सब्बा खैर

11 फरवरी 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (475 बार पढ़ा जा चुका है)

सब्बा खैर

आज निंदिया आवे ना आवे,

सब्बा खैर का तो बनता है।

सुबह के सपने सच हों,

मालिक से यह बंदा,

इल्तिज़ा

करता है।।

के. के.

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धन्यवाद् नीरज चंदेल जी🙏

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