कुछ शेर

07 अप्रैल 2019   |  महातम मिश्रा   (40 बार पढ़ा जा चुका है)


"कुछ शेर"


बहुत गुमराह करती हैं फिजाएँ जानकर जानम
आसान मंजिल थी हम थे अजनवी की तरह।।


तिरे आने से हवावों का रुख भी बदला शायद
लोग तो कहते थे कि तुम हुए मजहबी की तरह।।


समय बदला चलन बदली और तुम भी बदले
बदली क्या आँखें जो हैं ही शबनबी की तरह।।


लगाए आस बैठी है इंतजार लिए नजरों में
तुम आए तो पर जलाए किसी हबी की तरह।।


यह गौतम तेरे राहों में कभी भी न आता
पर इस जमी की फसल है रबी की तरह।।


महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी

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