"गज़ल" निकला था सीप से कहीं मोती उठा लिया मैने भी आज दीप से ज्योती उठा लिया

27 नवम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (36 बार पढ़ा जा चुका है)

बह्र- 221 2121 1221 212 यूँ जिंदगी की राह में मजबूर हो गए , काफ़िया- मोती, ओती स्वर, रदीफ़- उठा लिया


"गज़ल"


निकला था सीप से कहीं मोती उठा लिया

मैने भी आज दीप से ज्योती उठा लिया

खोया हुआ था दिल ये किसी की तलाश में

महफिल थी द्वंद की तो चुनौती उठा लिया।।


जलने लगी थीं बातियाँ लेकर मशाल को

मगरूर शाम जान सझौती उठा लिया।।


चर्चा जो चल पड़ी लगे तूफान आ गया

कैसे औ क्या हुआ कि फिरौती उठा लिया।।


ये है बाजीगरी हुकम के नए दहले

क्या समझ आया तुझे सोटी उठा लिया।


था मंच दूसरों का तो वक्ता बहुत वहां

गौतम भी आदमी है पनौती उठा लिया।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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महातम मिश्रा
29 नवम्बर 2018

रचना को विशिष्ठ सम्मान प्रदान करने हेतु मंच का दिल से आभारी हूँ

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