"गज़ल" पास आती न हसरत बिखरते रहे चाहतों के लिए शोर करते रहे

26 दिसम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (82 बार पढ़ा जा चुका है)

वज़्न--212 212 212 212, अर्कान-- फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन, बह्रे- मुतदारिक मुसम्मन सालिम, क़ाफ़िया— करते, (अते की बंदिश) रदीफ़ --- रहे


"गज़ल"


पास आती न हसरत बिखरते रहे

चाहतों के लिए शोर करते रहे

कारवाँ अपनी मंजिल गया की रुका

कुछ सरकते रहे कुछ फिसलते रहे।।


चंद लम्हों की खातिर मिले थे कभी

कुछ भटकते रहे कुछ तरसते रहे।।


सारथी ख्वाब लेकर फ़ना हो गया

पल मचलते रहे अश्व चलते रहे।।


पीर देती सनम चाबुकों की छुवन

रक्त पानी सरिष रिस निकलते रहे।।


क्या पता किस लिए लोग आते यहाँ

कुछ जमी पर पड़े ही बिलखते रहे।।


पूछ गौतम रहा क्यों सियासत हुई

आदमी को जबह कर थिरकते रहे।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: "भोजपुरी गीत" साँझे कोइलरिया बिहाने बोले चिरई जाओ जनि छोड़ी के बखरिया झूले तिरई....... साँझे कोइलरिया बिहाने बोले चिरई



महातम मिश्रा
27 दिसम्बर 2018

मंच व मित्रों का हृदय से आभारी हूँ, इस सृजन को विशिष्ट रचना का सम्मान देने के लिए व दैनिक पृष्ठ पर प्रकाशित करने के लिए, सादर नमन

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
15 दिसम्बर 2018
छंद - " मदिरा सवैया " (वर्णिक ) *शिल्प विधान सात भगण+एक गुरु 211 211 211 211 211 211 211 2 भानस भानस भानस भानस भानस भानस भानस भा"छंद मदिरा सवैया" वाद हुआ न विवाद हुआ, सखि गाल फुला फिरती अँगना।मादक नैन चुराय रहीं, दिखलावत तैं हँसती कँगना।।नाचत गावत लाल लली, छुपि पाँव महावर का रँगना।भूलत भान बुझावत हौ
15 दिसम्बर 2018
01 जनवरी 2019
"
"छड़, मकान और छत"ठिठुर रहा है देश, ठिठुर रहें हैं खेत, ठंड की चपेट में पशु-पंछी, नदी, तालाब और अब महासागर भी जमने लगे हैं अपने खारे पानी को उछालते हुए, लहरों को समेटते हुए। शायद यही कुदरत की शक्ति है जिसे इंसान मानता तो है पर गाँठता नहीं। आज वह बौना बना हुआ है और काँप रहा है अपनी अकड़ लिए पर झुकने को
01 जनवरी 2019
29 दिसम्बर 2018
"
सवैया "मदिरा" मापनी -- 211/211/211/211/211/211/211/2"छंद मदिरा सवैया"नाचत गावत हौ गलियाँ प्रभु गाय चरावत गोकुल में।रास रचावत हौ वन में क्यों धूल उड़ावत गोधुल में।।जन्म लियो वसुदेव घरे मटकी लुढ़कावत हौ तुल में।मोहन मोह मयी मुरली मन की ममता महके मुल में।।-1आपुहिं आपु गयो तुम माधव धाम बसा कर छोड़ गए।का ग
29 दिसम्बर 2018
28 दिसम्बर 2018
"
"मुक्तक" नहीं सहन होता अब दिग को दूषित प्यारे वानी। हनुमान को किस आधार पर बाँट रहा रे प्रानी।जना अंजनी से पूछो ममता कोई जाति नहीं-नहीं किसी के बस होता जन्म मरण तीरे पानी।।-1मानव कहते हो अपने को करते दिग नादानी।भक्त और भगवान विधाता हरि नाता वरदानी।गज ऐरावत कामधेनु जहँ पीपल पूजे जाते-लिए जन्म भारत मे
28 दिसम्बर 2018
12 दिसम्बर 2018
"
"हाइकु" ठंडी की ऋतुघर घर अलावबुझती आग।।-1गैस का चूल्हान आग न अलावठिठुरे हाथ।।-2नया जमानासुलगता हीटर धुआँ अलाव।।-3नोटा का कोटाअसर दिखलायामुरझा फूल।।-4खिला गुलाबउलझा हुआ काँटामूर्छित मन।।-5महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी
12 दिसम्बर 2018
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x