Faiz Ahmad Faiz Shayri in Hindi - फैज़ अहमद फैज़ शायरी - गर मुझे इस का यक़ीं हो मेरे हमदम मेरे दोस्त

20 नवम्बर 2018   |  अंकिशा मिश्रा   (94 बार पढ़ा जा चुका है)

फैज़ अहमद फैज़ (Faiz Ahmad Faiz) उर्दू भाषा के सबसे प्रसिद्ध लेखकों में से एक थे। फैज़ की शायरी (Shayri) को न केवल उर्दू बल्कि हिंदी (Hindi) भाषी लोग भी बहुत पसंद करते है| गर मुझे इस का यक़ीं हो मेरे हमदम मेरे दोस्त, फैज़ अहमद फैज़ की सर्वाधिक लोकप्रिय शायरी में से एक है | इसका हिंदी और अंग्रेजी lyrics आपको इस लेख में मिल जायेगा |


Faiz Ahmad Faiz Shayri in Hindi


गर मुझे इस का यक़ीं हो मेरे हमदम मेरे दोस्त

गर मुझे इस का यक़ीं हो कि तेरे दिल की थकान

तेरी आँखों की उदासी तेरे सीने की जलन

मेरी दिल-जूई मेरे प्यार से मिट जाये

गर मेरा हर्फ़-ए-तसल्ली वो दवा हो जिससे

जी उठे फिर तेरा उजड़ा हुआ बे-नूर दिमाग

तेरी पेशानी से धूल जाये ये तज़िल के दाग

तेरी बीमार जवानी को शिफ हो जाये

गर मुझे इस का यक़ीं हो मेरे हमदम मरे दोस्त


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रोज़-ओ-शाब शाम-ओ-सहर मैं तुझे बहलाता रहूँ

मैं तुझे गीत सुनाता रहूँ हल्के शीरींन

आबशारों के बहारों के चमन-ज़ारों के गीत

आमद-ए-सुबह के, महताब के, सय्यारों के गीत

तुझसे मैं हुसैन-ओ-मोहब्बत की हिकायत कहूँ


कैसे मगरूर हसीनाओं के बरफ़ाब से जिस्म

गर्म हाथों की हरारत में पिघल जाते हैं

कैसे एक चेहरे के ठहरे हो मानूस नुकूश

देखते देखते याकलाख़त बदल जाते हैं

किस तरह आरईज़-ए-महबूब का शफ़्फफ़ बिलोर

यक-ब-यक बादा-ए-एहमार से दहक जाते है

कैसे गुलचीं के लिए झुकती है खुद शाख-ए-गुलाब

किस तरह रात का ऐवान महक जाता है


यूँही गाता रहूँ गाता रहूँ तेरी ख़ातिर

गीत बुनता रहूँ बैठा रहूँ तेरी ख़ातिर

पर मेरे गीत तेरे दुख का मदावा नहीं

नंमा जाराह नहीं मूनिस-ओ-गम ख़्वार सही

गीत नश्तर तो नहीं मरहम-ए-आज़र सही

तेरे आज़ार का चारा नहीं नश्तर के सिवा

और ये सफ़्फाक मसीहा मेंरे क़ब्ज़े में नहीं

इस जहां के किसी ज़ी-रूह के क़ब्ज़े में नहीं

हाँ मगर तेरे सिवा तेरे सिवा तेरे सिवा


Faiz Ahmad Faiz Shayri


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Gar mujhay is ka yaqee.n ho

Meray humdum, meray dost

Gar mujhay is ka yaqee.n ho

Keh teray dil ki thakan

Teri aankhon ki udaasi, teray seenay ki jalan

Meri diljoyee, meray piyaar se mit jaaye gee

Gar mera harf-e-tasallee

Vo dava ho, jis se

Jee uthay phir se tera ujra hua be noor dimaagh

Teri peshaani se dhul jaayen ye tazleel ke daagh

Teri beemaar javaani ko shifa ho jaaye..


Gar mujhay is ka yaqee.n ho

Meray humdum, meray dost

Roz-o-shab, shaam-o-sahar

Main tujhay behlaata rahoon

Main tujhay geet sunaata rahoon

Halkay, shiree.n..

Aabshaaron ke, bahaaron ke, chaman zaaron ke geet,

Aamand-e-subh ke, mehtaab ke, saiyyaaron ke geet,

Tujh se main husn-o-mohabbat ki hikaayaat kahoon,


Kesay maghroor haseenaaon ke barfaab se jism

Garm haathon ki haraarat mein pighal jaatay hain

Kesay aik chehray ke thehray huay maanoos nuqoosh

Dekhtay dekhtay yaklakht badal jaatay hain

Kis tarah aariz-e-mehboob ka shaffaaf biloar

Yak-bayak baada-e-ehmar se dehek jaata hai

Kesay gul-chee.n ke liye jhukti hai khud shaakh-e-gulaab

Kis tarah raat ka aivaan mehek jaata hai


Yoonhi gaata rahoon, gaata rahoon teri khaatir

Geet bunta rahoon, betha rahoon teri khaatir

Per meray geet teray dukh ka madaava he nahin

Naghma jarra nahin, moonis-o-ghamkhwar sahi

Geet nishtar to nahin, marham-e-aazaar sahi

Teray aazaar ka chaara nahin, nishtar ke siva

Aur yeh saffaak maseeha meray qabzay mein nahin

Is jahaa.n ke kisi zee-rooh ke qabzay mein nahin

Haan magar teray siva, teray siva, teray siva


Faiz Ahmad Faiz Shayri in Hindi

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