“गीतिका”अटल बिन यह देश अपना आज कैसा दिख रहा

21 अगस्त 2018   |  महातम मिश्रा   (39 बार पढ़ा जा चुका है)

मापनी -२१२२ २१२२ २१२२ २१२ सामंत- आ पदांत-दिख रहा


“गीतिका”


अटल बिन यह देश अपना आज कैसा दिख रहा

हर नजर नम हो रही पल बे-खबर सा दिख रहा

शब्द जिनके अब कभी सुर गीत गाएंगे नहीं

खो दिया हमने समय को अब इंसा दिख रहा।।


याद आती हैं वे बातें जो सदन में छप गई

झुक गए संख्या की खातिर नभ सितारा दिख रहा।।


खो दिया उस वक्त हमने देश के सपूत को

आज अर्थी वह उठी सबको जनाजा दिख रहा।।


जिंदगी से मौत होती कब बड़ी वे कह गए

दो घड़ी में जल गया सुंदर खजाना दिख रहा।।


सत्य होता है अटल झूठी अटल बातें नहीं

झूठ मलता हाथ अपना सत्य जाता दिख रहा।।


वक्त के गर साथ गौतम हो लिया होता तनिक

सच कहूँ तस्वीर होती इतर सपना दिख रहा।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: “गज़ल” “गज़ल” बहाने मत बनाओ जी धुआँ उठता नहीं यूँ ही



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
14 अगस्त 2018
जिस देश में गंगा बहती है: शैलेन्द्रहोठों पे सच्चाई रहती है, जहां दिल में सफ़ाई रहती हैहम उस देश के वासी हैं, हम उस देश के वासी हैंजिस देश में गंगा बहती हैमेहमां जो हमारा होता है, वो जान से प्यारा होता हैज़्यादा की नहीं लालच हमको, थोड़े मे गुज़ारा होता हैबच्चों के लिये जो धरती माँ, सदियों से सभी कुछ
14 अगस्त 2018
14 अगस्त 2018
*इस पृथ्वी पर जन्मा प्रत्येक जीव को स्वतंत्रता का अधिकार है एवं प्रत्येक जीव स्वतंत्र रहना भी चाहता है | पराधीनता के जीवन से मृत्यु अच्छी है | मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी की चौपाई "पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं" यह प्रमाणित करती है कि पराधीनता में रहकर मोहनभोग भी खाने को मिल जाय तो वह तृप्ति नहीं मिल प
14 अगस्त 2018
28 अगस्त 2018
पदांत- नहीं, समांत-अहरी,मापनी-2122 2122 2122 12“गीतिका” आप के दरबार में आशांति ठहरी नहीं दिख रहा है ढंग कापल प्रखर प्रहरी नहींझूलती हैं देख कैसेद्वार तेरे मकड़ियाँ रोशनी आने न देतीझिल्लियाँ गहरी नहीं॥ वो रहा फ़ानूष लटकाझूलता बे-बंद का लग रहा शृंगार सेभी रेशमा लहरी नहीं॥गुंबजों का रंगउतरा जा रहा बरसात
28 अगस्त 2018
23 अगस्त 2018
"हाइकु"मेरे आँगनगीत गाती सखियाँ तुलसी व्याह।।-१कार्तिक माहभर मांग सिंदूरतुलसी पूजा।।-२तुलसी दलघर-घर मंगलसु- आमंत्रण।।-३तुलसी चौरा रोग विनाशकदीप प्रकाश।।-४तुलसी पत्तासाधक सुखवंतादिव्य औषधि।।-५महातम मिश्र गौतम गोराखपुरी
23 अगस्त 2018
16 अगस्त 2018
“कुंडलिया” आगे सरका जा रहा समय बहुत ही तेज। पीछे-पीछे भागते होकर हम निस्तेज॥ होकर हम निस्तेज कहाँ थे कहाँ पधारे। मुड़कर देखा गाँव आ गए शहर किनारे॥ कह गौतम कविराय चलो मत भागे-भागेकरो वक्त का मान न जाओ उससे आगे॥महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी
16 अगस्त 2018
10 अगस्त 2018
कहते हैं मेरा वतन बात-बात में वाण। आतंकी के देश से आया कैसे गैर- मिला मंच खैरात का नृत्य कर रहा भाण॥-१ लेकर आओ हौसला हो जाए दो हाथ। क्यों करते गुमराह तुम सबके मालिक नाथ। बच्चे सभी समान हैं तेरे मेरे लाल- उनसे छल तो मत करों खेलें खाएँ साथ॥-२शौर्य तुम्हारा देखता सीधा सकल ज
10 अगस्त 2018
24 अगस्त 2018
“मुक्तक”मापनी- २१२२ २१२२ २२१२ २१२जिंदगी को बिन बताए कैसे मचल जाऊँगा। बंद हैं कमरे खुले बिन कैसे निकल जाऊँगा। द्वार के बाहर तेरे कोई हाथ भी दिखता नहीं- खोल दे आकर किवाड़ी कैसे फिसल जाऊँगा॥-१ मापनी- २२१२ २२१२ २२१२ २२१२जाना कहाँ रहना कहाँ कोई किता चलता नहीं। यह बाढ़ कैसी आ गई
24 अगस्त 2018
27 अगस्त 2018
"
मापनी - 22 22 2222"गीत"कितना सुंदर मौसमआया साथी तेरा साथसुहायापकड़ चली हूँ तेरीबाहेंआँचल मेरा नभलहराया।।रहना हरदम साथ हमारेशीतल है कितनी यहछाया।।नाहक उड़ते विहगअकेलेमैंने भी मन कोसमझाया।।दूर रही अबतक छविमेरीआज उसे फिर वापसपाया।।चँहक रही हूँ खेलरही हूँसाजन तूने मनहरषाया।।गौतम तेरा बाग खिलाहैभौंरा सावन
27 अगस्त 2018
13 अगस्त 2018
काफिया- आ स्वर रदीफ़-नहीं यूँ ही वज्न- १२२२ १२२२ १२२२ १२२२ “गज़ल” बहाने मत बनाओ जी धुआँ उठता नहीं यूँ ही लगाकर आग बैठे घर जला करता नहीं यूँ हीयहाँ तक आ रहीं लपटें धधकता है वहाँ कोना तनिक जाकर शहर देखों किला जलता नहीं यूँ ही॥सुना है जल गई कितनी इमारत बंद कमरों की खिड़कियाँ रो
13 अगस्त 2018
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
अंग्रेजी  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x