गज़ल

21 जुलाई 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (313 बार पढ़ा जा चुका है)

गज़ल

💐💐💐★गज़ल★💐💐💐
🍥🍥🍥🍥🍥🍥🍥🍥


गज़लों में हदें पार होती हैं
दिलदारों की खातिर--
अगाज़ होती हैं
आवाम की नहीं,
मोहताज होती है
शर्म की आवाज--
दुश्वार होती है
अनकही दास्तॉ--
चिलमन के पार होती है
शरगोशी को गुनाह--
करार जो देते है
वे ताज़िंदगी पल्लू--
पकड़ के रोते हैं
सरहदों की बात--
यहाँ बेजान होती है
बिना जुबाँ हरकतें--
दिल के पार होती हैं
हक़ीक़त तो यह है कि,
मुहब्बत आर-पार होती है
🌹🌹🌹🌹🌹🌹
करिश्मा देख तेरा,
मस्ती में खो गया कैसे।
जन्नत का फलसफ़ा,
भुला भरपुर हो गया ऐसे।।
नुरानी फ़ितरत का जलवा,
फकिरी का पहना दिया सेहरा।
क़ायनात के जर्रे-जर्रे में,
दीदार मुमक़िन हो गया तेरा।।
नेह में मशगुल हुआ दिल ऐसा,
कमाल का मोहसिन- खुदा जैसा।।
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺
मुलायम बहुत दिल- ठोकर मारा-
ठठा के हँस रहा ज़ालिम!
लबों की खुश्की से--
बोल भी न तूं रे पाएगा !!
माना की रौशन है--
आशियाना आज तेरा!
आने वाले दिनों में,
कब्रिस्तान वह कहलाएगा!!


🌵🌵🌵🌵🌵🌵🌵🌵
🙏 डा. कवि कुमार निर्मल 🙏

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15 जुलाई 2020
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