“गीतिका” बनाया सजाया कहोगे नहीं

18 सितम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (110 बार पढ़ा जा चुका है)

गीतिका आधार छंद- शक्ति , मापनी 122 122 122 12, समांत- ओगे, पदांत- नहीं


गीतिका


बनाया सजाया कहोगे नहीं

गले से लगाया सुनोगे नहीं

सुना यह गली अब पराई नहीं

बुलाकर बिठाया हँसोगे नहीं॥


बनाकर बिगाड़े घरौंदे बहुत

महल यह सजाकर फिरोगे नहीं॥


बसाये जाते शहर में शहर

नगर आज फिर से घुमोगे नहीं॥


चलो शाम आई सुहानी बहुत

उठा पाँव अपना चलोगे नहीं॥


हवा भी चली है दिशा आप की

निगाहें नजारे भरोगे नहीं॥


गौतम कहानी सुनाना नयी

वजह बे वजह तुम खुलोगे नहीं॥


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: "गज़ल" रुला कर हँसाते बड़ी सादगी से



महातम मिश्रा
20 सितम्बर 2018

हार्दीक दहन्यवद बहन, सदैव प्रसन्न रहिये

रेणु
19 सितम्बर 2018

आदरणीय भैया -- मन के सुंदर संवाद से सजी इस सुंदर , सरस गीतिका को आज का लेख चुने जाने पर मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार हो | आपका चंद लेखन अनमोल है | इसके सशक्त हस्ताक्षर बन चुके हैं आप | मैं तो एक शब्द भी छंद में नहीं लिख पाती | सादर प्रणाम |

महातम मिश्रा
19 सितम्बर 2018

बहुत बहुत हार्दिक धन्यवाद शब्दनगरी मंच को इस गीतिका को आज के मुख्यपृष्ट पर श्रेष्ठ रचना का सम्मान प्रदान करने के लिए, आभारी हूँ मित्रों व शुभचिंतकों का, ॐ जय माँ शारदा!

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
17 सितम्बर 2018
काफ़िया- आ स्वर, रदीफ़- रह गया शायद“गज़ल”जुर्म को नजरों सेछुपाता रह गया शायदव्यर्थ का आईनादिखाता रह गया शायद सहलाते रह गया कालेतिल को अपने नगीना है सबकोबताता रह गया शायद॥ धीरे-धीरे घिरती गईछाया पसरी उसकी दर्द बदन सिरखुजाता रह गया शायद॥ छोटी सी दाग जबनासूर बन गई माना मर्ज गैर मलहमलगाता रह गया शायद॥
17 सितम्बर 2018
19 सितम्बर 2018
"
"मुक्तकाव्य" जी करता है जाकर जीलूबोल सखी क्या यहविष पी लूहोठ गुलाबी अपना सीलूताल तलैया झीलविहारसुख संसार घरपरिवारसाजन से रूठा संवादआतंक अत्याचारव्यविचारहंस ढो रहा अपनाभारकैसा- कैसा जगव्यवहारहोठ गुलाबी अपना सीलूबोल सखी क्या यहविष पी लू॥ डूबी खेती डूबेबाँधझील बन गई जीवन साधसड़क पकड़ती जबरफ्तारहो जाता जी
19 सितम्बर 2018
04 सितम्बर 2018
"
वज़्न- 1222 12222122 2, काफ़िया-आ, रदीफ़ - " करते हैं इशारोमें""गज़ल"चलो जी कुछ ख़ताकरते हैं इशारों मेंबवंडर ही खड़ा करतेहै इशारों मेंकहाँ तक चल सकेंगेदिनमान चुप होकरजलाते है अगन दीयाहै इशारों में।।नयी जब रोशनी होगीतम फ़ना होगाउड़ाते हैं वोफतिंगा हैं इशारों में।।भरा पानी शहर मेंले आग मत जानाबुझे मन का ठिकान
04 सितम्बर 2018
14 सितम्बर 2018
हिन्दी दिवस के सुअवसर पर आप सभी को दिल से बधाई सह शुभकामना, प्रस्तुत है मुक्तक....... ॐ जय माँ शारदा......!“मुक्तक”हिंदी सिर बिंदी सजी, सजा सितंबर माह। अपनी भाषा को मिला, संवैधानिक छाँह।चौदह तारिख खिल गया, दे दर्जा सम्मान- धूम-धाम से मन रहा, प्रिय त्यौहारी चाह॥-1बहुत बधाई आप को, देशज मीठी बोल। सगरी
14 सितम्बर 2018
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x