"सामान"

मेरी एकादशोत्तरशत काव्य रचना (My One Hundred eleventh Poem)"सामान"“घर-घर सामान भरा पड़ा हैहद से ज्यादा भरा पड़ा हैखरीद-खरीद के बटुआ खालीखाली दिमाग में सामान भरा पड़ा है -१हर दूसरे दिन बाहर जाना हैनयी-नयी चीजें लाना हैजरूरत है एक सामान कीढोकर हजार सामान लाना है-२अपने घर में जो रखा हैउसकी खुशी न करना



श्री राम चरित मानस पाठ

‼️ भगवत्कृपा हि केवलं‼️ओम् नमो भगवते वासुदेवाय श्री राम चरित मानस 🌻अयोध्याकाँड🌻गतांक से आगे... चौपाई-एक कलस भरि आनहिं पानी।अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी।।सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी।राम कृपाल सुसील बिसेषी।।जानी श्रमित सीय मन माहीं।घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाहीं।।मुदित नारि नर दे



- कसिक जानु छोड़ के पहाड़ -

<!--[if !supportLists]-->- <!--[endif]-->कसिक जानु छोड़ के पहाड़ - एकलि पराणी बसि इन डानों मेंजा, फिर एगो पूष को यो जाड़ , ओ ओ कसी जानु छोड़ के पहाड़, -नानतिन न्हेगि छोड़ बेर घरा, गोरू- बाछि बेचि , छाती ढुंग धरा, पाथर की धुरी, चाक में छौ खावा , देवतोंक थाना लागि रई जावा,खेतीबाड़



चिंगारी

चिंगारीयह कविता नहीं,चिंगारी है...फिर दिल दिल सेजाग उठेगीराष्ट्र पुरुष को स्मरते, स्मरतेइसकी अन्तिम सास रुकेगी ।। धृ ।।यह शब्दों का खेल नहींना कोई मनोरंजन की धारायह स्मरण है सब उनकाजिनका,राष्ट्र समर्पित जीवन सारा ।। १ ।।यह विचारोकी धारा हैराष्ट्रधर्म कि ज्वाला हैव्यक्



आगे बढ़ना काम हमारा..!

आगे बढ़ना काम हमाराजलने दो जलना है जिनकोआगे बढ़ना काम हमाराभारत मां के राष्ट्र यज्ञ मेंसमिधा का है स्थान हमारा ।। धृ ।।बाधाएं बाधक होने दोकस कस करसाधक होंगे हममुसीबतों को फिर आने दोजीवन अर्पित योद्धा होंगे हम ।। १ ।।भौतिकता के अंधियारों मेंजलने वाले दीपक होंगे हमस्वार्थता के भ्रष्ट प्रवाह मेंगंगा से



अनमोल वचन ➖ 5

अनमोल वचन ➖ 5दीप से दीप की ज्योति जलाई, दिवाली की ये रीति निभाईएक कतार में रखि के सजाई, फिर सब कुशल क्षेम मनाई।पाँच दिनों का त्योहार अनोखा, भाऊबीज तक सजे झरोखापकवानों का खुशबू हो चोखा, हर कोई रखता है लेखा-जोखा।धनतेरस की बात निराली, करते हैं सब अपनी जेबें खालीकोई खरीदे सोना-चाँदी तो, कोई बर्तन शुभ दि



रौशनी का त्योहार

साहित्य मित्र मंडल, जबलपुर(व्हाट्सऐप्प्स् समुह संख्या: १ - ८)रविवासरीय प्रतियोगिता में ''श्रेष्ठ सृजन सम्मान ''हेतु चयनित मेरी रचनादिनांक: १५.११. २०२०विषय: रोशनी का त्योहार🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔रौशनी का त्योहार दीपावाली- सबको है भाता।।कोई लक्ष्मी पूजन करता, कोई बड़ा



माँ शारदे

वर्ड पिरामिडहे!मातु!शारदेतम दूरमेरे कर देन हो कभी अहंमातु कृपा कर देमैंहूँ माँअज्ञानीकर जोड़करूँ विनतीहे हँसासिनी माँज्ञान सार भर दे स्वरचित:-अभिनव मिश्र"अदम्यशाहजहांपुर,उत्तरप्रदेश



मेरी जलती हुई कहानी

आज दीपोत्सव की सभी को अनेकशःहार्दिक शुभकामनाएँ...माटी के ये दीप जलानेसे क्या होगा, जला सको तो स्नेह भरे कुछ दीप जलाओ |दीन हीन और निर्बल सबहीके जीवन में स्नेहपगी बाती की उस लौ को उकसाओ ||दीपमालिका मेंप्रज्वलित प्रत्येक दीप की प्रत्येक किरण हम सभी के जीवन में सुख, समृद्धि,स्नेह और सौभाग्य की स्वर्णिम



आओ हम सब मिलकर ऐसा दीप जलाएँ

आओ हम सब मिलकर ऐसा दीप जलाएँआओ हम सब मिलकर ऐसा दीप जलाएँदीप बनाने वालों के घर में भी दीये जलाएँचीनी हो या विदेशी हो सबको ढेंगा दिखाएँअपनों के घर में बुझे हुए चूल्हे फिर जलाएँअपनें जो रूठे हैं उन्हें हम फिर से गले लगाएँ।आओ हम सब मिलकर ऐसा दीप जलाएँजो इस जग में जगमग-जगमग जलता जाएजो अपनी आभा को इस जग म



गरीब की दीवाली

गरीब की दीवाली दीवाली के दिए जले हैं घर-घर में खुशहाली है।पर इस गरीब की दीवाली लगती खाली खाली है।पैसा वालों के घर देखोअच्छी लगे सजावट है।इस गरीब के घर को देखोटूटी- फूटी हालत है।हाय-हाय बेदर्द विधातागला गरीबी घोट रही।बच्चों के अब ख्वाब घरौंदेलाचारी में टूट रही।जेब पड़ी है खाली मेरीकैसे पर्व मनाऊं म



दीपों का त्यौहार

दीपों की जगमग है दिवाली दीपों का श्रृंगार दिवाली है माटी के दीप दिवाली मन में खुशियाँ लाती दिवाली || रंगोली के रंग दिवाली लक्ष्मी संग गणपति का आगमन दिवाली स्नेह समर्पण प्यार भरी मिठास का विस्तार दिवाली अपनों के संग अपनों के रंग में घुल जाने की प्रीति दिवाली हाथी घोड़े मिट्टी के बर्तन फुलझड़ियों का



भावना का दीप

कल हमारी प्यारी बिटिया स्वस्ति ने बहुत हीनयनाभिराम पुष्प “प्रवीर शर्मा जीतसिंह” को जन्म दिया... नानी बनने पर कैसे आनन्दका अनुभव होता है इसका कल पता चला... अचानक ही “पदोन्नति” का आभास होने लगा... आनन्दके आवेग में कुछ पंक्तियाँ मन में उपजीं... जो आपके साथ साँझा करने का मन हुआ...कात्यायनी... भावना के द



लड़की बोझ!

••••●ऐसा क्यों होता है?●•••मैं जब आई माँ की गोदी में बहुत हाथ-पैर चलाईथक -थका कर मुझे गहरी नींद जब थी आईचट-पट पलने में सुला मुझसे माँ पिण्ड छुड़ाईपापा-चाचा-ताऊ ने जी भर खिलाया-हुई संग बाजार धुमाईचलना सिखी तब छत पर नीली-पीली पतंग बहुत उड़ाईभाई बहनों संघ जब-तब झड़प औरप्यार भरी लड़ाईसखियाँ बनी कई तो को



अनमोल वचन ➖ 4

अनमोल वचन ➖ 4दाता इतना रहमिए, कि पालन-पोषण होयपेट नित भरता रहे, अतिथि सेवा भी होय।दीनानाथ हैं अंतर्यामी, सहज करें व्यापारबिना तराजू के स्वामी, करें हैं सम व्यवहार।सबकुछ तेरा नाम प्रभु, इंसा की नहीं औकातपल में राजा तू बनाए, पल में रंक बनि जात।नाथ की लीला निराली,क्या स्वामी क्या मालीबाग की रक्षा माली



धूप शरद की

शरद ऋतु की कोमल मुलायम सी धूप... ध्यान से देखेंगे तो अनगिनतीरूप... रंग और भाव दीख पड़ेंगे... कभी किसी नायिका सी... तो कभी श्वेत कपोत सी...तो कभी रेगिस्तान की मृगमरीचिका सी... कुछ इसी प्रकार के उलझे सुलझे से भावों केसाथ प्रस्तुत है हमारी आज की रचना... धूप शरद की... कात्यायनी...https://youtu.be/hVjKTmk



अभिनव मिश्र"अदम्य

प्रतियोगिता के सम्मान पत्र



करवा चौथ

जला के प्रीत का दीपक रहे उपवास वो निर्जलसजे श्रंगार सब देखो लगा है आंख में काजलपहन कंगन लगा बिंदी बंधी हैं पांव में पायलछुपेगा चांद भी इनसे, करेंगी रूप से घायलअभिनव मिश्र"अदम्य



मत्तगयंद सवैया

मत्तगयंद सवैयासात भगण अंत दो गुरु211 211 211 211, 211 211 211 22साजन छोड़ गए परदेश लगे घर सून मुझे दिन राती।दूर पिया सुध में प्रियसी दिन रात जलूं जस दीपक बाती।कौन कसूर हुआ हमसे प्रिय छोड़ गए सुलगे निज छाती।ब्याह किया खुश थे कितना पर आज कहें मुझको अपघाती।निश्चल प्रेम किया उनसे समझे न पिया दिल की कछु बा



मेरा ख़्वाब माँगते हैं ...

मेरा ख़्वाब माँगते हैं ...इतने वेवश चेहरे, कि नकाब माँगते हैं,बंद करूँ आँखें , मेरा ख़्वाब माँगते हैं । बचपन की यादें ,जवानी के लुक –छिपे,ये चोरी –चोरी, मेरी किताबमाँगते हैं । छुपा छुई –मुई में, हर –सिंगार में फँसा,इम्तहान लेते मेरा , ये गुलाब माँगते हैं । दर्द की झाइयाँ नर्म, पलकों की सिंहरन,मज़ा





आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x