मेरी शायरी

27 जनवरी 2019   |  इन्दर भोले नाथ   (148 बार पढ़ा जा चुका है)

मैं बह गया क़तरा क़तरा, मैं टुटा जा़र जा़र सा,

ये मेरी वफ़ा का ईनाम है, तेरी बेवफाई वजह नहीं...

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चूहों ने जब हिम्मत बनाई ,बिल्ली को मार भगाने की…तब बिल्ली ने ढोंग रचाई,की तैयारी हज को जाने की…———————————-Acct- इंदर भोले नाथ…२१/०१/२०१६….
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कुछ तो बहेका होगा,रब भी तुझे बनाने मे…सौ मरतबा टूटा होगा,ख्वाहिशों को दबाने मे…!!आँखों मे है नशीलापन,लगे प्याले-ज़ाम हो जैसे…गालों पे है रंगत छाई,जुल्फ घनेरी शाम हो जैसे…सूरज से मिली हो लाली,शायद,लबों को सजाने मे…कुछ तो बहेका होगा,रब भी तुझे बनाने मे…!!मलिका हुस्न की हो या,हो कोई अप्सरा तुम…जो भी हो
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पर अब है,इतना वक़्त कहाँ...फिर लौट चलूं मैं,”बचपन” मे,पर अब है,इतना वक़्त कहाँ…खेलूँ फिर से,उस “आँगन” मे,पर अब है,इतना वक़्त कहाँ…क्या दिन थें वो,ख्वाबों जैसे,क्या ठाट थें वो,नवाबों जैसे…फिर लौट चलूं,उस “भोलेपन” मे,पर अब है,इतना वक़्त कहाँ…
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कुछ तो बहेका होगा,रब भी तुझे बनाने मे…सौ मरतबा टूटा होगा,ख्वाहिशों को दबाने मे…!!आँखों मे है नशीलापन,लगे प्याले-ज़ाम हो जैसे…गालों पे है रंगत छाई,जुल्फ घनेरी शाम हो जैसे…सूरज से मिली हो लाली,शायद,लबों को सजाने मे…कुछ तो बहेका होगा,रब भी तुझे बनाने मे…!!मलिका हुस्न की हो या,हो कोई अप्सरा तुम…जो भी हो
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चलो फ़ासलों को ज़रा कम करते हैं। कुछ तुम कहो , कुछ हम कहते हैं ।।
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सारी रात मैं सुलगता रहा,वो मेरे साथ जलता रहामैं सुलग-सुलग के घुटता रहा,वो जल-जलके, ऐश-ट्रे मे गिरता रहा,गमों से तड़प के मैंहर बार सुलगता रहान जाने वो किस गममे हर बार जलता रहामैं अपनी सुलगन कोउसकी धुएँ मे उछालतारहा, वो हर बार अपनीजलन को ऐश-ट्रेमे डालता रहा,घंटों तलक ये सिलसि
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उन गुज़रे हुए पलों से,इक लम्हा तो चुरा लूँ…इन खामोश निगाहों मे,कुछ सपने तो सज़ा लूँ…अरसा गुजर गये हैं,लबों को मुस्काराए हुए…सालों बीत गये “.ज़िंदगी”,तेरा दीदार किये हुए…खो गया है जो बचपन,उसे पास तो बुला लूँ…उन गुज़रे हुए पलों से,इक लम्हा तो चुरा लूँ…जी रहे हैं,हम मगर,जिंदगी
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