सब्बा खैर से शाम की सफर

12 फरवरी 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (387 बार पढ़ा जा चुका है)

सब्बा खैर से शाम की सफर

सब्बा खैर से शाम तक की सफर


आज निंदिया आवे ना आवे,

सब्बा खैर का तो बनता है।

सुबह के सपने सच हों,

मालिक से यह बंदा,

इल्तिज़ा किया करता है।।

भोर का सपना टुटते के संग

चाय का प्याला सजता है।

हो, न हो फर्माइश उनकी,

शाम को तोहफा बनता है।।


डॉ. कवि कुमार निर्मल

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