वसंत की याद

21 जनवरी 2019   |  अमित   (187 बार पढ़ा जा चुका है)

वसंत की यादवसंत की याद

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अक्षुण्ण यौवन की सरिता में,

पानी का बढ़ आना

कमल-कमलिनी रास रचायें,

खग का गाना गाना;

याद किया जब बैठ शैल पर,

तालाबों के तीरे

मौसम ने ली हिचकी उठकर,

नंदनवन में धीरे।


नाद लगाई पैंजनियों ने,

चिट्ठी की जस पाती

झनक-झनक से रति शरमायी,

तितली गाना गाती;

जगमग-जगमग दमक उठा जब,

रवि किंशुक कुसुमों सा

मानस, आभामंडित होकर,

धवल नीर बन बरसा;

याद किया जब बैठ शैल पर,

तालाबों के तीरे

मौसम ने ली हिचकी उठकर,

नंदनवन में धीरे।


कुछ, ऐसी किरणें लेकर तब,

ऋतु बसंत का आना

पोर-पोर में दर्द मधुर सा,

आतप का सकुचाना;

हर्षित कोंपल, मुकुल सौरभित,

हुवे जीव-वश ऐसे

मन-मृणाल, रस अब टपकाता,

मस्त गजों के जैसे;

याद किया जब बैठ शैल पर,

तालाबों के तीरे

मौसम ने ली हिचकी उठकर,

नंदनवन में धीरे।

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