इंतज़ार के लम्हें

03 दिसम्बर 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (682 बार पढ़ा जा चुका है)

इंतज़ार के लम्हें

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★☆★इंतजार के लम्हें★☆★
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माना के इंतज़ार है दुश्वार लम्हें

इनको खुर्दबीन से मत निहारा करो।
हौसला ओ' दम है गर-चे- पास तो
कारवां के संग-संग बस चला करो।।
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ख़्वाबों से ख्वाहिश न पूरी हुई है कभी।
मुक़ाम की ओर किश्ती को धुमा बहा चलो-
साहिल पे नज़र सदा रखना अपनी कड़ी।।
फरिस्ते खासमखास बन आमीन कहें सभी।।।
💎💎💎💎💎💎💎💎💎💎
"आफताब" चाँद का इंतजार कर--
ढल हर शाम- नये ख्वाब सजाता है।
चाँदनी लुटा चाँद प्यासे चकोर को--
तिश्नगि जगा आँखों को तरसाता है।।
💎💎💎💎💎💎💎💎💎💎
बादल छुपा के आगोश में चाँदनी---
तअन्नुस पुरज़ोर लुटता-लुटाता है।।
💎💎💎💎💎💎💎💎 💎💎
गुलशन तरोताज़ा है तुझसे-
पतझड़ का नाम न ले।
काली घटायें हैं बेताब-
तिश्नगी का अब नाम न ले।।
🌊 🌊🌊🌊🌊🌊 🌊🌊🌊
पुरज़ोर उछाल है समन्दर में-
साहिल से पुकारता अहबाब है।
इंतजार की कीमत पूरी बसूल-
मंजर खड़ा आस-पास है।।

💎💎💎💎💎💎 💎💎💎 💎💎💎 💎
"चलते-चलते" क़ायनात से

भरपूर सीख लें हुनर।
माँ के आँचल से प्यार छलकता-

सीख लें मगर।।
❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️
मन की आवाज़ से

्इ्ल्म सारा सीख लें।
घड़ी की टिक्-टिक् से

फर्ज अपना सीख लें।।
इंतजार के लम्हें हिसाब कर

जीना सीख लें।।।


❤️डॉ. कवि कुमार निर्मल ❤️
बेतिया (पश्चिम चंपारण), बिहार


मौलिक एवं स्वरचित रचना है___✒️

इंतज़ार के लम्हें

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