मज़बूरियां आशिक़ी की

02 नवम्बर 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (405 बार पढ़ा जा चुका है)

मज़बूरियां आशिक़ी की

मज़बूरियां आशिकी में


खुदगर्जी आदमजात की फ़ितरत- दुनियावी शौक है!

चाहतोँ का शिलशिला मजबूरी-

न ओर है- न छोर है!!

अपनी कमियों पर पर्दा डाल सभी पाक - साफ नज़र आते हैं!

इनकार करते हैं मगर इकरार के

दो लब्ज़ खातिर तरस जाते हैं!!

टूटा है हर आशिक़ मगर-

अबतलक़ बिखरा नहीं है।

अश्क दिखते तो हैं हजार-

मगर खुल रोता नहीं है।।

हँसू या फिर न हसूँ पर-

सभों को हँसाते रहा हूँ मैं।

अश्क देख गैरों का-

अहबाब बन उम्मीद

दिलाता रहा हूँ मैं।।

प्यार तो दिल की है बात-

लब्ज़ जुवां पर उतर नहीं पाती।

ज़िश्म से ताल्लुक रहे कहाँ

दर्द-ओ'-चुभन हो नहीं पाती।।

चाहतों का ख़्वाब पुरज़ोर

दिगर में मचल उझल उठा।

साहिल को देखते ही-

माँझी का पतवार चल पड़ा।।

हुश्न का मुक़ाम अनदेखा पर- लाज़वाब था।

इश्क़ेफ़ितूर उफना इस कदर-

बेहिसाब था।।

आइना एक चमकता-

आशिक़ के हाथ था।

शौहरत में दम-जवाब

हर सवाल का तैयार था।।

सब था मगर क़िरदार इश्क का

पाक़-साफ़ था।

इकरार की इल्तिज़ा-

हुनर के दीदार का इंतज़ार था।।


डॉ. कवि कुमार निर्मल___________✒️

बेतिया, जिला: पश्चिम चंपारण (बिहार)

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