"गीतिका" अभी है आँधियों की ऋतु रुको बाहार हो जाना घुमाओ मत हवाओं को अजी किरदार हो जाना

08 जनवरी 2019   |  महातम मिश्रा   (8 बार पढ़ा जा चुका है)

मापनी-1222 1222 1222 1222, समान्त- आर का स्वर, पदांत- हो जाना


"गीतिका"


अभी है आँधियों की ऋतु रुको बाहार हो जाना

घुमाओ मत हवाओं को अजी किरदार हो जाना

वहाँ देखों गिरे हैं ढ़ेर पर ले पर कई पंछी

उठाओ तो तनिक उनको सनम खुद्दार हो जाना।।


कवायत से बने है जो महल अब जा उन्हें देखो

भिगाकर कौन रह पाया नजर इकरार हो जाना।।


बहुत शातिर हुए अपने समय के जो परिंदे उड़

कहीं उनसा न इतराना भरे बाजार हो जाना।।


बहाकर बाढ़ ले जाती नहर मोती तलहटी से

न पानी से कभी लड़ना जिकर अख़बार हो जाना।।


गरज मजबूर करती है इरादों को बदल देती

मगर विश्वास पर चलना पहर परिवार हो जाना।।


न गौतम से छुपाना कुछ पकड़ अपना बना लेना

विचारे नेक मानव बन जिगर करतार हो जाना।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: "चौपाई मुक्तक" वन-वन घूमे थे रघुराई, जब रावण ने सिया चुराई। रावण वधकर कोशल राई, जहँ मंदिर तहँ मस्जिद पाई।



मंच व मित्रों का हृदय से आभारी हूँ, इस गीतिका काव्य सृजन को विशिष्ट रचना का सम्मान देने के लिए व दैनिक पृष्ठ पर प्रकाशित करने के लिए, सादर नमन

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