बेवफा है जिंदगी न करना मौहब्बत

29 फरवरी 2020   |  शालिनी कौशिक एडवोकेट   (315 बार पढ़ा जा चुका है)


दरिया-ए-जिंदगी की मंजिल मौत है ,

आगाज़-ए-जिंदगी की तकमील मौत है .

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बाजीगरी इन्सां करे या कर ले बंदगी ,

मुक़र्रर वक़्त पर मौजूद मौत है .

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बेवफा है जिंदगी न करना मौहब्बत ,

रफ्ता-रफ्ता ज़हर का अंजाम मौत है .

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महबूबा बावफ़ा है दिल के सदा करीब ,

बढ़कर गले लगाती मुमताज़ मौत है .

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महफूज़ नहीं इन्सां पहलू में जिंदगी के ,

मजरूह करे जिंदगी मरहम मौत है .

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करती नहीं है मसखरी न करती तअस्सुब,

मनमौजी जिंदगी का तकब्बुर मौत है .

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ताज्जुब है फिर भी इन्सां भागे है इसी से ,

तकलीफ जिंदगी है आराम मौत है .

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तक़रीर नहीं सुनती न करती तकाजा ,

न पड़ती तकल्लुफ में तकदीर मौत है .

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तजुर्बे ''शालिनी''के करें उससे तज़किरा ,

तख्फीफ गम में लाने की तजवीज़ मौत है .

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शालिनी कौशिक

[कौशल]


शब्दार्थ-तकमील-पूर्णता ,मुक़र्रर-निश्चित ,बावफ़ा-वफादार , तअस्सुब-पक्षपात, तज़किरा-चर्चा ,तक़रीर-भाषण ,तकब्बुर-अभिमान ,तकाजा-मांगना ,मुमताज़-विशिष्ट ,मजरूह-घायल

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