सुसंस्कारित बच्चे

सुसंस्कारित बच्चेहर माँ की हार्दिक इच्छा होती है कि उसकी सन्तान आज्ञाकारी हो। हर मिलने-जुलने वाला मन से उसकी सराहना करे। अपने बच्चों की प्रशंसा सुनकर उसका हृदय बाग-बाग हो जाता है। वह स्वयं को इस दुनिया की सबसे अधिक भाग्यशाली माँ समझती है।          सन्तान सर्वत्र प्रशंसा का पात्र बने इसके लिए माँ का


मनुष्य की पूर्णता

मनुष्य की पूर्णतामाता के बिना मनुष्य का जीवन कभी पूर्ण नहीं होता बल्कि उसमें अधूरापन रह जाता है। माता जिसने मनुष्य को जन्म दिया है, इस संसार में लाने का महान दायित्व निभाया है, उसका पालन-पोषण करने के लिए अनेक कष्ट सहे हैं, उस माँ की अनदेखी उसे भूलवश भी नहीं करनी चाहिए। माता की आवश्यकता मनुष्य को जीव


प्यार की अमर कहानी

आज अदिती बेहद उदास थी तो सुमित ने उससे पूछा “क्या बात हैतुम्हारा मिज़ाज आज बदला-बदला सा क्यों है ?”“मैंने एक प्रेम कहानी पढ़ ली जिसमें नायिका नायकके चक्कर में अपनी जान से हाथ धो बैठती हैं।” अदिती ने कहा।“तो नहीं पढ़नी चाहिए थी।” सुमित ने कहा।“बहुत मशहूर थी और बेस्टसेलर भ



03 अप्रैल 2021

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आज मैैं आपको स्मार्टफोन पर हिन्दी site देखने एंव पढ़ने के लिए बता रहा हूँ कुछ एंड्रॉयड फोन पर हिन्दी साइट को पढ़ने मे मुश्किल हो जाती हैं आइये द…Read more§ Hinditechtrick



देश में अल्पसंख्यक मापने का पैमाना

1993 में तत्कालीन केंद्र की कांग्रेसी सरकार दवरा वोट बैंक व् तुष्टिकरणकी राजनीति को ध्यान में रखते हुए , अल्पसंख्यक मापने के लिए बनाया गया पैमानावर्ष 2021 आते-आते पूरी तरह से धवस्त/ विफल होगया है।पैमाने केआधार पर वर्तमान में धर्म आधारित छह वर्ग अल्पसंख



माँ रूपी उपहार

माँ रूपी उपहार माँ के रूप में एक बहुत ही अमूल्य उपहार मनुष्य को ईश्वर ने दिया है। उस परमात्मा को तो हम मनुष्य कभी इन चर्म चक्षुओं से देख नहीं सकते। परन्तु उस मालिक ने अपने प्रतिनिधि के रूप में जो माँ रूपी एक देवता मनुष्य को भेंट में दिया है, उसे हम प्रत्यक्ष देख सकते हैं। माता ईश्वर का ही दूसरा रूप


भगवान श्रीराम के आदर्श :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन में सुख एवं दुख आते जाते रहते हैं | कभी-कभी परिवार में ऐसी बातें हो जाती है जो कि कष्टकारी होती है परंतु ऐसे समय पर मनुष्य को धैर्य धारण करना चाहिए | धैर्य धारण करना यदि सीखना है तो मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के जीवन चरित्र से अच्छा उदाहरण और कहीं नहीं मिल सकता | मनुष्य को सदैव सम



माँ का रूठना

माँ का रूठनामाँ का रूठना मानो सारे संसार का रूठ जाना होता है। जिन लोगों की माँ उनसे नाराज होकर रूठ जाती है, उन्हें घर-परिवार के लोग और समाज कभी माफ नहीं करता। सब सुख-सुविधाएँ होते हुए भी उनके मन का एक कोना रीता रह जाता है। उन्हें हर समय मानसिक सुख और शान्ति प्राप्त करने के लिए भटकते ही रहना पड़ता हैं


शीतलाष्टकम्

शीतलाष्टकम्अभी दो दिन पूर्व रायपुर छत्तीसगढ़ मेंथे तो एक स्थान पर शीतला माता का मन्दिर देखा | ध्यान आया कि श्वसुरालय ऋषिकेश औरपैतृक नगर नजीबाबाद में इसी प्रकार के शीतला माता के मन्दिर हैं | और तब स्मरण होआया अपने बचपन का – जब होली के बाद आने वाली शीतलाष्टमी को शीतला माता के मन्दिरपर मेला भरा करता था



फटी जींस फैशन या बाजारवाद की देन

फटी जींस फैशन या बाजारवाद की देन डॉ शोभा भारद्वाज मेरा लड़का बड़ी पोस्ट पर समझ लीजिये बॉस था रोज फार्मल पहनताथा शुक्र वार को पहनने के लिए इकलोती जींस थी रगड़- रगड़ कर धोने से रंग भी उड़ गयाघिस भी गयी इसके अंडर में काम करने वाली लड़कियों में चर्चा चली सर की जींस बहुतसैक्सी हैं उसके सहायक ने कहा अरे कहा शुक



संस्कारों का महत्व :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में जन्म लेने के बाद एक मनुष्य को पूर्ण मनुष्य बनने के लिए उसके हृदय में दया , करुणा , आर्जव , मार्दव ,सरलता , शील , प्रतिभा , न्याय , ज्ञान , परोपकार , सहिष्णुता , प्रीति , रचनाधर्मिता , सहकार , प्रकृतिप्रेम , राष्ट्रप्रेम एवं अपने मह



मन की निर्मलता से प्रकट होती है भक्ति :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में जन्म लेने के बाद प्रत्येक मनुष्य जीवन को सफल बनाने के लिए , या किसी भी प्रकार की सफलता प्राप्त करने के लिए एक लक्ष्य निर्धारित करता है और उसी लक्ष्य पर दिन रात चिन्तन करते हुए कर्म करता है तथा अपने लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास करता है | कोई भी लक्ष्य तभी प्राप्त किया जा सकता है जब



पर्यावरण संरक्षण :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सृष्टि का मूल है प्रकृति इसके बिना जीव का कोई अस्तित्व नहीं है | प्रकृति अग्नि , जल , पृथ्वी , वायु एवं अंतरिक्ष से अर्थात पंचमहाभूते मिलकर बनी है जिसे पर्यावरण भी कहा जाता है | पर्यावरण का संरक्षण आदिकाल से करने का निर्देश हमें प्राप्त होता रहा है | हमारे देश भारत की संस्कृति का विकास वेदों से हुआ



स्वयं को जानना चाहिए :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सृष्टि का संचालन परब्रह्म की कृपा से होता है इसमें उनका सहयोग उनकी सहचरी माया करती है | यह सकल संसार माया का ही प्रसार है | यह माया जीव को ब्रह्म की ओर उन्मुख नहीं होने देती है | यद्यपि जीव का उद्देश्य होता है भगवत्प्राप्ति परंतु माया के प्रपञ्चों में उलझकर जीव अपने उद्देश्य से भटक जाता है | काम ,



प्रकृति का करें संरक्षण :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में मनुष्य जैसा कर्म करता उसको वैसा ही फल मिलता है | किसी के साथ मनुष्य के द्वारा जैसा व्यवहार किया जाता है उसको उस व्यक्ति के माध्यम से वैसा ही व्यवहार बदले में मिलता है , यदि किसी का सम्मान किया जाता है तो उसके द्वारा सम्मान प्राप्त होता है और किसी का अपमान करने पर उससे अपमान ही मिलेगा |



अन्तर्मन में है शान्ति :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*चौरासी लाख योनियों में सर्वश्रेष्ठ इस दुर्लभ मानव जीवन को पाकर भी मनुष्य अपने कर्मों के जीवन में शांति की खोज किया करता है | जब मनुष्य जीवन के झंझावातों से / परिवार - समाज की जिम्मेदारियों से थक जाता है तो शांति पाने के लिए जंगल , पर्वतों , नदियों तथा एकान्त की ओर भागने का प्रयास करने लगता है परंतु



कल्पनाओं का सकारात्मक प्रयोग :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है जिसके मन में कल्पनाएं ना उत्पन्न होती हों | प्रत्येक मनुष्य का मन कल्पनाओं के पंख लगाकर उड़ता रहता है | इन कल्पनाओं की गति असीम होती है तथा यह अपरिमित वेग के साथ दृश्य और अदृश्य लोकों में घूमती रहती हैं | पूर्व काल में हमारे देशवासियों ने इन्हीं कल्पनाओं के बल



सुशीलो मातृपुण्येन :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में जन्म लेने के बाद मनुष्य अनेक प्रकार के क्रियाकलाप करता रहता है , अपने क्रियाकलाप एवं कर्मों के आधार पर मनुष्य को यहां सम्मान एवं अपमान प्राप्त होता है | कोई भी संतान संस्कारी तभी हो सकती है जब उसके माता-पिता में भी संस्कार हो | सबसे बड़ा संस्कार है सुशील होना | संतान सुशील तभी हो सकती



सलाह लेते रहें सम्मान देते रहें :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन को सुचारू ढंग से जीने के लिए जहां अनेक प्रकार की आवश्यक आवश्यकता होती है वही समाज एवं परिवार में सामंजस्य बनाए रखने के लिए मनुष्य को एक दूसरे से सलाह परामर्श लेते हुए दूसरों का सम्मान भी करना चाहिए | ऐसा करने पर कभी भी आत्मीयता मे कमी नहीं आती | जहां परिवार में परामर्श नहीं होता है उसी पर



आध्यात्मिक ऊर्जा की शक्ति :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन में भौतिक शक्ति का जितना महत्व है उससे कहीं अधिक आध्यात्मिक शक्ति का महत्व है | सनातन के विभिन्न धर्मग्रंथों में साधकों की धार्मिक , आध्यात्मिक साधना से प्राप्त होने वाली आध्यात्मिक शक्तियों का वर्णन पढ़ने को मिलता है | हमारे देश भारत के महान संतों , साधकों , योगियों ऋषियों ने अपनी आध्यात





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