मज़हब

मज़हबगाह बदन मेरा, ख़ुदा ज़मीर है, ज़रूरत नहीं मुझे किसी मज़हबगाह की. कुछ लोग इस जहां में जिनमे ख़ुदा नहीं,तोड़ते और बनाते है मज़हबगाह बस यूँही.(आलिम)



शिकवा

शिक़वा नहीं हमें है तेरी मक़्बूलियत से, शिक़वा हमें है बस अपनी बदनसीबी से. (आलिम)



मक़्बूलियत

उनको फ़िक्र नहीं हमारे वज़ूद की, है फ़िक्र उन्हें अपनी मक़्बूलियत* की. (आलिम) * पॉपुलरिटी



स्वार्थ

अँधेरे में तो परछाई भी साथ छोड़ देती है जनाब हम तो फिर भी इंसान है औरों की किसी को फिकर नहीं बस खुद पर सब कुर्बान है ।



सुकून

सुकूनमशगूल थे बियाबानों में,कभी धुँध,कभी दोस्तों केआशियानों में!झंझावात् तोकभी तूफ़ानों में!!सकून मिला है तोसिर्फ तेरीहंसी ओ' मुस्कानों में!!!डॉ. कवि कुमार निर्मल



मोती मेरे हाथ का .. .. .. ..

टूटना ही था अगर .. .. .. .. .. .. .. .. .. . मोती ने माला से .. .. .. ..अच्छा होता कि वो मोती .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. मेरे हाथ में ही न आता !. ..



देशभक्ति

सेवा ही है धर्म हमारा , मानवता ही हम भारतीयों की पहचान है,देशभक्तों की पावन भूमि है यह ,हर दिल में हिंदुस्तान है ।



गीतिका

आधार- छंद द्विमनोरम, मापनी- 2122, 2122, 2122, 2122"गीतिका" अब पिघलनी चाहिए पाषाण पथ का अनुकरण हो।मातु सीता के चमन में कनक सा फिर क्यों हिरण हो।।जो हुए बदनाम उनकी नीति को भी देखिए तोजानते हैं यातना को फिर दनुज घर क्यों शरण हो।।पाँव फँसते जा रहे हों दलदले खलिहान में जबक्यों बनाए जा रहे घर जब किनारे प



गीतिका

गीतिका, समांत- आन, पदांत- बना लेंचलो तराशें पत्थर को, भगवान बना लेंउठा उठा कर ले आएं, इंसान बना लेंनित्य करें पूजा इनकी, दिल जान लगाकरतिनका तिनका जोड़ें और मकान बना लें।।जितना निकले राठ भाठ, सब करें इकट्ठाईंटों का सौदा कर कर, पहचान बना लें।।सिर फूटा किसका किसकी शामत आईरगड़ें पत्थर इससे बड़ी मचान बना ल



आशिकाना

★★★★★उल्फ़त★★★★★क़ायनात के मालिक का वारिस,भिखारी बन छुप अश्क बहाता है।सर्वनिगलु एक अमीरजादा,खोटे सिक्के की बोरी पाता है।।🌵🌵🌵🌵🌵🌵🌵🌵सुना है इश्क 'खास महिने' मेंशिकार कर सवँरता हैं !हुश्न पे एतवार कर,"मुकम्मल" फना होता है!!🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂उड़ता रहा ख्यालों में तेरेउम्मीदों से गुल खिले मेरे💮💮💮💮💮�



मुझे मार दीजिये

आप सभी के लिये पाकिस्तान के मशहूर शायर अहमद फ़राज़ की एक नज़्म जो पाकिस्तान के कट्टरवादी संगठनो पर चोट करती है का हिन्दी अनुवाद पेश है. काफ़िर हूँ, सिर फिरा हूँ मुझे मार दीजियेमैं सोचने लगा हूँ मुझे मार दीजिये है एहतराम हज़रते-इंसान मेरा दिलबेदीन हो गया हूँ मुझे मार दीजिये मैं पूछने लगा हूँ सबब



शायरी

शायरीशायरी लिखूं क्या?शरहदें जब मजबूर हैं!फासला एक आता है मुझे-सबका मालिक एक है!!डॉ. कवि कुमार निर्मलके. के.



तारीख़

नामदार तारीख-ऐ -वतन की ख़्वाहिश ने ,तारीख-ऐ- वतन को भी बदल डाला. आतिश-ऐ- मज़हब से ख़ुदपरस्तों ने, इंसानियत को खाके सियाह कर डाला.ख़ौफ़ज़दा हो इंसान जहाँ, मुल्क-ऐ- तरक्की क्या होगी. खूँगर्मी जहाँ अब रह ना गई, आसूदगी वहां अब क्या होगी. (आलिम)



बेवफा है जिंदगी न करना मौहब्बत

दरिया-ए-जिंदगी की मंजिल मौत है ,आगाज़-ए-जिंदगी की तकमील मौत है ................................................................बाजीगरी इन्सां करे या कर ले बंदगी ,मुक़र्रर वक़्त पर मौजूद मौत है ..................................................................बेवफा है जिंद



अब तो हँसने में भी

अब तो हँसने में भी कोई गम छलक जाता है देखते हैं यह दर्द कहाँ तलक जाता है।



वख़्त बचता नहीं

वख़्त बचता नहींवख़्त बचता हीं नहीं उफ! खुद के लिये,हदों के पार जा- ख़ुद को कुछ सँवार लूँ!गुलशन में तुम्हारे मशगूल हुए इस कदर,कैसे (?) कुछ लम्हें तेरी तवज़्जो में,'गुफ़्तगू' कर ताजिंदगी गुजार दूँ!!डॉ. कवि कुमार निर्मल



दर्द

दिल में उनके भी दर्द तो हुआ होगा, बिछड़ने का जब फ़ैसला लिया होगा. मज़बूरी रही होगी शायद उनकी कोई, ज़हर ग़म का उसने भी पीया होगा. (आलिम)



तोहमत ए दिलशिकनी

उनकी नाराज़गी में भी अगर है प्यार, हमारी नाराज़गी में भी नफरत तो नहीं है. वो है दिलशाद हम भी संगदिल तो नहीं है.दिलशिकनी की तोहमत क्यों हम पे लगी है. (आलिम)



सब्बा खैर से शाम की सफर

सब्बा खैर से शाम तक की सफरआज निंदिया आवे ना आवे,सब्बा खैर का तो बनता है।सुबह के सपने सच हों,मालिक से यह बंदा,इल्तिज़ा किया करता है।।भोर का सपना टुटते के संगचाय का प्याला सजता है।हो, न हो फर्माइश उनकी,शाम को तोहफा बनता है।।डॉ. कवि कुमार निर्मल



सब्बा खैर

आज निंदिया आवे ना आवे,सब्बा खैर का तो बनता है।सुबह के सपने सच हों,मालिक से यह बंदा,इल्तिज़ाकरता है।।के. के.





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