वैश्विक पटल पर कोरोना द्वारा उत्पन्न जनवादी संघर्ष

कोरोना कोविड 19 वैश्विक महामारी जिसने आज भागती दुनिया के चक्र की गति को धीमा कर दिया है। इस गति के अनुपात को लिखना ठीक वैसे ही होगा जैसे किसी जटिल इतिहास को 'किताब में लिखना' अगर हम वर्तमान परिस्थितियों की तुलना पूर्व परिस्थितियों से करें तो आज हमें बदलावो के अनुपात में बढ़ोतरी दिखती है। निश्चित है ब



सफलता

सन् दो हज़ार अठारह में प्रशासनिक सेवा हेतु बिहार लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित परीक्षा के अंतिम चरण का परिणाम आया था। मनीषा को सफलता प्राप्त हुई थी लेकिन मानव कुछ अंकों से असफल हो गया था। मनीषा और मानव अलग-अलग शहरों के रहने वाले थे किंतु दो वर्षों से दोनों पटना में रहते थे और एक ही कोचिंग इंस्टीट्यूट म



लहर

हौसला होता नहीं, जुटाना पड़ता है। पैर उठता नहीं, उठाना पड़ता है। दुनियां जरूरत की है, बिन जरूरत के बोल मिलता नहीं, मिलाना पड़ता है। काम, नाम होता नहीं, मेहनत से बनाया जाता है। हमेशा अच्छा मिलता नहीं, समझौता करना पड़ता है। मुश्किल वक्त जब भी आता है। चहेतों के सच्चे चेहरे लेकर आता है। आशियाना बनता नही



कड़वी हकीकत - बेस्टसेलर किताब

सुरेश की उम्र करीब तीस साल और कद 5 फीट 4 इंचथा, सामने से सिर पर बाल थोड़े कम हो रखे थे, एक लंबा कुर्ता और खादी का झोला,हमेशा यही लुक था उसका। ज्यादातर उन विषयों पर लिखना पसंद करता था जिस पर लोगध्यान ही नहीं द



औकात- एक प्रेरणादायी कथा

सुरेखा की शहर के बीचों-बीच कपड़े कीबहुत बड़ी दुकान थी। हर तरह की महंगी साड़ियां और सलवार कमीज के कपड़े वहां मिलतेथे। अच्छी ख़ासी आमदानी होती थी उसकी। क्योंकि अकेले दुकान संभालना मुश्किल था तोउसने कांता को अपनी दुकान पर काम करने के लिए रख लि



प्रेम आशीष

घर में परिवार हुए एकल, मानव बड़े बूढों की छांव बिना, परछाई से नाता जोड़े हैं। अब बड़े बुजुर्ग पलक पसारे, अखियां रस्ता देखे हैं। अब आंगन में नीम, शीशम की छांव नहीं, आंगन भी अब सीमेंट से छाए हैं। बरामदे का दे नाम, दो गमले नीचे रख, कुछ छोटे गमले लटकाये है। बड़ा बूढ़ा दाढ़ी वाला बरगद पूजे का मिले नहीं



किसानो को परेशान करने आया तिरंगा वायरस, बीज कंपनियों पर वायरस फैलाने का आरोप ,बंद हो सकता है उत्पादन

टमाटर में अब एक नए वायरस ने प्रवेश किया है. इससे टमाटर की खेती में पैदा होने वाले टमाटर के रंग और आकार में अंतर आ रहा है. इसे किसान तिरंगा वायरस कह रहे हैं. इस वायरस की वजह से टमाटर में खड्ढे हो रहे हैं और अंदर से काला होकर सड़ने लगता है. टमाटर पर पीले चिट्टे होने की वजह से अब उसकी खेती पर संकट मंडरा



वादा तेरा वादा

“वादा तेरा वादा” “परनिंदा जे रस ले करिहैं निसच्य ही चमगादुर बनिहैं” अर्थात जो दूसरों की निंदा करेगा वो अगले जन्म में चमगादड़ बनेगा।परनिंदा का अपना सुख है ,ये विटामिन है ,प्रोटीन डाइट है और साहित्यकार के लिये तो प्राण वायु है ।परनिंदा एक परमसत्य पर चलने वाला मार्ग है और मुफ्त का यश इसके लक्ष्य हैं।चत



मैं और मय

हम का दर्द हुआ कम, जब नशें का जाम लगा छलकने पैमाने में। शराबियों का ईमान भी उनके कदमों के जैसा डगमगाता है। मुफ्त में मिलें तो सरकार बदलती है। खरीद कर पिए तो देश की अर्थव्यवस्था बदलती है। अगर बेचकर पिए तो घर के हालात बिगड़ते हैं। चोरी कर पिए तो चरित्र की काया बदलती है। संसार का सबसे प्यासा, यही बेचा



दो घूट शराब के, दो पैक शराब के।

दो घूट शराब के, दो पैक शराब के।जब दिन अच्छे थे तो, शराब को बुरा कहते थे।आज दिन बुरे है तो, शराब को अच्छा कहते है।वाह कोरोना तूने,शराबियों की जमात दिखा दी।मैख़ाने के नाम से नही, अब हमखाने से जानेंगे।शराब लोग गम में पीते थे, आज साबित हो गया।लाइन को गाली देना, गस खाकर गिर जाना, यह सब दिखावा बन गया। अब प



दिल वाला टैटू

क्षमा मिश्रा नाम था उसका। लेकिन मोहल्ले के सारे लड़के उसे छमिया कह कर पुकारते थे। महज़ अठारह बरस की उम्र में मोहल्ले में हुई अठाईस झगड़ों का कारण बन चुकी थी वो। उसका कोई भी आशिक़ चार महीने से ज्यादा उसकी फ़रमाइशों को पूरी नहीं कर पाता था। इसलिए प्रत्येक चार महीने बाद क्षमा के दिल के रजिस्टर पर नए आशिक़



जानू की बाते।

जानू की बाते।कोरोना कोरोना सब कोई कहे, भूखा कहे न कोई।एक बार मन भूखा कहे, सौ दो सौ की भीड़ होए।मोदी अंदर सबको रखे, घर से बाहर न निकले कोई।मन की बात मोदी करे, सो बाहर उसकी चर्चा होए।मम्मी एफबी में लिपटी रहे, बेटा-बेटी बैठे टीवी संग।साथी शिकायत करने लगे,पापा नौकरी से आए तंग।एक बार सिंग्नल मिले, भीड़ स्ट



शोर

चारों ओर कोरोना का शोर है। घर में ही रहों,पाबंदियों का दौर हैं। यहां अन्नदाता कमजोर है। नई नई दलीलों पर जोर है। घर में ही रहों,पाबंदियों का शोर है। यहां मजदूर कमजोर है। मजदूरों के बल पर बने बैठे, मालिकों का शोर है। घर में ही रहों, पाबंदियों का दौर हैं। कोरोनावायरस की चपेट में आ रहे लोग हैं। एक से हज



चौबे चले छब्बे बनने , दुबे बन कर लौटे

चौबे चले छब्बे बनने , दुबे बन कर लौटेजब से ई मुआ कोरोना आया है तब से चौबाइन बड़ी परेशान है। चौबाइन अपने घर के अंदर से कोरोना को गरियाते हुये बाहर निकली तो कुछ लौंडे लपारिए निहायत ही निठल्ले से उसके घर के स



मज़दूर

कामिनी देवी जब कभी भी अपने राइस मिल पर जाती थीं, माधो से ज़रूर मिलती थीं। माधो उनकी राइस मिल में कोई बड़ा कर्मचारी नहीं, बल्कि एक मज़दूर था। राइस मिल में काम करने वाले सभी लोगों का मानना था कि माधो कामिनी मैडम का सबसे विश्वासी कामगार है क्योंकि वह कभी झूठ नहीं बोलता। माधो गठीले बदन वाला छब्बीस वर्षीय



अंधविश्वास

प्रत्येक दिन किसी न किसी व्यक्ति की मौत हो रही थी। पिछले दस दिनों में पंद्रह लोगों की जानें जा चुकी थीं। पूरे गांव में दहशत का माहौल था। "कोई नहीं बचेगा इस गांव में। अगले महीने तक सब मर जाएंगे। इस गांव को उस फ़क़ीर की बद्दुआ लग गई है, जिसके साथ दीपक ने गाली-गलौज और हाथापाई किया था। अगर उस दिन दीपक उस



कोरोना से मिली सीख

कोरोना, एक ऐसी बीमारी जो मात्र छूने से फैल रही है, जिसने पूरे विश्व को हिला कर रख दिया है । विश्व में कई देश इस महामारी के चलते लॉक डाउन हैं। इसके कारण पूरे विश्व की आर्थिक व्यवस्था चरमरा गई है। दुनियाभर में लाखों लोग इस बीमारी के शिकार



पंडी आन द वे

पंडी आन द वे (व्यंग्य) जिस प्रकार नदियों के तट पर पंडों के बिना आपको मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती, गंगा मैया आपका आचमन और सूर्य देव आपका अर्ध्य स्वीकार नहीं कर सकते जब तक उसमें किसी पण्डे का दिशा निर्देश ना टैग हो, उसी प्रकार साहित्य में पुस्तक मेलों में कोई काम संहित्यिक पंडों और पण्डियों के बिना



दिल वाली जेब

काश! मैं तुम्हारा मोबाइल होती। तुम संभाल कर रख लेते मुझे, अपने दिल के पास वाली जेब में, हर पल मुझको देखा करते, हर पल मुझको चाहा करते, देखा करते मेरा चेहरा, देर रात तक, भी तुम मुझमें बस खोए रहते, काश! मैं तुम्हारा मोबाइल होती। तुम ख्याल रखते मेरी छोटी छोटी जरूरतों का, तुम ख्याल रखते मेरे वालपेपर क



जिस्म मंडी की रेशमा

सीमा परवीन उर्फ रेशमा को बेगमसराय के महबूबा जिस्म मंडी में उसके चाहने वाले उसके हसीन और आकर्षक जिस्म के कारण सनी लियोन के नाम से पुकारते थे। उसके आशिक़ों में सफ़ेदपोश, काले कोट और ख़ाकी वाले भी शामिल थे। जिस्म बेचना कभी भी उसकी मजबूरी नहीं रही। वह इस धंधे में इसलिए आई थी क्योंकि उसे लगता था कि रईस बनने





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