"गज़ल"

वज़्न - 122 122 122 122, अर्कान - फऊलुन फऊलुन फऊलुन फऊलुन, बह्र - बह्रे मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम, काफ़िया - आएँ स्वर, रदीफ- जाएँ"गज़ल"बहुत सावधानी से आएँ व जाएँडगर पर कभी भी न गाएँ बजाएँमिली जिंदगी को जिएँ शान से सबहक़ीकत चलन को बनाएँ सज़ाएँ।।बड़ी गाड़ियों के बड़े हैं नजारेबचें आप खुद ही न दाएँ से



ज़िंदगी

ज़िंदगी तेरे नाम इक खत भेजा था कभी "रंजन" ने ,जवाब में मौत किसने कह दिया भेजने के लिए !! Dear Music And Literature Lovers,You are most welcome to this encyclopaedia of Indian Classical Music. Here you will find the most



वफ़ा

अदाकारी नहीं आती मुझे रिश्ता निभाने में वफ़ादारी बची है आज भी मेरे घराने में तय्यब समदानी



बेख़बर

किसी भी बात का मुझपे असर नही होताजो मेरे हाल से वो बेख़बर नही होतावो जो कहते हैं चिरागों मे रोशनी ना रहीउनकी आँखों मे रोशनी का घर नही होताघरों से तंग हैं जहाँ दिलों के दरवाज़ेबूढ़े माँ -बाप का वहा बसर नही होतासदा सच बोलने के संग ये ही मुश्किल हैंकरे सबको ख़ुश यह ऐसा हुनर नही होता



दीप जलाकर प्रजा ढूँढ रही है अपने राम को

ये दीप नहीं , एक उम्मीद भेज रही हूँ मैं आपको , दीप जलाकर प्रजा ढूँढ रही है अपने राम को ,टूटे न उम्मीद किसी के भरोसे का ,अपनी रौशनी से रौशन कर दो पुरे आबाम को



"गीतिका" उड़ा आकाश कैसे तक चमन अहसास होता है हवावों से बहुत मिलती मदद आभास होता है

, आधार छंद--विधाता, मापनी- 1222 1222 1222 1222 समांत - आस, पदांत - होता है"गीतिका"उड़ा आकाश कैसे तक चमन अहसास होता हैहवावों से बहुत मिलती मदद आभास होता हैजहाँ भी आँधियाँ आती उड़ा जाती ठिकाने कोबता दौलत हुई किसकी फकत विश्वास होता है।।बहुत चिंघाड़ता है चमकता है औ गरजता घनबिना मौसम बरसता है छलक चौमास होता



"गज़ल" कहो जी आप से क्या वास्ता है सुनाओ क्या हुआ कुछ हादसा है

वज़्न-- 1222 1222 122 अर्कान-- मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन, क़ाफ़िया— वास्ता (आ स्वर की बंदिश) रदीफ़ - है"गज़ल" कहो जी आप से क्या वास्ता हैसुनाओ क्या हुआ कुछ हादसा हैसमझ लेकर बता देना मुझे भीहुआ क्या बंद प्रचलित रास्ता है।।चले जा चुप भली चलती डगर येमना लेना नयन दिग फरिश्ता है



आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते - Sahir Ludhianvi शायरी

Aao ki koii khvaab bunen kal ke vaste - sahir ludhianvi आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्तेवरना ये रात आज के संगीन दौर कीडस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ- दिलता- उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकेंगो हम से भा



"गीतिका" याद कर सब पुकार करते हैं जान कर कह दुलार करते है

मापनी, 2122 1212 22/112, समान्त- आर, पदांत- करते हैं"गीतिका" याद कर सब पुकार करते हैंजान कर कह दुलार करते है देखकर याद फ़िकर को आयीदूर रहकर फुहार करते है ।।गैर होकर दरद दिया होगा ख़ास बनकर सवार करते हैं।।मानते भी रहे जिगर अपनाधैर्य निस्बत निहार करते है।।लौट आने लगी हँसी मुँहपरमौन महफ़िल शुमार करते हैं।



"गज़ल" जब चाँद का फलक गुनाहों में खो गया तब रात का चलन घटाओं में खो गया

वज़्न - 221 2121 1221 212 अर्कान - मफ़ऊलु-फ़ाइलातु-मफ़ाईलु-फ़ाइलुन बह्र - बह्रे मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मक्फूफ़ मक्फूफ़ महज़ूफ़ काफ़िया - घटाओं (ओं स्वर) रदीफ़ - में खो गया"गज़ल" जब चाँद का फलक गुनाहों में खो गयातब रात का चलन घटाओं में खो गयाजज्बात को कभी मंजिलें किधर मिलतीहमसफर जो था वह विवादों में खो



शेर

बेशक आग लगेगी हमारे घर उसकी आंच से चमड़ी तुम्हारी भी पिघलेगी



मेरी ख़ुशी के लम्हे...

मेरी ख़ुशी के लम्हे इस कद्र छोटे हैं यारो;गुज़र जाते हैं मेरे मुस्कुराने से पहले ||READ MORE HERE!!!



"गीतिका" उग आई ऋतु है चाहत की मत लाना दिल में शामत की

मापनी- 22 22 22 22, समान्त- अत, पदांत- की"गीतिका"उग आई ऋतु है चाहत कीमत लाना दिल में शामत कीदेखो कितनी सुंदर गलियाँ खुश्बू देती हैं राहत की।। जब कोई लगता दीवाना तब मन होता है बसाहत की।।दो दिल का मिलना खेल नहींपढ़ना लिखना है कहावत की।।माना की दिल तो मजनू हैपर मत चल डगर गुनाहत की।।देखो कलियाँ चंचल ह



ज़िन्दगी कुछ ही दिनों की मेहमान होती है

ज़िन्दगी कुछ ही दिनों की मेहमान होती हैहर इंसान की आखिरी मंज़िल श्मशान होती है परिंदो के परो को क्यों मिसाल दी जाती है जबकि परो से नहीं हौंसलो से उड़ान होती है मेरे सपनो का हिन्दोस्तान है कुछ ऐसा की जहाँ इंसानियत सबका धर्म सबकी शान होती है ना जाने क्यू लोग धर्म बनाते है बांटने के



हो रहा है

कभीखुश्क तो कभी नम सा हो रहा है,मिजाज़मौसम का भी तुम सा हो रहा है, तुम होयहीं कहीं या चली गयी हो वहीँ,तआवुन दिल से तभी कम सा हो रहा है, इल्म हैदुनिया इक मुश्त खाके-फ़ानी,ना जानेक्यों अभी वहम सा हो रहा है, ईलाज़े-दर्दमुमकिन नासूर का था नहीं,ये अज़बअज़ाब जभी रहम सा हो रहा है



क्या सोचता हूँ मैं

पुछा है कि दिन-रात,क्या सोचताहूँ मैं,इश्क इबादत, नूर-ए-खुदा सोचता हूँ मैं, रस्मों-रिवायत की नफरत से मुखाल्फ़त, रिश्तों में इक आयाम नया सोचता हूँ मैं, मसला-ए-मुहब्बत तो ना सुलझेगा कभी,मकसद जिंदगी जीने का सोचता हूँ मैं, इक बार गयी तो लौटी ना खुशियाँ कभी,कैसे भटकी होंगी व



"गज़ल" थोड़ा थोड़ा प्यार दे मुझको कर्ज सही पर यार दे मुझको

मात्रा भार-17, काफ़िया- आर, रदीफ़ - दे मुझकोग़ज़ल, बह्र-22 22 22 22, काफ़िया-आर, रदीफ़ - दे मुझको....... ॐ जय माँ शारदा.......!"गज़ल"थोड़ा थोड़ा प्यार दे मुझकोकर्ज सही पर यार दे मुझकोपल आता इंतजार बिना कब कल की रात सवार दे मुझको।।बैठी नाव निरखती तुझकोदरिया पार उतार दे मुझको।



ग़ज़ल, किनारों को भिगा पाता कहाँ से नजारों को सजा जाता कहाँ से

जय नव दुर्गा ^^ जय - जय माँ आदि शक्ति -, वज़्न-- 1222 1222 122, अर्कान-- मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन, क़ाफ़िया— आया (आ स्वर की बंदिश) रदीफ़ --- कहाँ से....... ॐ जय माँ शारदा.....! 1 मुहब्बत अब तिजारत बन गई है 2. मै तन्हा था मगर इतना नहीं था "गज़ल"किनारों को भिगा पाता कहाँ सेनजारों को सजा जाता कहाँ सेबंद थ



"गीतिका"

मापनी- 2222 2222 2222 222,"गीतिका"कोई तो चिंतन को मेरे आकर के उकसाता हैबहुत सवेरे मन को मेरे आकर के फुसलाता हैअलसाई बिस्तर की आँखें मजबूरी में ही खुलतीकुछ तो है आँगन में तेरे छूकर के बहलाता है।।कोयल सी बोली मौसम बिन गूँज रही आकर सुन लोफूलों औ कलियों की बगिया आकर के महकाता है।।मेरे दामन के काटों को च



"गीतिका"

समान्त- अना, पदांत- नहीं चाहता"गीतिका"छाप कर किताब को बाँधना नहीं चाहताजीत कर खुद आप से हारना नहीं चाहतारोक कर आँसू विकल पलकों के भीतरजानकर गुमनाम को पालना नहीं चाहता।।भाव को लिखता रहा द्वंद से लड़ता रहाछंद के विधिमान को बाँटना नहीं चाहता।।मुक्त हो जाना कहाँ मंजिलों को छोड़ पानालौटकर संताप को छाँटना न





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