"गज़ल" जिंदगी के दिन बहुत आए हँसा चलते बने थे नैन सूखे कब रहे की तुम रुला चलते बने थे

01 जनवरी 2019   |  महातम मिश्रा   (17 बार पढ़ा जा चुका है)

बह्र- 2122 2122 2122 2122 रदीफ़- चलते बने थे, काफ़िया- आ स्वर


"गज़ल"


जिंदगी के दिन बहुत आए हँसा चलते बने थे

नैन सूखे कब रहे की तुम रुला चलते बने थे

दिन-रात की परछाइयाँ थी घूरती घर को पलटकर

दिन उगा कब रात में किस्सा सुना चलते बने थे।।


मौन रहना ठीक था तो बोलने की जिद किये क्यों

काठ न था आदमी फिर क्यों बना चलते बने थे।।


फिर हरा होगा पिलाया जानकर जल आप ने ही

देख रुख दरिया किधर बंधा मिला चलते बने थे।।


आप जैसे सब नहीं अलमस्त जीते हैं महल में

देख बस्ती भीड़ की चिलमन गिरा चलते बने थे।।


लौट कर आये कहाँ जबसे गए घर छोड़कर जी

दे गए बरसात अनहद छत भिगा चलते बने थे।।


दर्द की दहलीज पर सुख ढूढ़ता है हर सनम क्यों

पूछ लो गौतम कदम क्यों तुम उठा चलते बने थे।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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