ग़ज़ल

02 जनवरी 2020   |  आलोक कौशिक   (591 बार पढ़ा जा चुका है)

ग़ज़ल

हर राम का जटिल जीवन पथ होगा

जब पिता भार्या भक्त दशरथ होगा


करके ज़ुल्म करता है वो इबादत

कहो फिर कैसे पूर्ण मनोरथ होगा


नींद आयेगी तुझे भी सुकून भरी

जब तू भी पसीने से लथपथ होगा


कृष्ण का भी रथ बढ़ रहा नहीं आगे

सुदामा के रक्त से सना राजपथ होगा


आज भी दुःशासन कर रहा विचरण

कानून खरीदने में वो महारथ होगा


....................


:- आलोक कौशिक


संक्षिप्त परिचय:-

नाम- आलोक कौशिक

शिक्षा- स्नातकोत्तर (अंग्रेजी साहित्य)

पेशा- पत्रकारिता एवं स्वतंत्र लेखन

साहित्यिक कृतियां- प्रमुख राष्ट्रीय समाचारपत्रों एवं साहित्यिक पत्रिकाओं में दर्जनों रचनाएं प्रकाशित

पता:- मनीषा मैन्शन, जिला- बेगूसराय, राज्य- बिहार, 851101,
अणुडाक- devraajkaushik1989@gmail.com

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तक़दीर में केवल खुशियां कब आती हैं सच्चे प्यार में परेशानियां सब आती हैं छुपा ना रहे जब राज़ कोई दरमियांमोहब्बत में गहराइयां तब आती हैं सोचा भूल गया तुझसे बिछड़के लेकिन तेरे संग गुजारी शामें याद अब आती हैं फैल जाती है खुशबू सारी फ़िज़ाओं में तेरे तन को छूकर हवायें जब आती हैं ...................
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बहुत हुई आवारगी अब तो संभल जाने दो निभाना है मुझे राष्ट्रधर्म मत रोको जाने दो अंधेरा बहुत गहरा है एक चिराग़ जलाने दो खोल दो पिंजरें सारे परिंदों को उड़ जाने दो वे कोई ग़ैर नहीं हैं औलादें हैं मेरी मां की मत रोको उन्हें मेरे गले से लग जाने दो सुना है बहुत शिकायतें हैं उन्हें मेरी ग़ज़ल से करेंगे वो भी
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शेरनी भी पीछे हट गयीबछड़े की मां जब डट गयीहमारी कलम वो खरीद न सकेलेकिन स्याही उनसे पट गयीहमारे मुंह खोलने से पहलेदांतों से जीभ ही कट गयीसच बोलने लगा है अब वोसमझो उमर उसकी घट गयीगौर से देखो मेरे माथे कोबदनसीबी कैसे सट गयीकमीज तो सिला ली हमनेलेकिन अब पतलून फट गयीउसने गले से लगाया ही थाकमबख़्त नींद ही उच
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आज लौटकर मिलने मुझसे मेरा यार आया हैशायद फिर से जीवन में उसके अंध्यार आया हैबचकर रहना अबकी बार चुनाव के मौसम मेंमीठी बातों से लुभाने तुम्हें रंगासियार आया हैबहुत प्यार करता है मुझसे मेरा पड़ोसीमुझे यह समझाने लेकर वो हथियार आया हैगले मिलकर गले पड़ना चाहता है दुश्मनलगता है अबकी बार बनके होशियार आया हैमे
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तुम मुझे लगती बहुत ही प्यारी हो सच-सच बताओ क्या तुम बिहारी हो अब तो होने लगा है प्यार भी तुमसे लगता है फ़नां होने की बारी हमारी हो जो भी आया खुरच कर घायल कर गया जैसे हमारा दिल इमारत सरकारी होभर जाते पेट नेताओं के भाषण से ही जब महंगाई के साथ बेरोजगारी हो लिखेंगे ग़ज़ल हम अपनी मर्ज़ी से ही दुश्मन तुम या स
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