"गीत" कितना सुंदर मौसम आया

27 अगस्त 2018   |  महातम मिश्रा   (63 बार पढ़ा जा चुका है)

मापनी - 22 22 22 22

"गीत"


कितना सुंदर मौसम आया

साथी तेरा साथ सुहाया

पकड़ चली हूँ तेरी बाहें

आँचल मेरा नभ लहराया।।


रहना हरदम साथ हमारे

शीतल है कितनी यह छाया।।


नाहक उड़ते विहग अकेले

मैंने भी मन को समझाया।।


दूर रही अबतक छवि मेरी

आज उसे फिर वापस पाया।।


चँहक रही हूँ खेल रही हूँ

साजन तूने मन हरषाया।।


गौतम तेरा बाग खिला है

भौंरा सावन को ले आया।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: "दोहा"इंसानों के महल में पलती ललक अनेक।



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
23 अगस्त 2018
"हाइकु"मेरे आँगनगीत गाती सखियाँ तुलसी व्याह।।-१कार्तिक माहभर मांग सिंदूरतुलसी पूजा।।-२तुलसी दलघर-घर मंगलसु- आमंत्रण।।-३तुलसी चौरा रोग विनाशकदीप प्रकाश।।-४तुलसी पत्तासाधक सुखवंतादिव्य औषधि।।-५महातम मिश्र गौतम गोराखपुरी
23 अगस्त 2018
16 अगस्त 2018
“कुंडलिया” आगे सरका जा रहा समय बहुत ही तेज। पीछे-पीछे भागते होकर हम निस्तेज॥ होकर हम निस्तेज कहाँ थे कहाँ पधारे। मुड़कर देखा गाँव आ गए शहर किनारे॥ कह गौतम कविराय चलो मत भागे-भागेकरो वक्त का मान न जाओ उससे आगे॥महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी
16 अगस्त 2018
13 अगस्त 2018
शिल्प विधान- कुल मात्रा =३० (१० ८ १२) १० और ८ पर अतिरिक्त तुकान्त “छंद चवपैया " (मात्रिक )जय जय शिवशंकर प्रभु अभ्यांकर नमन करूँ गौरीशा। जय जय बर्फानी बाबा दानी मंशा शिव आशीषा॥प्रतिपल चित लाऊँ तोहीं ध्याऊँ मन लागे कैलाशा। ज्योतिर्लिंग
13 अगस्त 2018
29 अगस्त 2018
“हाइकु” सजी बाजर राखी रक्षा त्यौहार रंग बिरंगी॥-1 रंग अनेक कच्चे पतले धागेराखी वन्धन॥-2 पावनी राखी रिश्ता ऋतु बैसाखी सुंदर पल॥-3 ओस छाई रीवर्षा ऋतु आई रीझूलती नारी॥-4 विहग उड़ेपग सिहर पड़ेडरती नारी॥ -5 आ रे बसंततूँ ही दिग-दिगंतसुंदर नारी॥-6 महतम मिश्र, गौतम गोरखपुरी
29 अगस्त 2018
21 अगस्त 2018
मापनी -२१२२ २१२२ २१२२ २१२ सामंत- आ पदांत-दिख रहा“गीतिका”अटल बिन यह देश अपना आज कैसा दिख रहाहर नजर नम हो रही पल बे-खबर सा दिख रहाशब्द जिनके अब कभी सुर गीत गाएंगे नहींखो दिया हमने समय को अब इंसा दिख रहा।।याद आती हैं वे बातें जो सदन में छप गईझुक गए संख्या की खातिर नभ सितारा
21 अगस्त 2018
31 अगस्त 2018
“मुक्तक” फिंगरटच ने कर दिया, दिन जीवन आसान। मोबाइल के स्क्रीनपर, दिखता सकल जहान। बिना रुकावट मान लो, खुल जाते हैं द्वार- चाहा अनचाहा सुलभ, लिखो नाम अंजान॥-1 बिकता है सब कुछयहाँ, पर न मिले ईमान। हीरा पन्ना अरु कनक, खूब बिके इंसान। बिन बाधा बाजार में, बे-शर्ती उपहार- हरि प्रणाम मुस्कानसुख, सबसे बिन पह
31 अगस्त 2018
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x