक्ष्मीबाई की शहादत और उनकी स्मृति में कुछ पंक्तियां

भारत को अंग्रेजों से आजाद कराने के लिए 1857 की क्रांति में महारानी लक्ष्मीबाई का योगदान आज भी लोगों को याद है और यह देश के सभी युवाओं के लिए एक तरह से प्रेरणा की श्रोत मानी जाती हैं। जिनका जन्म 19 नवंबर 1828 को एक मराठा ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके बचपन का नाम मणिकर्णिका था और लोग इन्हें प्यार स



मुक्तकाव्य

"मुक्तकाव्य"कुछ कहना चाहता है गगनबिजली की अदा में है मगनउमड़ता है घुमड़ता भी हैटपकता और तड़फता भी हैलगता है रो रहा है अपनी अस्मिता खो रहा हैसुनते सभी हैं पर कहाँ है मननकुछ कहना चाहता है गगन।।कौन कर रहा है दमनसभी की चाह है अमनकोई छुपकर रोता हैकोई हृदय में बीज बोता हैलगता है जमीन खिसक रहीबिना ईंधन आग धधक



हिंदी भाषा

कई दशको पहले, यदि भारत में कुछ ऐसा घट जाता,जिस से ये देश धन सम्पन्न और विकसित बन जाता, चहुँमुखी विकास के साथ साथ,अन्तराष्ट्रीय व्यापर भी शशक्त हो जाता, और शशक्त हो जाती हिंदी भाषा, भारत में तो चारो और हिंदी बोली जाती ही ,और विदेशी भी हिंदी बोलते हुए आता,लड़खड़ाती हुई हिंदी बोलते हुए जब विदेशी आता,तो म



मैं भी देख दीवानी बन गई हूं

ए हमदम मेरे और दीवाने मेरे मैं भी देख दीवानी बन गई हूं मुहब्बत का तेरी ऐसा असर है हरी बेल सी आज मैं तन गई हूं मेरा मोल समझा ना पहले किसी ने मुझको फकत एक नाचीज समझा तूने मोल मेरा है जब से बताया अब तो मैं अनमोल बन धन गई हूं अकेली थी जब तो हिम्मत नहीं थी चारो तरफ नाग लहरा रहे थे जब से मिला है तेरा साथ



झंकार

अगर प्यार होता नहीं मेरे मन में तो कैसे मैं इसका इकरार करती कितना भी चाहे तू मुझको लुभाता इसका ना हरगिज मैं इजहार करती औरत के मन में बसे गर ना कोई उससे वो फिर दूरियां है बनाती फिर भी अगर कोई पीछा करे तो ऊंची मैं छिपने को दीवार करती राहों में तेरी पलके बिछा कर बैठी हूँ कब से तुझे देखने को अगर मेरे दि



जादू

वो जादू है मुहब्बत में जवां जो मन को करता है ना जाने फिर भी क्यों इंसान प्रीति धन को करता है बोल वो प्यार के तेरे समां जाते हैं नस नस में लहू सा बन के फिर ये प्रेम शीतल तन को करता है मुहब्बत की आस पाले नाचते मोर को देखो मोरनी से मिलन को प्यार वो इस घन को करता है मुहब्बत के वार से ही उसने दुनिया हरा



खबर लो

मधुर मिलन की है आस मन में कोशिश जरा तो कर लो मुझको लगाओ सीने से अपने बाहों के बीच भर लो ये जिंदगी है कुछ पल का मेला सोचो ना हद से ज्यादा औरों की सुन के देखो ना हरदम सूनी कोई डगर लो दिल में छुपा के कब तक रखोगे मन जो भी कह रहा है अधरों के बीच तुम भी सनम ए मेरी ही सांस धर लो इंसान हो तो इंसा रहो ना भगव





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