गीतिका

27 जून 2019   |  महातम मिश्रा   (67 बार पढ़ा जा चुका है)

मंच को प्रस्तुत गीतिका, मापनी- 2222 2222 2222, समान्त- अन, पदांत- में...... ॐ जय माँ शारदा!


"गीतिका"


बरसोगे घनश्याम कभी तुम मेरे वन में

दिल दे बैठी श्याम सखा अब तेरे घन में

बोले कोयल रोज तड़फती है क्यूँ राधा

कह दो मेरे कान्ह जतन करते हो मन में।।


उमड़ घुमड़ कर रोज बरसता है जब सावन

मुरली की धुन चहक बजाते तुम मधुवन में।।


कलियाँ करती शोर तपे वृजनारी सखियाँ

तुम राधे सा फूल उगा जाते उपवन में।।


मथुरा का उद्धार किये तुम सात जनम में

गोकुल के दरबार पहुँच जाते हो छन में।।


अब तो बरसो श्याम सुराही चटक रही है

यमुना जरत कछार अश्रु बहते नयनन में।।


गौतम ग्वाला गाय नजर से दूर हुए क्यों

मीत सुदामा को नहलाते हो किस पन में।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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रचना को विशिष्ट श्रेणी का सम्मान प्रदान करने हेतु मंच व मित्रों का हृदय से आभारी हूँ

रचना को विशिष्ट श्रेणी का सम्मान प्रदान करने हेतु मंच व मित्रों का हृदय से आभारी हूँ

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