सत्यिका

17 अक्तूबर 2019   |  shivbalak Pandey   (3193 बार पढ़ा जा चुका है)

सत्यिका

घूरती आखोँ में हँसी

तंज की ठिठोली हैं

अमानत थोड़ी हैं जो किसी की हो ली है

उनकी रुह में भी, छोड़ आया हूँ खुद को

अभी लब्ज बोले हैं, मोहब्बत कहाँ बोली हैं

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