"देशज गीत" सजरिया से रूठ पिया दूर काहें गइल नजरिया के नूर सैंया दूर काहें कइल

08 जनवरी 2019   |  महातम मिश्रा   (41 बार पढ़ा जा चुका है)

"देशज गीत"


सजरिया से रूठ पिया दूर काहें गइल

नजरिया के नूर सैंया दूर काहें कइल

रचिको न सोचल झुराइ जाइ लौकी

कोहड़ा करैला घघाइल छान चौकी

बखरिया के हूर राजा दूर काहें गइल..... सजरिया से रूठ पिया दूर काहें गइल


कहतानि आजा बिहान होइ कइसे

झाँके ला देवरा निदान होइ कइसे

नगरिया के झूठ सैंया फूर काहें कइल..... सजरिया से रूठ पिया दूर काहें गइल


कुछ त बताव गलानि करें अँगना

अस निर्मोही कस होइ गइल सजना

का देखि लुभइल गरूर काहें कइल..... सजरिया से रूठ पिया दूर काहें गइल


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: "चौपाई मुक्तक" वन-वन घूमे थे रघुराई, जब रावण ने सिया चुराई। रावण वधकर कोशल राई, जहँ मंदिर तहँ मस्जिद पाई।



मंच व मित्रों का हृदय से आभारी हूँ, इस देशज गीत काव्य सृजन को विशिष्ट रचना का सम्मान देने के लिए व दैनिक पृष्ठ पर प्रकाशित करने के लिए, सादर नमन

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