"गीतिका" उग आई ऋतु है चाहत की मत लाना दिल में शामत की

25 अक्तूबर 2018   |  महातम मिश्रा   (48 बार पढ़ा जा चुका है)

मापनी- 22 22 22 22, समान्त- अत, पदांत- की


"गीतिका"


उग आई ऋतु है चाहत की

मत लाना दिल में शामत की

देखो कितनी सुंदर गलियाँ

खुश्बू देती हैं राहत की।।


जब कोई लगता दीवाना

तब मन होता है बसाहत की।।


दो दिल का मिलना खेल नहीं

पढ़ना लिखना है कहावत की।।


माना की दिल तो मजनू है

पर मत चल डगर गुनाहत की।।


देखो कलियाँ चंचल होती

मत करना नजर शिकायत की।।


घूमो नाचो गाओ गौतम

पर मचलन रहन किफायत की।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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