"गज़ल" पास आती न हसरत बिखरते रहे चाहतों के लिए शोर करते रहे

26 दिसम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (62 बार पढ़ा जा चुका है)

वज़्न--212 212 212 212, अर्कान-- फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन, बह्रे- मुतदारिक मुसम्मन सालिम, क़ाफ़िया— करते, (अते की बंदिश) रदीफ़ --- रहे


"गज़ल"


पास आती न हसरत बिखरते रहे

चाहतों के लिए शोर करते रहे

कारवाँ अपनी मंजिल गया की रुका

कुछ सरकते रहे कुछ फिसलते रहे।।


चंद लम्हों की खातिर मिले थे कभी

कुछ भटकते रहे कुछ तरसते रहे।।


सारथी ख्वाब लेकर फ़ना हो गया

पल मचलते रहे अश्व चलते रहे।।


पीर देती सनम चाबुकों की छुवन

रक्त पानी सरिष रिस निकलते रहे।।


क्या पता किस लिए लोग आते यहाँ

कुछ जमी पर पड़े ही बिलखते रहे।।


पूछ गौतम रहा क्यों सियासत हुई

आदमी को जबह कर थिरकते रहे।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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महातम मिश्रा
27 दिसम्बर 2018

मंच व मित्रों का हृदय से आभारी हूँ, इस सृजन को विशिष्ट रचना का सम्मान देने के लिए व दैनिक पृष्ठ पर प्रकाशित करने के लिए, सादर नमन

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