वख़्त बचता नहीं

20 फरवरी 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (1202 बार पढ़ा जा चुका है)

वख़्त बचता नहीं

वख़्त बचता नहीं


वख़्त बचता हीं नहीं उफ! खुद के लिये,
हदों के पार जा- ख़ुद को कुछ सँवार लूँ!
गुलशन में तुम्हारे मशगूल हुए इस कदर,
कैसे (?) कुछ लम्हें तेरी तवज़्जो में,
'गुफ़्तगू' कर ताजिंदगी गुजार दूँ!!


डॉ. कवि कुमार निर्मल

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