कसैले पन का कसाव

30 दिसम्बर 2018   |  जानू नागर   (100 बार पढ़ा जा चुका है)

(कसैले पन का कसाव)

मेड़म फोटो खीचेंगी यह लाईन अभद्रता भरी लाईन या अभद्रता की प्रतीक थी। एक चाटा भरी आवाज के साथ प्रतीक वर्दियों से घिर गया। किसी के कमर मे काली बेल्ट पैरो मे काले जूते जिसमे चेरी की पोलिस ही चमक रही थी। किसी के कमर मे बंधी लाल बेल्ट पैरो मे लाल जूता वह दरोगा या कह लो सब इंस्पेक्टर यह लाईन इन्ही इंस्पेक्टर साहिबा के लिए थी। मेड़म फोटो खीचेंगी...। लाल सिंगनल के पीछे खड़ी लाल प्रीमियम ट्रेन जिसमे एक भी भेड़ बकरी वाला डिब्बा नहीं, एक खाली डिब्बा था। जिसे माल डिब्बा कहते हैं। यह लाईन वही से शुरू हुई थी कि मेडम फोटो खिचेंगी। प्लेटफाम मे टिंग टोंग का सायरंग बज उठता यह गाड़ी अपने निर्धारित सामय से आठ घंटे की दरी से चल रही हैं। वह ट्रेन हरे सिंगलन के साथ आगे बढ़ चली एक जोरदार हॉर्न के साथ ट्रेन रेल को जैसा का तैसा छोडकर चली गईं। वही एक ट्रेन थी जिसमे उसे जाना था वह तो चली गईं। मेड़म साहिबा इसे अंदर ले चलो इसे अब हम बोलना सिखाएँगे की किसी लेडी कर्मचारी से कैसे बात करते हैं? उसका यह कहना हुआ की एक काली टोपी वाले ने प्रतीक की हथेलियों को अपनी हथेली मे फसा लिया उसकी हथेली की छुवन से पता चल गया था कि वह आज कानून के हाथो बांध गया। वह गाय की तरह आगे-आगे खूटा पीछे वह कई बार उससे बिनती किया साहब हमने गलत नहीं की वह भी बोला वह भी उसी तर्ज मे कहता हा आपने कुछ नहीं बोला वह तो अभी मेड़म बताएँगी कि तुमने क्या बोला... नहीं बोला?

वह काँच के घेरे से होते हुए एक मेज के पास ले गया जहाँ कई लड़के वहाँ पहले से मौजूद थे। यही खड़े रहो उसका इतना कहना हुआ कि वह मेड़म साहिबा अपनी टोपी को सर से उतारते हुए कहने लगी तुम्हें बात करने की तमीज नहीं हैं। हमने गलत क्या कह दिया? दूसरा सिपाही मेड़म बहुत अच्छी हैं माफी मांग लो छोड़ देंगी। मांग तो रहा हूँ और कैसे मंगू? मेड़म साहिबा अब जेल जाएगा कोई माफी नहीं वह गुस्से से लाल थी। वह गुस्सा भी वर्दी के साथ खूबशूरत लग रहा था। उनके सर के सारे बाल एक जगह सिमट कर एक जाली नुमा रुमाल से बंधे थे जिसमे एक काली चौड़ी चिमटी भी लगी हुई थी लाल ऊंचे जूतो की वजह से वह लंबी दिख रही थी उसी लंबाई की वजह से लगता है वह यहाँ पहुंची थी।

उसे इस पद से बड़ा गुमान था उसके किसी एक कोने मे मुस्कान थी पर वह जाहीर नहीं होने दे रही थी बस एक ही बात की रट लगा रखी थी आज मै तुम्हें सबक सीखा दूँगी। चलो इसे भी अंदर डालो इतना कहकर न जाने कहाँ चली गईं? काँच का कमरा होने की वजह से प्लेटफॉर्म तो दिख रहा था पर शोर बिकुल नहीं आ रहा था। उस काले से आईने मे ट्रेन खिसकती हुई दिखाई पड़ती और एक मिनट बाद सबकुछ वैसा का वैसा हो जाता। अरे भाई हमने कहा अपनी बेल्ट खोलो जूता उतारो अपना बैग इधर रखो अंदर चलो, मेड़म कह कर गई हैं। अंदर उस कमरे मे लड़को आदमियो को भेड़ की तरीके डाल दिया। सभी एक दूसरे के बारे मे जानने लगे सभी कहते यह मेड़म सुबह से किसी न किसी को पकड़ कर ले आती हैं और कुछ देर रखती हैं और हजार पाँच सौ का जुरमाना बोलकर छोड़ देती हैं।

तुम बताओ तुम्हें क्या कहकर लाई हैं? यही, कि तुमने लेडी से बत्तमीजी से बात की हैं तब से यही कह रही हैं जेल भेजूँगी इस बार अगर इसने यह लाईन दोहराई तो कहदूंगा तू मुझे जेल भेज दे फासी मे चढ़वा दे उतने देर से माफी भी मांग रहा रहा हूँ, अपने आप को पता नहीं क्या समझती हैं? घर फोन लगाया लेकिन वह फिर से आ गई और कहने लगी अभी तुम अपनी हरकत से बाज नहीं आए और वहाँ पर महजूद सिपाही को धमकाने लगी वो देखो बात कर रहा हैं और आप देख रहे हैं सिपाही ने कहा हमने उसका फोन जमा कर लिया हैं। यह देखो वह दूसरे वाले से फोन किया हैं वह अब तक फोन को छीन चुकी थी। उसके छीनने से पहले घर पर पता चल गया कि जीआरपी थाने मे हैं इतना ही बोल पाया था कि रेलवे पुलिस ने पकड़ लिया हैं। घर वाले फोन करते रहे अब तक वह दोनों फोनो को स्वीच आफ कर दिया था।

अब वह लिखा-पढ़ी मे लग गईं अपना नाम बताओ? कितना पैसा हैं? सामान क्या-क्या हैं? मुबाईल कौन सी कंपनी का हैं? सिम किस कंपनी का हैं? यह सब क्यो पूछ रही हैं आप, हमने गलती क्या किया हैं? यह तुझे जेल मे ही पता चलेगा कि क्या गलती किया हैं? बस चुप रह कर उसके सारे सवालो का जवाब देता रहा वह सारे कागज पूरा करके जितनी धारा उसे लगानी थी वह सब लगा दिया। यह समझो कि उसने जेल जाने का पूरा प्रबंध कर दिया और लंच के लिए बाहर निकल गईं। सामने बैठे सिपाही से कमरे मे बंद सभी कहते बाबू जी हमारे छोटे-छोटे बच्चे हैं हमे तो छुडवा दो यह सुन वह कहता शोर मत करो अभी सब छूट जाओगे मेडम खाना खाने गई हैं।

कमरे मे न जाने क्यो घूटन सी हो रही थी सब कुछ उडा- उड़ा सा लग रहा था। वहाँ से हर आने जाने वला अपना हमदर्द लग रहा था यह लाईन एक ख्वाब ही थी सब बे रहम थे। यही कहते हम क्या करे? यह केश मेड़म के हाथ मे हैं। जो कुछ करेंगी वही करेंगी हम कुछ नहीं कर सकते हवालात के अंदर बंद प्रतीक के मन मे जाने कितने नकारात्मक विचार पनप रहे थे इन सब के लिए जो भी वर्दी मे दिखता वही वीआईपी बनकर उस जगह घूम रहे थे। करीब घंटे भर बाद वह मेड़म फिर से आई। उसके आते ही लोग फिर से उसके हाथ पैर जोड़ने लगे प्रतीक अपनी जगह चुप शांत बैठा था वह उसे फिर नजर भरकर देखा और कहने लगी तुमहरी जमानत तो अब कोर्ट से होगी अगर नहीं हुई तो जेल चले जाना। हा भाई बाकी, के बोलो जाना चाहते हो यह सुन सभी एक ही स्वर मे बोल पड़े हाँ जाना चाहते हैं तो आठ-आठ सौ रुपे लाओ। सभी हाथ पैर जोड़ने लगे वह सबकी चालान पर्ची निकाल कर सबको बाहर निकाला आठ-आठ सौ प्लानटी के साथ जमानत पर छोड़ दिया।

वह अपनी नशीलों आखों से प्रतीक को निहारते हुए बोली और बातमीजी से बात कर लो नहीं तू भी छूट गया होता। कल कोर्ट से छूटोगे वही जज के सामने बिनती करना प्रतीक अब चुप नहीं रह सका वह सरिया से बने दरवाजे को पकड़ कर खड़ा हुआ और बोला मेड़म आज अपनी सारी प्यास जेल भेजकर बुझा लेना। तब आपकी आत्मा को शांति मिलेगी जो धारा न भी लगाना हो वह भी लगा देना कुछ छोडना नहीं।

रवि वर्मा अपर निरीक्षिक आ धमके उनके आते ही सभी के सभी अपनी-अपनी टोपी सर मे लगा कर सलामी के लिए खड़े हो गए उसमे वह मेड़म भी शामिल हुई भिंगी बिल्ली की तरह। उसके जाते ही वह फिर शेर बन गईं और प्रतीक के ऊपर दहाड़ने लगी। फोन आया कि प्रतीक को छोड़ दो उसकी तबीयत सही नहीं हैं। वह उनसे वही बात कहने मे लगी थी कि वह कल जेल जाएगा वही कोर्ट से ही छूटेगा हमने चलान नामा बना दिया हैं अब किसी भी हालत मे नहीं छूटेगा वह कल आराम से आ जाएगा आप बिलकुल न परेशान हो। वह अपनी बात पर अड़ी थी जेल जाएगा...।

उधर से काफी कुछ कहने सुनने के बाद उसने कहा ठीक हैं आप परेशान मत होना खाना देंगे मेडिकल करा देंगे आप बिलकुल चिंता मत करे हम उसकी देखभाल के लिए हैं। यह कहकर फोन काट दिया फोन रखकर कहने लगी बड़ी एप्रोच लगा दिया अब तू कुछ भी कर ले कल ही छूटेगा कोर्ट से। वह एक लड़के को आवाज दिया पानी पिलाना रे इसको वह पंखा इधर घूमा दो पंखे कि हवा पाकर मन को थोड़ा सकूँ मिला लेकिन उसके प्रति ईर्ष्य के भाव पैदा हो रहे थे। पर वह उस फोन के बाद दयावान बन गई थी खाने के लिए रेल का खाना मंगाया चाय मंगाया सेवभाव किया और कहने लगी चिंता मत करो कल कोर्ट से छूट जाओगे।

प्रतीक मन ही मन मे अब छूटू या जेल जाऊ आपने तो धारा लगा ही दिया हैं। वह कई बार प्रतीक को बड़े गौर से देखती कहती आज यही मज लो कल कोर्ट से छूट जाओगे। अब कोर्ट से छूटू या नैनी जेल से तुम्हें तो जो करना था, वह कर लिया तेरी आत्मा को तो शांति मिल गईं। इतने मे लड़का चाय लेकर आ गया पियो और मौज लो कल छूट जाओगे यह लाईन उसकी तकिया कलाम बन गई थी। सुबह के ग्यारह बजे से शाम के पाँच से छ बजे, वह घर जाने के लिए तयार होने लगी अपनी वर्दी को सही किया लोहे की अलमारी से अपनी लिखी हुई फ़ाईल व कागज को एक रजिस्टर मे सीमेट कर लोहे की गोदरेज मे रखा। दूसरे साथी को अपनी रिवाल्वर से गोली निकाल कर रिवलर के साथ सामने वाले को थमा दिया जो अभी-अभी उसकी जगह मे डीयूटी पर आया था। उसने प्रतीक के सारे कागज उसे समझा दिया और जितनी भी धारा लगी थी वह सब उसे बता कर चली गई, उंगली मे स्कूटी के छल्ले को नाचते हुए।

उसके जाते ही यार तुम भी बड़े पागल थे मेड़म के साथ क्यो अभद्रता किया? अब तुम जेल जाओगे मै भी कुछ नहीं कर सकता। वह स्वभाव से बड़ा कूल मालूम पड़ रहा था। उम्र के साथ उसका तजुर्बा अलग था। वह सभी से बहुत अच्छे से बात करता नेक सलाह देता कि कभी अधिकारी से बहस नहीं करना चाहिए गलती न भी हो तो मान लेना चाहिए। प्रतीक, साहब मांग तो रहा था कोई बात नहीं परेशान मत हो कल हम जल्दी से आपका चालान ड्राफ तयार कर देंगे। इतना कह कर वह भी उसी की तरह घूमने चले गए। जब भी घूमकर आते किसी न किसी को साथ लिए आते उसे सरकरी कानून समझा बुझा कर वापस कर देता। उसके इस तरह के ब्यवहार को देख कर लागने लगा कि लोग कहते हैं औरत का दिल पिघलता हैं वह नर्म दिल की होती हैं। आदमी कठोर दिल का होता हैं यहाँ तो शीन अलग ही दिखी।

प्रतीक अपने आप मे सब्र, बांध लिया था कि अब जो होगा कल ही होगा। शाम की तरह लग नही रहा था वहाँ सारा दिन सफ़ेद रोशनी बनी रही लेकिन अब वह जायदा गाढ़ी सफ़ेद दिख रही थी। सबकी डीयूटी सिफ्ट चेंज होने लगी थी अब उस जगह का माहोल और चेहरे सब बदल गए थे। दूर दरवाजे के पास एक बरगद का पेड़ जिसके बगल मे हनुमान मंदिर से हनुमानचालीसा पढ़ने की आवाज कानो मे पड़ी, शंख नाद हो चुका था।जीतने गए थे उससे ज्यादा कही आ गए थे जो भी आता यही पूछते कीस जुर्म मे आए हो। प्रतीक अपने मन मे खुशी की लौ जला कर दरोगा जी से बोला साहब आप देख लो। बेटा मैंने आप से कह दिया मेरे हाथ मे कुछ नहीं हैं। वह फाइल को उठा कर गौर से पढ़ा और कहने लगा अब आपकी जमानता कोर्ट से ही होगी वह मेड़म चालान सब कुछ फिट कर गई हैं। इसमे अब वह भी कुछ नहीं कर सकती कलम चल गई हैं। खाना खाओगे, नहीं, नहीं मत कर बेटा खाना खा ले। खाना से गुस्सा नहीं करते मुझे से गुस्सा कर ले, लो चाय पियो इस दरम्यान वह प्रतीक के बारे मे सबकुछ जान चुका था।

करीब साढ़े सात के आस-पास प्रतीक का भाई सतीक पहुंचा जो उन्ही सब की तरह दिख रहा था। उसने उसी दरोगा से बात की जिनके कमीज की जेब मे लगे नेम प्लेट मे महेंद्र सिंह लिखा था उनसे बात किया वह उसे भी वही फाइल दिखा कर जाने के लिए मजबूर कर दिया सतीक हसता हुआ आया प्रतीक का बैग लिया और उसे खाने के लिए खीरा व केला दिया प्रतीक सबकुछ वापस करते हुए दो खीरा एक केला ले लिया। उनको खाकर वह एक बोतल को अपनी तकिया बना कर योहि सफ़ेद बिछी टाइल मे सो गया। प्रतीक सोने का बड़ा शौकीन था आज वह काम से थका नहीं, उस वर्दी और उनके सवालो से थक कर सो गया था। अचनाक किसी की, दीवार मे सर मारने की वजह एक सोर हुआ उसी हवालात मे जिसमे प्रतीक बंद था।

जिसका सर था वह लंबा तगड़ा सावला दारू के नसे मे वह महेंद्र सिंह को भला बुरा कहने लगा। आपके लड़के लगड़े लूले पैदा होते हैं औरते आपकी कदर नहीं करती हैं आज मंगलवार हैं तेरा पूरा परिवार स्वाहा हो जाएगा। वह हसते और कहते चुप हो जा वरना अभी दो चार बेल्ट पड़ेगी सही हो जाएगा। यह बात सुन वह और भड़क गया वह कहने लगा साहब आज आप हमे मारो मै मरना चाहता हूँ मै मजदूर आदमी हूँ दिनभर सीमेंट की बोरी ढोता हूँ दो-दो ढाई-ढाई मंजिल मे सामान चढ़ता हूँ तुमको क्या उठाई गिरी के पैसे से काम चलाते हो मेरे साथ चलो एक दीन दो बोरी चढ़ाओगे तब आप भी मेरी तरह अध्धा पीकर टल्ली हो जाओगे। वह अपना सर फिर से दीवाल मे ठोक दिया यह सुन देख वर्दी ही वर्दी जाम हो गईं उनमे से एक बोला इसको अंदर ले चलो अभी इसका भूत उतार देते हैं। यह आवाज सुनकर प्रतीक थोड़ा घबराया, उसको वह झटके के साथ उसकी कमीज को खीचते हुए अंदर की तरफ ले गए एक नहीं करीब दस पाँच उसके पीछे चले गए थोड़ी देर बाद हाफ्ते हुए महेंद्र जी आए उन्होने अपनी पैंट को सही किया बेल्ट टाइट बंधा।

पता नहीं साले ये सिपाही भी किसी को भी पकड़ लाते हैं जिनको पकड़ना हैं, उनको पकड़ते नहीं सब काम चोर हैं सभी अपना पल्ला झाड़ते हैं। अब महेंद्र जी थोड़ा गुस्से मे थे। वह प्रतीक को फिर समझाने लगे की बेटा आप ऐसी गलती मत करना सो जाइए सुबह तुम भी छूट जाओगे उनकी बातो ने हौसला बढ़ा दिया था। अब तक आखो से नीद गायब हो गईं थी। रात के दो बज रहे थे। इसी दौरान न जाने कहा से गरीबो का जखीरा पकड़ लाए जो बिना टिकट थे। वह सकल सूरत से ही लग रहे थे की यह मांगने खाने वाले हैं।वह सभी महेंद्र जी से कह रहे थे हम बे कसूर हैं हमे छोड़ दो वह अब किसी को नहीं छोडना चाहता था। सब को बगल वाले हवालात मे बंद कर दिया। अब किसी को नहीं छोडुंगा इन सिपाहियो को क्या समझाउ कि आदमी देख के पकड़ा करो यह सब अब जेल जाएंगे न इनके पास पैसा हैं न जमानती।

थोड़ी देर मे एक लेडी सिपाही एक लम्बे से दुबले पतले लड़के को पकड़ लाई जो प्लेटफॉर्म मे सो रहा था महेंद्र जी ने पूछा हा भाई टिकट दिखा वह बोला साहब हम यही पास की होटल मे काम करते हैं थोड़ी देर के लिए सोने के लिए आए थे हमे छोड़ दो हमारी माँ बीमार हैं वह सुनेगी तो मर जाएगी.... जब इतना ख्याल हैं तो स्टेशन को धर्मशाला क्यो बना रखा हैं? इसे भी जेल भेजो उसे भी हावलत मे डाल दिया जिसमे प्रतीक बंद था। वह लड़का बहुत चिल्ला रहा था वह हर बात मे अपनी बीमार माँ का जिक्र करता मुझे जाने दो साहब वह मर जाएगी मर जाने दो तू जिंदा रह ले मुझे मालूम हैं तू कितना अपनी माँ को चाहता हैं? साहब लो फोन से बात कर लो अच्छा फोन भी हैं इसे भी ल इधर यह भी जमा हो गया जब छूट के आना इसे ले जाना। साहब मै मर जाऊंगा यह आवाज सुनते ही महेंद्र जी अपने बूटो को दरवाजे मे इस तरह मारा की वह काफी दूर हटके चुप-चाप खड़ा हो गया वह सब कुछ भूल चुका था शांत था वह अब कमरे मे बनी लाइटरिंग मे गया फ्रेश हुआ बाहर आया, लेट गया अब उस जगह का महोल गर्म था मेडम आप नौकरी करने आती हैं सोने आराम करने नही चलिए जाइए बाहर घूम कर आइए यह सोने की जगह नहीं हैं हम पागल हैं रात भर ऊल्लू की तरह जग रहे और आप मजे मे मजे लिए जा रही हैं अगर नहीं हैं नौकरी करने की क्षमता क्यो भर्ती हो जाती हैं फोर्स मे एक वह मेडम हैं इनको सब को बेमौफ़त मे बंद कर चली गईं हैं सर देख लेना सब हमे ही देखना हैं तुम लोग क्यो आती हो? हनुमान मंदिर से फिर आरती और हनुमान चालीसा की आवाज कानो मे आई उसी के साथ डीयूटी फिर से चेंज हुई सुबह वाले अब फिर से वापस आने लगे फिर से वही चेहरे जहन मे नाचने लगे अभी वह मेडम नहीं आई इससे पहले करीब पाँच बजे तीन सिपाही आए और बोले रे फ्रेश व्रेस हो लो अभी कोर्ट चलाने के लिए तयार हो जाइए। इतना कहकर वह बाहर की तरफ चाय पीने चले गए।

दोनों हवालातों के लोग बारी-बारी से तयार हो गए। उन सिपाहियो मे एक सिपाही बहुत बड़ी रस्सी लेके आया और सब के नाम लेकर बाहर निकालता और कमर मे रस्सी से एक गाठ बांधकर दूसरे को आवाज देते यह सिलसिला प्रतीक तक पहुंचा उसको भी रस्सी के फंदे मे फासते हुए सबसे पीछे लाइन मे लगा दिया सभी एक ही रस्सी से बंधे थे। सबके चालान कागज जो लिख पढ़कर रखे गए थे उनको भी साथ मे लिया एक सिपाही आगे-आगे दो सिपाही पीछे-पीछे कई जीना उतरने चढ़ने के बाद एक पैसेंजर मे लेकर चढ़ गए। जिस कोच मे चढ़े वह भी बिकलांग डिब्बा था लेकिन उसमे एक भी विकलांग नहीं था सारी खाली शीटों मे क्रम से बैठा दिया पर रस्सी नहीं खोला रस्सी वैसे ही बंधी रही। सभी कैदी नहीं प्लेट फॉर्म मे रेल की तरह मिलकर सभी एक दूसरे के पीछे चल रहे थे। प्लेटफॉर्म मे भीड़ तो बहुत थी लेकिन वह नजर मे नहीं चढ़ रही थी। ट्रेन भी नहीं दिख रही थी बस मन मे एक ही ख्याल था कही कोई अपना न देख ले भीड़ से नजर खुद ब खुद हटकर अंधेरे की तरफ खीच जाती यह सीन ट्रेन के चल जाने के बाद खत्म हुआ लेकिन वह पैसेंजर उसी रास्ते से गुजर रही थी जिसमे प्रतीक अपने बचपन के दिनो को गुजारा था।

प्रतीक के आंखो मे आँसू थे पालक की बरौनी मे उतरना बाकी था। सिपाही सबके कागजो को पढ़ रहे थे पढ़ने के बाद कहने लगे आप ने मेंडम से झगड़ा या अभद्रता किया था क्या? वह तुम्हारे ऊपर तीन धारा लगा रखा हैं 145,146, और 156 ये सब तो कोर्ट से छूट जाएंगे हो सकता हैं तुम्हें जेल जाना पड़ सकता हैं तुम्हारा कोई आएगा प्रतीक ने जवाब दीया हाँ तो फिर ठीक कई स्टेशन गुजरने के बाद एक सिपाही ने पूछा कौन सा स्टेशन आ गया प्रतीक ने जवाब दिया सरसौल सिपाही तुम्हें कैसे मालूम? साहब हमारा बचपन यही गुजारा हैं और आप हमे जहां तक ले चलोगे वहाँ तक हम पहले बिना टिकट इसी पैसेंजर से आते जाते थे। बचपन था मासूम थे कोई टिकट मांगता ही नहीं था। आज तो सबकुछ था लेकिन फिर भी यह दिन देखना पड़ा।

ट्रेन धीमी हुई चाय चाय यह एक बड़े स्टेशन की आवाज थी यह मेरा ही स्टेशन था जिसमे और भी प्रतीक जैसे मुलजिम चढ़े वह भी रस्सी से जकड़े हुए थे सिर्फ फर्क इतना वह तीन थे और इस रस्सी मे छह अब सिपाही की संख्या बढ़ गईं ट्रेन चल पड़ी वह सब अपनी सर्विस की बात चीत करने लगे की हम जब पढ़ते थे तो कैसे पेपर होते थे? कितना मजा आता था पढ़ने मे उनमे से एक सिपाही बोला जो शादी वर्दी मे था जिसका सावला रंग आँख लाला सर के बाल सफ़ेद वह मुजरिमों की तरफ इशारा करते हुए जितनी इनकी सब की उम्र हैं उतने शाल की हमारी नौकरी।

वह सब को बड़े गौर से देखते हुए बोला ये लड़के हमसे ज्यादा पढेलिखे हैं काबिल हैं लेकिन आज यह मुजरिम होने की वजह से हमसे बात नहीं कर रहे क्योकि यह सब मुजरिम हैं। दूसरा सिपाही एक लड़के को चिन्हित करते हुए यह रात मे बहुत अँग्रेजी बोल रहा था और मै इससे कह रहा था कि बहस मत कर कहना मान ले लेकिन नहीं माना अपने विकलांग बाप को भी बुला लिया यह देखो कैसे परेशान हैं? वह भी इसी डिब्बे मे बैठे हैं यह बात सुन उस लड़के के आंखो मे आँसू आ गए और अपनी गर्दन को नीचा करलिया एक सफ़ेद रुमाल मे अपने आँसुओ को सूखा लिया भिंगी पलक लाल पड़ गई थी। उन्ही मे से एक बोला साहब पेसाब लगी हैं सिपाही बोला झूठ मत बोलना यह रस्सी खुलने वाली नहीं यह वही कोर्ट मे खुलेगी अरे साहब हम एक-एक करके कर लेंगे अच्छा चलो दो सिपाही अपनी गन लेकर खड़े हो गए पहले एक घूसा दूसरा घूसा बारी-बारी से दोनों रस्सी के मुजरिम फ्री हुए फिर सिपाही भी फ्री हुआ अब मत बोल देना अभी आधा घंटा और लगेगा स्टेशन आने मे जहा उतरना हैं कोर्ट हैं ट्रेन एक घंटे लेट हो चुकी थी जहा नहीं भी रुकना था वह वहाँ भी रुक जाती थी।

सिपाही इस वक्त हर मुजरिम का दिमाग नाप रहे हैं उन्ही मे से एक ने पूछा कितने सत्ते छ जो रस्सी मे बंधे थे उनमे से एक बोला ककहरा सत्ते छ वह हसा और बोला दिमाग के बहुत तेज हो तो फिर फस कैसे गए? अरे तेरे ऊपर कई धारा लगी हैं तूने मेडम से क्या बत्तमीजी किया था क्या? प्रतीक नहीं सर इतना कहा था कि अब मेडम फोटो खिचेंगी यह लाइन उन्हे अभद्र लगी यह लाइन सरकरी काम मे बाधा डालती हैं। फिर अंदर जाकर फोटो भी खीचा सच बोलने की सजा हैं। अच्छा शांत बैठो ज्यादा मत बोलो इस वक्त तुम मुजरिम हो हमे मालूम हैं आप हमसे ज्यादा पढे हो।

वही कोर्ट मे जज के सामने वकालत करना यहाँ चुप शांत बैठो। अभी एक घंटा और लगेगा और भी पढ़ाई-लिखाई की बाते हुई उतने मे एक सिपाही बोला जिसका रंग सावला हाथो मे गन वह अपनी नेकर को खिड़की की मे डाल कर सूखा रहा था वह उसको अपने सर मे फसाते हुए बोला अगर रेलवे के चक्कर मे नहीं फसना हैं तो कुछ बाते बता रहा हूँ इसे गाठ बांध लो।

1 कोई भी पुलिस कर्मचारी बुलाए तो समज लो कुछ दाल मे काला हैं वहाँ से उसके आने से पहले खिसक लो।

2 उससे बहस न करो

3 कभी भी विकलांग,महिला व माल बोगी मे न चढ़ो उसमे थ्रीटायर का किराय लगता हैं।

4 फालतू गेट मे न लटको खिड़की से मत झाकों ।

5 जमीन मे बिछी पटरी को न पार करे।

6 सबसे बड़ी बात जिस तरह कि टिकट को लिए हुए उसी तरह के डिब्बे मे सफर करे

7 चढ़ते उतरते समय प्लेटफॉर्म मे बत्तमीजी न करे।

अधिकारी मिले तो उससे लड़े नहीं उसकी बात को समझो उसी मे भला हैं। अधिकारी-अधिकारी होता हैं हम लोग खुद अधिकारियों के सामने चुप रहते हैं काम कोई भी करे वह चले जाते हैं फिर से मौज करते हैं। वह इस वक्त अपने आप को बहुत ज्ञानी बन रहा था लिकिन पहले वाले सिपाही ने कह रखा था आप हमसे ज्यादा पढे लिखे हो लेकिन मुजरिम हो चुप बैठो। उसकी इस बात ने सब को रोक रखा था। इन सारी बातों के साथ रेल प्लेटफॉर्म 4 मे रुकी सभी उतरे लिकिन अब इसबार चार सिपाही आगे चार पीछे बीच रस्सी से बंधी मुजरिमों की रेल सभी एक दूसरे से सटे हुए एक दूसरे के पीछे प्लेटफॉर्म नंबर एक की तरफ लेकर चल पड़े वह जिधर से मुड़ते उधर से मुड़ते एक मुजरिम मे ने कहा साहब बाथरूम लगी हैं सिपाही बोला चले आओ मेरे पीछे आओ वह उधर गया जिधर समूहिक टोलेट की तरफ सब को लाइन से खड़ा कर दिया सभी खड़े-खड़े उसी सिपाही के साथ किया। सब हल्के होकर खड़े सिपाहियो की तरफ मुड़कर पीछे चल दिया।

यह वाला जीना कोर्ट की तरफ मुड़ रहा था हर जीने मे काले कोट वाले खड़े थे। वह हर सिपाही से कहते इनमे से इसको जमानत चाहिए वह कहते सभी को आप पूछ लो। रस्सी मे बंधे मुजरिम कहते हमे-हमे यह आवाज सुनते ही उनका नाम अपने कागज मे नोट कर लेते सिपाही से उनकी धारा को मालूम करके उनके रेट लगा देते। जो मुजरिम क़हता दूँगा वह उसे अपना ग्राहक बना लेते। यहाँ तो तहबाजारी की तरह बोली लग रही हैं थी। प्रतीक के पास भी तीन वकील आए हां भाई छूटना चाहते या जेल जाना चाहते हो वकीलो को प्रतीक के पास देख कर, सतीक ने उन सिपाहियो से कहा इनकी जमानत हो गई हैं। प्रतीक को रस्सी से आजाद कर दिया जाता हैं। सतीक अपने भाई को नजर भर कर देखता हैं, और सामने गैलरी की तरफ इसारा करते हुए जाइए वहाँ मम्मी भाभी बैठी हैं।

प्रतीक की आंखो मे आँसू भर आए वह उस गलियारे की तरफ बढ़ा और माँ उधर से बढ़ चली प्रतीक अपने आंखो के आँसू को छुपते हुए बढ़ता रहा माँ हसी और क्रोधित होते हुए पूछा कौन सी पुलिस वाली ने पकड़ा हैं बता मुझे, मै उससे अपने बेटे का कसूर पूछ तो लू क्या किया हैं? चलो उधर चलो आवाज अभी गले से निकल नहीं रही थी। वह अपनी माँ और बीबी के बीच खाली जगह मे मै बैठ गया लो पानी पियो कोलड्रिंक पियोगे नहीं। मंजन ब्रेश कर लो ब्रस गाड़ी मे रखा हैं। माँ ने कहा पापा को बता दो की हम घर मे हैं यह बात सुन प्रतीक ने कहा नहीं हम पापा से झूठ नहीं बोलेंगे बाद मे बात करता हूँ उनको सच बताऊंगा की हमे दो दिन से आरपीएफ वालों ने पकड़ कर रखा था कोर्ट की जमानत से छूटा हूँ। प्रतीक की बात को सुनकर माँ और बीबी ने एक ही स्वर मे कहा ठीक हैं।

प्रतीक जिस रस्सी से खुल कर आया था उसी मे अभी पाँच बंधे थे उसमे से एक चिल्ला रहा था मुझे बचा लो मेरी माँ घर मे बीमार हैं वह मर जाएगी साहब कोई तो बचा लो कोई नहीं सुन रहा था इतने मे वकील आया बोल तेरे पास कितने पैसा हैं उसने अपने नेकर के नेफे से एक हजार रुपए निकाल बोला साहब यह हैं। बाकी बाद मे कर्जा अदा कर दूँगा आपके घर काम कर दूंगा वह तड़प रहा था, वह चिल्ला रहा था। उसका मुंह सूख चुका था फिर से वकील आया और पैसे लेकर उसको भी रस्सी से अलग कराया वह ठहरकर सास लिया अपने आंखो मे आए आँसूओ को पोछा और कहने लगा अगर मै जेल चला जाता तो मेरी माँ मर जाती मेरा बाप बचपन मे मर गया था मेरे छोटे-छोटे भाई हैं। एक बहन की शादी करना हैं। उसे के लिए कमाने बाहर आय हूँ। अभी बाकी के चार अपनी किस्मत और सरकार के अधीन रहकर उसी रस्सी मे लिपटे हुए उन्ही सिपाहियो को देखे जा रहे थे। एक बुजुर्ग जिनकी उम्र 60 से ऊपर वह अपने पिता का नाम गौरी शंकर लिखा दिया था डर की वजह से जब सिपाही ने पूछा आपके बाप का नाम क्या हैं तो उसने मैकू बताया तो सिपाही उसे डाटते हुए बोला तेरे बाप का नाम गौरी शंकर है यही नाम बताना बुजुर्ग जी साहब।

एक लड़का अपनी कमीज को फाड़ दिया जब सिपाही ने कहा जेल जाओगे क्योकि तुम्हारी जमानत कोई नही ले रहा हैं वह चिल्लाने लगा आप लोगो ने हमसे झूठ बोला की तुम कोर्ट से छूट जाओगे तो जेल क्यो मैंने क्या कसूर किया हैं? क्या हम कातिल हैं? स्टेशन के पास पेशाब करने की इतनी बड़ी जुर्म तो जगह-जगह शौचालय क्यो नहीं बनवाते? सब लोग करे तो माफ खुद मै रोज देखता हूँ इन्ही सिपाहियो को डीयूटी के समय वही पटरी किनारे पेसाब करते हैं और हमने किया तो जेल जबकि वहाँ पर कोई नहीं था मेरे सिवा और मुझे पकड़कर मुजरिम बना दिया। वह खूब चिल्लाया उसकी इस आवाज को दबाने के लिए उसे वहाँ से बाहर ले कर चले गए उसकी हर चीख उस जगह की कान बन गई थी, सभी कहते कह तो सही रहा है लेकिन सुन कौन रहा हैं? वकील आते और पूछते पाँच सौ रुपया हैं वह कहता पाँच रुपया होता शौचालय न चला जाता जेल जाने से तो बच जाता। आप पाँच सौ रुपया मांग रहे हो। ले मरी किडनी बेच दो तुम्हें पैसा मिल जाएगा हमे जेल से मुक्ति सिपाही ने कहा कम बोल तीन महीने बाद छूट जाएगा।

कई लोग अंदर बाहर करने मे लगे थे अब प्रतीक की चालान पर्ची मिल गई वह अब पूरी तरह आजाद हो गया था लेकिन उसके मन मे एक पीड़ा का भाव पनप रहा था जो उसके साथ रस्सी मे बंध कर आए थे और जेल चले गए। वह स्टेशन के बाहर अपने परिवार के साथ बाहर निकला इस माहोल ने उसकी आत्मा और मान सम्मान को बहुत ठेस पहुंचाया वह द्र्शय वह शोर सिपाही, वकील, अधिकारीयों की आवाज उसके कान और जहन को हिला कर रख दिया था। वह सब याद आ रहा था जो हवालात के अंदर से अपने मन मे बनाया था परिवार के साथ होने के बावजूद भी अभी वह रस्सी उसकी कमर को कसे जा रही थी।

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