बेइंतिहा जुगलबंदी

12 सितम्बर 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (447 बार पढ़ा जा चुका है)

बेइंतिहा जुगलबंदी

शायरी

जुगलबंदी : बेइंतिहा
•●★☆★□■बेइंतिहा■□★☆★●•



इनकार किया-

बेइंतिहा की खाई थी कसम
खून से लिखा कई बार-

मोहसिन ओ' हमदम

छुप के बैठा दिल में-

खंगाल कर जरा तो देख
बेइंतिहा इश्क-

तम्मना न दबा- इज़हार फेंक

बेइंतिहा प्यार हमारा साथ पचास पार
घुल जाती है तुरंत आई बेवज़ह खार


लबों पे तेरे सारा

जहाँ सिमटा सदा नज़र आता है
बेइंतिहा देख मोहब्बत-

इधर कोई आ न पाता है

आमना - सामना

इत्तेफाकन अगर हो जाए
समन्दर भी देख

बेइंतिहा मचल उछल जाए

नाचीज़ सुकून का

कोई मसीहा तो नहीं
तिश्नगी मिट न पाए-

बेइंतिहा प्यार नहीं

जिश्म की यह दूरी तो ख्वाब है
रूह का रिश्ता-बेइंतिहा प्यार है

हुस्न - ओ - शबाब

बेइंतिहा प्यार लुटाता है
साँसों की आलिशान ज़ागीर में

वो बसता है

बटम एण्ड्रॉयड पर बस चलाते रहे
बेइंतिहा प्यार का चप्पु- चलाते रहे
१०
दुनिया भुला के आशिक दौड़ आया
बेइंतिहा प्यार- सबब बन महकाया
११
बेशक- बेइंतिहा प्यारा है अहबाब
कर दिखाता- देखता नहीं ख़्वाब
१२
किताब में नहीं

महफ़िल में मुझे पाओगे
बेइंतिहा तबस्सुम लुटा के

तगमा पाओगे
१३
रंग निखर गया बेइंतिहा दर्देदिल सहके
बेइंतिहा अश्क भी रे आज देख चहके
१४
आज कुछ पल और ठहर जाना है
बेइंतिहा प्यार की- गज़ल गाना है
१५
कर दिए इनकार तो इकरार कैसा?
बेइंतिहा किया- यह प्यार कैसा?
१६
हदों के पार की

बेइंतिहा मोहब्बत आजमाते हैं
दिल की बात कह-

साहील से आज टकराते हैं
१७
अल्फा पहन दर पर आज हम आएं हैं
बेइंतिहा मोहब्बत का पैगाम लाएं हैं
१८
श्याही सुख न जाए,

फिक्र ओ' इंतजाम तो कर
बेइंतिहा किया प्यार-

कलम चला- इज़हार कर
१९
बेइंतिहा प्यार का आज इंतिहॉ है
सम्मा के आगे परवाना लाचार है
२०
झेल लेंगे बेइंतिहा प्यार-

वायदा था कभी
चिलमन हटा के दौड़ के

आ जाओ अभी
२१
बेइंतिहा प्यार का यह असर
फकीरी में न बची जरा कसर
२२
बेइंतिहा लब्ज़ कह

सब्जबाग दिखाती हो
हुश्न का जलवा-

तुम दिखा नहीं पाती हो
२३
तसव्वुर में बेइंतिहा इज़हार फरेब है
ज़़ालिम जमाना, दुस्वार सोहबत है
२४
बेइंतिहा करता हूं प्यार, कहते हो
पास आ के भी- मजबूर कहते हो
💮💮💮💮💮💮💮💮💮
डॉ. कवि कुमार निर्मल

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