“गीतिका” बनाया सजाया कहोगे नहीं

18 सितम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (77 बार पढ़ा जा चुका है)

गीतिका आधार छंद- शक्ति , मापनी 122 122 122 12, समांत- ओगे, पदांत- नहीं


गीतिका


बनाया सजाया कहोगे नहीं

गले से लगाया सुनोगे नहीं

सुना यह गली अब पराई नहीं

बुलाकर बिठाया हँसोगे नहीं॥


बनाकर बिगाड़े घरौंदे बहुत

महल यह सजाकर फिरोगे नहीं॥


बसाये जाते शहर में शहर

नगर आज फिर से घुमोगे नहीं॥


चलो शाम आई सुहानी बहुत

उठा पाँव अपना चलोगे नहीं॥


हवा भी चली है दिशा आप की

निगाहें नजारे भरोगे नहीं॥


गौतम कहानी सुनाना नयी

वजह बे वजह तुम खुलोगे नहीं॥


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: "गज़ल" रुला कर हँसाते बड़ी सादगी से



महातम मिश्रा
20 सितम्बर 2018

हार्दीक दहन्यवद बहन, सदैव प्रसन्न रहिये

रेणु
19 सितम्बर 2018

आदरणीय भैया -- मन के सुंदर संवाद से सजी इस सुंदर , सरस गीतिका को आज का लेख चुने जाने पर मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार हो | आपका चंद लेखन अनमोल है | इसके सशक्त हस्ताक्षर बन चुके हैं आप | मैं तो एक शब्द भी छंद में नहीं लिख पाती | सादर प्रणाम |

महातम मिश्रा
19 सितम्बर 2018

बहुत बहुत हार्दिक धन्यवाद शब्दनगरी मंच को इस गीतिका को आज के मुख्यपृष्ट पर श्रेष्ठ रचना का सम्मान प्रदान करने के लिए, आभारी हूँ मित्रों व शुभचिंतकों का, ॐ जय माँ शारदा!

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