आशिकाना

12 मार्च 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (310 बार पढ़ा जा चुका है)

आशिकाना

★★★★★उल्फ़त★★★★★
क़ायनात के मालिक का वारिस,
भिखारी बन छुप अश्क बहाता है।
सर्वनिगलु एक अमीरजादा,
खोटे सिक्के की बोरी पाता है।।
🌵🌵🌵🌵🌵🌵🌵🌵
सुना है इश्क 'खास महिने' में
शिकार कर सवँरता हैं !
हुश्न पे एतवार कर,
"मुकम्मल" फना होता है!!
🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂
उड़ता रहा ख्यालों में तेरे
उम्मीदों से गुल खिले मेरे
💮💮💮💮💮💮💮💮
किश्ती उसने, दिल में चुराई है।
कैदी बना, राहें सारी मिटाई है।।
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
तेरे काज में ऊलझा रहूँ,
किया फैसला आज है।
दिल में उतर जाने का ये,
इक नायाब अंदाज है।।
🌼🌼🌼🌼🌼🌼
आशियाने कई बन कर,
गर्दिशों में तबाह हो खो गए।
खुले आसमां के नीचे
हम सदाबहार बन सँवर गए।।
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
🌱🌱 🥀के• के•🥀🌱🌱

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