परचम जज्बातों का

तुम सामने पड़े तो ये मन खुशियों से भर गयाढलका हुआ तेरा चेहरा भी थोड़ा निखर गयाखुशियाँ मिली थी एक तरफ़ मायूसी कम नहींगुल वो खिला गुलाब का कितना बिखर गयामन को मेरे तो चैन था हाथों में जब था हाथ छोड़ा जो तूने संग न जाने वो भी किधर गयाक्या तुमको अभी याद हैं लम्हें वो इश्क केजिनके लिए ये वक्त भी हँस कर ठहर



भाग्य ना कोई बांच सका है

वक्त की ज़द में कुछ भी हो तुम फिर भी रहना पड़ता हैतेरे बिन इस तन्हाई का ग़म मुझको भी सहना पड़ता हैकितना भी कोई संयम रख ले दर्द तो दिल में होता हैपीर बढे जब हद से ज्यादा उसको तो कहना पड़ता हैकितनी सूरत मिलती हैं इस नदिया को निज जीवन मेंइसके जल को लेकिन फिर भी हरदम बहना पड़ता हैकितना भी कोई गर्व करें



गैर हम हो नहीं सकते

कोई परदा नहीं जब बीच गैर हम हो नहीं सकतेकिसी और की बाहों में अब तुम सो नहीं सकते बड़ी मुश्किल से मिलती हैं दौलतें प्रेम की जग मेंकोई कीमत लगाओ अब इसे हम खो नहीं सकते मुहब्बत में खुदा एक दूजे को हम ने बनाया हैकोई नफ़रत के बीज बीच में हम बो नहीं सकतेपीर सीने में जो उठती है तुम कहाँ देख पाओगेदिखा के इस



“गीतिका” बनाया सजाया कहोगे नहीं

गीतिका आधार छंद- शक्ति , मापनी 122 122 122 12, समांत-ओगे, पदांत- नहीं “गीतिका”बनाया सजाया कहोगे नहीं गले से लगाया सुनोगे नहीं सुना यह गली अब पराई नहीं बुलाकर बिठाया हँसोगे नहीं॥बनाकर बिगाड़े घरौंदे बहुत महल यह सजाकर फिरोगे नहीं॥बसाये न जाते शहर में शहर नगर आज फिर से घुमोगे नहीं॥चलो शाम आई सुहानी बहु



नज़्म

रात मेरी किताब के पन्ने बिछा के सो गई सुबह तक रात की बेचैनी को पढता रहा। सूरज उगा ललिमाओं का लबादा लिए मैं अपने आप में ही चाँद स ढलता रहा। डूबते सूरज की परछाइयों का पीछा वो करता है समय की उम्र में मगर वो बढ़ता रहा। सूरज फिर उगेगा ढलने के लिए जैसे लोग मरते है जन्म लेने



“गज़ल” जुर्म को नजरों से छुपाता रह गया शायद

काफ़िया- आ स्वर, रदीफ़- रह गया शायद“गज़ल”जुर्म को नजरों सेछुपाता रह गया शायदव्यर्थ का आईनादिखाता रह गया शायद सहलाते रह गया कालेतिल को अपने नगीना है सबकोबताता रह गया शायद॥ धीरे-धीरे घिरती गईछाया पसरी उसकी दर्द बदन सिरखुजाता रह गया शायद॥ छोटी सी दाग जबनासूर बन गई माना मर्ज गैर मलहमलगाता रह गया शायद॥



ग़ज़ल

मेरी अंजुमन में कोई आता नहीं है गम की कोई सौग़ात लाता नहीं है। टूट कर बिखरा है ज़माने की भीड़ में अपना सर वो कही झुकाता नहीं है।तनहा मर जायेगा ली है क़सम अपने मेहबूब को बुलाता नहीं है। दी है ख़ुदा ने भर के झोली मगर रोटी किसी ग़रीब को खिलाता नहीं है। राज़ से पर्दा हट जाएगा ''अमान ''ज़ख़्म दिल का दिखाता नहीं ह



सूरज

हर सुबह जो सबसे पहले सबको जगआने आता और फिर चिडिओ को नित नवीन अवसर दे जाता दे जाता वो सबको नए संकल्प नए सपने नित और दे जाता वो नित नई उर्जा वो उनको करने की पूरा !



“गीतिका” प्यार खोना मीत पाना

मापनी- 2122 2122 , पदांत- पाना,समांत- जीत, ईत स्वर“गीतिका”प्यार खोना मीतपाना युद्ध को हर जीतपाना हो सका संभव नहींजग पार कर हद हीतपाना॥दिल कभी भी छल करेक्या प्रीत पावन चीतपाना॥ (चित्त)जिंदगी कड़वी दवा हैस्वाद मिर्चा तीतपाना॥ (तीखा) राग वीणा की मधुरहै तार जुड़ संगीतपाना॥दो किनारों की नदीबन क्यों भला ज



"गज़ल" रुला कर हँसाते बड़ी सादगी से

क़ाफ़िया— ई स्वर कीबंदिश, रदीफ़- सादगी से"गज़ल" रुला कर हँसाते बड़ी सादगी सेगुलिस्तां खिलातेअजी सादगी सेहवा में निशानालगाने के माहिरपखेरू उड़ाते दबीसादगी से।।परिंदों के घर मेंनहीं मादगी परहिला डाल देते मिलीसादगी से।।शिकारी कहूँ याअनारी कहूँ तुम सजाते हो महफ़िलदिली सादगी से।।लपक जा रहे थे उड़ेथे फलक कोबिना



कैसे वो अपना बन बैठे - शिखा

Kaise vo apna ban baithe pata hi nahi chala tha,Kaise ruh mai bas gaye the pata hi nahi chala tha.Raat ko sapno mai hum unhe hi to dekha karte the, Kaise vo mujse door ho gaya pata hi nahi chala tha.Ek hum the jo baar baar ishq e izhar kiya karte the,Kaise vo inse anjaan bana raha pata hi nahi chal



"गज़ल" चलो जी कुछ ख़ता करते हैं इशारों में

वज़्न- 1222 12222122 2, काफ़िया-आ, रदीफ़ - " करते हैं इशारोमें""गज़ल"चलो जी कुछ ख़ताकरते हैं इशारों मेंबवंडर ही खड़ा करतेहै इशारों मेंकहाँ तक चल सकेंगेदिनमान चुप होकरजलाते है अगन दीयाहै इशारों में।।नयी जब रोशनी होगीतम फ़ना होगाउड़ाते हैं वोफतिंगा हैं इशारों में।।भरा पानी शहर मेंले आग मत जानाबुझे मन का ठिकान



पास मेरे बैठो ना तुम - शिखा

Paas mere baitho na tum,bahut si baate karni hai,dil ke halat batane hai,Kai sapne sajane hai.Kuchh teri sunni hai, Kuchh meri karni hai,Na sata tu muje itna ,Do pal to muskura aa.Sirf tujse muhobbat hai,fir kyu muje ajmate ho.Tuje hi yaad karti hu,Tujhi se pyar karti hu.Meri zindagi tujse hai,Meri



“गीतिका” आप के दरबार में आ शांति ठहरी नहीं

पदांत- नहीं, समांत-अहरी,मापनी-2122 2122 2122 12“गीतिका” आप के दरबार में आशांति ठहरी नहीं दिख रहा है ढंग कापल प्रखर प्रहरी नहींझूलती हैं देख कैसेद्वार तेरे मकड़ियाँ रोशनी आने न देतीझिल्लियाँ गहरी नहीं॥ वो रहा फ़ानूष लटकाझूलता बे-बंद का लग रहा शृंगार सेभी रेशमा लहरी नहीं॥गुंबजों का रंगउतरा जा रहा बरसात



वक़्त

वक़्त आने पर करवा देंगे हदों का एहसास, कुछ तालाब खुद को समुद्र समझ बैठे हैं।



“गीतिका”अटल बिन यह देश अपना आज कैसा दिख रहा

मापनी -२१२२ २१२२ २१२२ २१२ सामंत- आ पदांत-दिख रहा“गीतिका”अटल बिन यह देश अपना आज कैसा दिख रहाहर नजर नम हो रही पल बे-खबर सा दिख रहाशब्द जिनके अब कभी सुर गीत गाएंगे नहींखो दिया हमने समय को अब इंसा दिख रहा।।याद आती हैं वे बातें जो सदन में छप गईझुक गए संख्या की खातिर नभ सितारा



"गज़ल"आदमी भल फरज मापता रह गया

काफ़िया- आ स्वर रदीफ़- रह गया वज्न- २१२ २१२ २१२ २१२ फाइलुन फाइलुन फाइलुन फाइलुन"गज़ल"आदमी भल फरज मापता रह गयाले उधारी करज छाँकता रहा गयाखोद गड्ढा बनी भीत उसकी कभीजिंदगी भर उसे पाटता रह गया।।दूर होते गए आ सवालों में सभीहल पजल क्या हुई सोचता रह गया।।उमर भर की जहमद मिली मुफ्त



"गीतिका"यह कैसा आया पहरा हैघर-घर में आँसू पसरा है

१६-८-१८ राष्ट्र के अनन्य भक्त लोकतंत्र के जीवंत प्रतिमूर्ति माँ भारती के महानतम सपूत माँ वीणा धारिणी के वरदपुत्र सर्व समाज के अभिवावक परम सम्माननीय पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न व पद्मविभूषण स्वर्गीय श्रीमान अतल बिहारी बाजपेयी जी कोसादर नमन भावपूर्ण श्रद्धांजलि स्वरूप समर्



"गज़ल"उड़ा अपना तिरंगा है लगा आसमान का तारातिरंगा शान है जिसकी वो हिंदुस्तान का प्यारा

वज़्न- १२२२ १२२२ १२२२ १२२२ काफ़िया-आन रदीफ़- का आरा"गज़ल"उड़ा अपना तिरंगा है लगा आसमान का तारातिरंगा शान है जिसकी वो हिंदुस्तान का प्याराकहीं भी हो किसी भी हाल में फहरा दिया झंडाजुड़ी है डोर वीरों से चलन इंसान का न्यारा।।किला है लाल वीरों का जहाँ रौनक सिपाही कीगरजता शेर के मान



तेरी आँखों के जादू से - teri aakhon ke jadu se

तेरी आँखों के जादू सेतू ख़ुद नहीं है वाकिफ़... ये उसे भी जीना सिखा देती हैंजिसे मरने का शौक़ हो ।teri aakhon ke jadu se tu khud nahin hai vakif... ye use bhi jina sikha deti hain jise marne ka shauk ho ।





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