"गज़ल" अजी यह इस डगर का दायरा है सहज होता नहीं यह रास्ता है

17 दिसम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (57 बार पढ़ा जा चुका है)

वज़्न - 1222 1222 122 , अर्कान - मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फऊलुन बह्र - बह्रे हज़ज मुसद्दस महज़ूफ़, काफ़िया - डूबता(आ स्वर) रदीफ़- है


"गज़ल"


अजी यह इस डगर का दायरा है

सहज होता नहीं यह रास्ता है

कभी खाते कदम बल चल जमीं पर

हक़ीकत से हुआ जब फासला है।।


उठाकर पाँव चलती है गरज

बहुत जाना पिछाना फैसला है।।


लगाई दौड़ बहुतों ने यहाँ पर

सुना मंजिल लगाती सिलसिला है।।


न चुकता हो सका है मोल इसका

हुआ गुमनाम अब मजमा सुना है।।


निभा लेती हैं राहें हर किसी को

नहीं होता पता वह बेसुरा है।।


सुना है रात में लगता है डर

बता गौतम जिगर सब एक सा है।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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महातम मिश्रा
21 दिसम्बर 2018

मंच व मित्रों का हृदय से आभारी हूँ, इस लेख को श्रेष्ठ रचना का सम्मान देने के लिए व मुख्य पृष्ठ पर प्रकाशित करने के लिए, सादर नमन

महातम मिश्रा
19 दिसम्बर 2018

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय उदय जी, स्वागतम

उदय पूना
18 दिसम्बर 2018

सुन्दर लेखन " हक़ीकत से हुआ जब फासला है" ; आज की सर्वश्रेष्ठ रचना केलिए बधाई; प्रणाम.

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