मेरी शायरी

27 जनवरी 2019   |  इन्दर भोले नाथ   (104 बार पढ़ा जा चुका है)

मैं बह गया क़तरा क़तरा, मैं टुटा जा़र जा़र सा,

ये मेरी वफ़ा का ईनाम है, तेरी बेवफाई वजह नहीं...

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17 जनवरी 2019
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बिखरे हुए ल्फ्ज़,अल्फाज़ों मे निखर गयें,निखरे मेरे-अल्फ़ाज़,जब हम बिखर गयें…——————————————————–Acct-इंदर भोले नाथ…08/02/2016
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हे
हे कान्हा...अश्रु तरस रहें, निस दिन आँखों से बरस रहें,कब से आस लगाए बैठे हैं, एक दरश दिखाने आ जाते...बरसों से प्यासी नैनों की, प्यास बुझाने आ जाते...बृंदावन की गलियों मे, फिर रास रचाने आ जाते...राधा को दिल मे रख कर के, गोपियों संग रास रचा जाते...कहे दुखियारी मीरा तोह से,
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पर अब है,इतना वक़्त कहाँ...फिर लौट चलूं मैं,”बचपन” मे,पर अब है,इतना वक़्त कहाँ…खेलूँ फिर से,उस “आँगन” मे,पर अब है,इतना वक़्त कहाँ…क्या दिन थें वो,ख्वाबों जैसे,क्या ठाट थें वो,नवाबों जैसे…फिर लौट चलूं,उस “भोलेपन” मे,पर अब है,इतना वक़्त कहाँ…
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छूटी जो गली उनकी दर्दे अफ़साना बन गया, बिछड़ना उनसे बहाना - ए - मौत बन गया. यूँ तो आना जाना लगा रहता है जिंदगी में, पर उनका इस तरह जाना गवारा ना हुआ. देख जिन्दा मुझे लगता है ये अफसाना झूठा,बिना उनके जीना मौत से कम तो ना हुआ.(आलिम)
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चूहों ने जब हिम्मत बनाई ,बिल्ली को मार भगाने की…तब बिल्ली ने ढोंग रचाई,की तैयारी हज को जाने की…———————————-Acct- इंदर भोले नाथ…२१/०१/२०१६….
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18 जनवरी 2019
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