सुख समृधि के लिए करें नमक का ये गुप्त उपाय

नमक सिर्फ खाने को स्वादिष्ट ही नहीं बनाता बल्कि नमक में नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने की भी अद्भुत शक्ति होती है। वास्तु शास्त्र की मानें तो नमक में बुरी शक्तियों को दूर करने की बहुत शक्ति होती है। विस्तार से पढें



ब्रह्मांड का विस्तार

ब्रह्माण्ड का विस्तारईश्वर को हम सर्वव्यापक मानते हैं। वह इस ब्रह्माण्ड के कण-कण में व्याप्त है। उस परमात्मा की सत्ता का हम अनुभव तो कर सकते हैं पर उसे इन भौतिक चक्षुओं से देख नहीं सकते।          उसकी इस व्याप्ति का अर्थ हम कर सकते हैं - व्याप्त होने की अवस्था या भाव, विस्तार या फैलाव और सभी अवस्थाओ


नयी उम्मीदें

खुद ही से मैं नज़रें चुराने लगी हूं,उन यादों से दामन छुड़ाने लगी हूँ ।खुद ही से खुद ही का पता पूछती हूँ,न जाने कहाँ मैं विलीन हो चुकी हूँ ।अरमानों को अपने दबाने लगी हूँ,पहचान अपनी भुलाने लगी हूँ ।भटकने लगी राह मंज़िल की अपनी,कहूँ क्या किधर थी, किधर को चली हूँ । ....और पढ़ें



अन्न का अनादर नहीं

  अन्न का अनादर नहींअपनी थाली में मनुष्य को उतना ही भोजन परोसना चाहिए, जितना वह आराम से खा सकता है। यदि आवश्यकता से अधिक अन्न थाली में डाल लिया जाए, तो मनुष्य उसे खाने में असमर्थ हो जाता है। अतः वह बच जाता है और फिर उस बचे हुए भोजन को कूड़ेदान में फैंक दिया जाता है। इस तरह यह अनमोल अन्न बरबाद होता रह


रहा, न कैद में,

रहा, न कैद में।सुवा कैद में रहकर उड़ान भरने की कोशिश करता है।कबूतर ऊँची उड़ान भरकर कैद में खुद चला आता है।उड़ना दोनो चाहते है इस दुनीयाँ में, आदत जो है उड़ने की। एक बंधन तोड़ना सिखाता है दूसरा बंधन में जुड़ना सिखाता है। वही मुर्गा सभी को जगाने की कोशिश किया जिसकी वजह से उसे हलाल होना पड़ा। कुत्ता वफ़ादार हो



जीवन और मृत्यु की जंग

जीवन और मृत्यु की जंगहर मनुष्य जीवन और मृत्यु की जंग को सुविधापूर्वक जीत लेना चाहता है। वह इस जन्म-मरण के रहस्य को जानने और समझने के लिए हर समय उत्सुक रहता है। यह कुण्डली मारकर उसके जीवन में बैठा हुआ है। मनुष्य का सारा जीवन बीत जाता है, पर यह सार उसकी समझ में नहीं आ पाता। इन्सान क्या करे और क्या न क


चरित्रनिष्ठा :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में आने के बाद मनुष्य जीवन भर विभिन्न प्रकार की संपदाओं का संचय किया करता है | यह भौतिक संपदायें मनुष्य को भौतिक सुख तो प्रदान कर सकती हैं परंतु शायद वह सम्मान ना दिला पायें जो कि इस संसार से जामे के बाद भी मिलता रहता है | यह चमत्कार तभी हो सकता है जब मनुष्य का चरित्र श्रेष्ठ होता है , क्



एकान्तवास

एकान्तवासएकान्तवास यदि स्वैच्छिक हो तो मनुष्य के लिए सुखदायी होता है। इसके विपरीत यदि मजबूरी में अपनाया गया हो तो वह बहुत कष्टदायक होता है।          प्राचीनकाल में ऐसी परिपाटी थी कि जब घर-परिवार के दायित्वों को मनुष्य पूर्ण कर लेता था, यानी अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर योग्य बना देता था और बच्चों का कै


Clinical Psychology में करियर कैसे बनाया जाये

क्लीनिकल साइकोलॉजी में कौन - कौन से करियर हैं ? इस पोस्ट में जान सकते हैं। Clinical psychology me career kaise banaya jayeआज के दैनिक जीवन में कुछ लोग मनोरोग से पीड़ित होते हैं। ऐसे लोगों का clinical psychology के द्वारा इलाज किया जाता है। साइकोलॉजी के द्वारा मनुष्य की सोचन



आशा की किरण

  आशा की किरणजीवन में मनुष्य को हर प्रकार की स्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। स्थिति चाहे बुरी-से-बुरी हो या अच्छी-से-अच्छी हो, उसे अपना सन्तुलन बनाए रखना चाहिए। उसे उम्मीद का दामन नहीं छोडना चाहिए। आशा की एक किरण के सहारे मनुष्य कुछ भी कर गुजरता है।          मुझे अकबर और बीरबल का एक कि


लोहड़ी एवं मकर संक्रान्ति की शुभकामनाये

लोहड़ी एवंमकर संक्रांति की शुभकामनायें डॉ शोभाभारद्वाज सिंधूबार्डर पर लोहड़ी की अग्नि प्रज्वल्लित कर उसमें कृषि कानून की प्रतियाँ जलाते हुएचित्र खिचवाने की होड़ लग गयी . जबकि लोहड़ी हर्ष उल्लास का उत्सव है यह पंजाबहरियाणा हिमाचल और जम्मू दिल्ली में धूमधाम से मनाया जाता है . खेतिहरसमाज में बेटों का बहुत



🙏🙏आभार शब्दनगरी 🙏🙏🙏

🙏🙏शब्दनग री मंच के सभी सहयोगीयों को लोहड़ी और संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएँ और आभार। आज मंच से जुड़े चार साल हो गए। मेरे स्नेही पाठक वृन्द का कोटि आभार। उनके स्नेह का ऋण चुकाना असंभव है। शब्दनगरी मंच को नमन जिसने मेरी रचनात्मकता को दिशा और सार्थकता दोनों प्रदान की🙏🙏🙏🙏मंच पर मेरा पहला लेख


लोहड़ी और मकर संक्रान्ति

मकरसंक्रान्ति – सूर्य की उत्तरायण यात्रा का पर्व “ॐभूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् |”यजु. ३६/३ हमसब उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुख स्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूपपरमात्मा को अपनी अन्तरात्मा में धारण करें, और वह ब्रह्म हमारी बुद्धि कोसन्मार्ग में प



धन साधन है साध्य नहीं

धन साधन है, साध्य नहींहम नित्य प्रातः उठकर दिन की शुरूआत करते समय सोचते हैं कि जीवन में पैसा ही सब कुछ है। इसका कारण भौतिकवादिता है। मनुष्य को हमेशा याद रखना चाहिए कि धन केवल साधन है, साध्य नहीं। दूसरों की होड़ करते समय मनुष्य अपनी क्षमताओं को अनदेखा कर देता है। फिर बाद में परेशान होता रहता है।     


अपनों का साथ

अपनों का साथ अपने घर-परिवार और बन्धु-बान्धवों को यत्नपूर्वक विश्वास में लेना चाहिए। यदि अपनों का साथ किसी को मिल जाए, तो समझिए उस इन्सान ने जिन्दगी की जंग जीत ली है। इस विश्वास को जीतने के लिए मनुष्य को अपने स्वार्थ को त्याग देना चाहिए। अपने साथ-साथ अपनों को भी आगे बढ़ने का मौका देना चाहिए और आवश्यकत


राष्ट्रीय युवा दिवस

युवा शक्ति के प्रेरक और आदर्श स्वामी विवेकानंद (राष्ट्रीय युवा दिवस)स्वामी विवेकानंद भारतीय आध्यात्मिकता और जीवन दर्शन को विश्वपटल पर स्थापित करने वाले नायक हैं। भारत की संस्कृति, भारतीय जीवन मूल्यों और उसके दर्शन को उन्होंने ‘विश्व बंधुत्व व मानवता’ स्थापित करने वाले विचार के रूप में प्रचारित किया।



प्रदर्शनी आपकी फैसला आपका

प्राइवेसी, डेटा शेयरिंग, इनक्रिप्शन, मेटाडाटा , आजकल ये शब्द खूब सुनने को मिलते हैंकई लोग चिंतित हैं , कई लोग इस फिक्र को धुंए में उड़ा रहे हैं।अधिकतर लोगों को पता ही नहीं कि क्या हो रहा है तो आइए चर्चा करते हैं कि भिया आखिर ये मामला है क्या..?तो भिया, मामला शुरू होता



मूड के गुलाम हम

मूड के गुलाम हममानव मन उसे बड़े ही नाच नचाता है। यह सदा आगे-ही-आगे भागता रहता है। इसकी गति बहुत तीव्र होती है। मनुष्य देखता ही रह जाता है और यह पलक झपकते ही पूरे ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाकर वापिस लौट आता है। इससे पार पाना बहुत ही कठिन होता है। यह चाहे तो मनुष्य को सफलता की ऊँचाइयों पर पहुँचा सकता है और


साधना का दर्पण हैं वृक्ष :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन में प्रकृति का बहुत ही सराहनीय योगदान होता है | बिना प्रकृति के योगदान के इस धरती पर जीवन संभव ही नहीं है | यदि सूक्ष्मदृष्टि से देखा जाए तो प्रकृति का प्रत्येक कण मनुष्य के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत करता है | प्रकृति के इन्हीं अंगों में एक महत्वपूर्ण एवं विशेष घटक है वृक्ष | वृक्ष का मानव



सम्पूर्ण सृष्टि ही भगवामय है :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सृष्टि के आदिकाल से ही इस धराधाम पर सनातन धर्म की नींव पड़ी | तब से लेकर आज तक अनेकों धर्म , पंथ , सम्प्रदाय जो भी स्थापित हुए सबका मूल सनातन ही है | जहाँ अनेकों सम्प्रदाय समय समय बिखरते एवं मिट्टी में मिलते देखे गये हैं वहीं सनातन आज भी सबका मार्गदर्शन करता दिखाई पड़ता है | सनातन धर्म अक्षुण्ण इसल





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