सोचा न था

23 सितम्बर 2019   |  धर्मेन्द्र कुमार   (436 बार पढ़ा जा चुका है)

सोचा न था

!

एक रोज़ इस मोड़ से गुजरना पड़ेगा,

जिंदगी को मौत से यूँ लड़ना पड़ेगा,

चलते चलते लड़खड़ायेंगे पग राहो में

गिरते गिरते खुद ही सम्भलना पड़ेगा !!

!

डी के निवातिया

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