लाल छतरी वाली लड़की - डॉ दिनेश शर्मा

03 मार्च 2020   |  डॉ पूर्णिमा शर्मा   (297 बार पढ़ा जा चुका है)

लाल छतरी वाली लड़की - डॉ दिनेश शर्मा

डॉ दिनेश शर्मा के यात्रा वृत्तान्त की एक और कड़ी... बहुत सुन्दर और मार्मिक...

लाल छतरी वाली लड़की : दिनेश डाक्टर

सबसे पहले मैंने उसे शाम के समय सड़क के किनारे बने मंदिर की सीढ़ियों के पास देखा था | हाथ में फूल, अगरबत्ती लिए वह अपने आराध्य की प्रतिमा के सामने आंख बन्द किये बड़े श्रद्धा भाव से चुपचाप कुछ फुसफुसा रही थी | मैं लंबी वाक से होटल की तरफ लौट रहा था | थोड़ा थक गया था | मंदिर के पास बने गोल फव्वारे के पास पत्थर की बैंच पर बैठ कर समुद्र के पार डूबते सूर्य को देखने लगा | तभी वो आयी और बिना इधर इधर देखे अपनी पूजा में तल्लीन हो गयी | लाल रंग की एक छोटी सी छतरी उसके जुड़े हुए बांये हाथ में झूल रही थी | मैं वहीं बैठ कर कनखियों से उसको प्रतिमा पर माल्यार्पण करते, केलों का गुच्छा अर्पित करते , अगर बत्ती जला कर एक मिट्टी के गुलदान में खोंसते देखता रहा | वो छरहरे जिस्म, लंबे सीधे रेशमी बालों और गोरे रंग वाली एक आकर्षक लड़की थी | उसकी उम्र का अंदाज़ा लगाना आसान नही था | वो पच्चीस से पैंतीस के बीच कहीं भी हो सकती थी | लहरों के पार दूर क्षितिज पर डूबते गहरे लाल रंग के सूरज के सौंदर्य ने मेरा ध्यान पूरी तरह खींच लिया था | वापस पलट कर मंदिर की तरफ देखा तो वो वहां नहीं थी | उसके चढ़ाए फूल और फल वहीं थे, अगर बत्तियां धुआं छोड़ते धीरे धीरे जल रही थी |

अगले रोज़ रात आठ बजे शहर के दक्षिणी छोर पर स्थित एक प्रसिद्ध रेस्तरां में खाना खाने पैदल ही निकल पड़ा | रास्ता समुद्र के किनारे किनारे उस इलाके से होकर गुज़रता था जहां हर उम्र की लड़कियां ग्राहकों की प्रतीक्षा में लाइन से खड़ी रहती थी | हालांकि अंधेरा घिर आया था पर सड़क के पार बनी दुकानों की तेज़ रोशनी लड़कियों के पाउडर, लिपिस्टिक और मेकअप पुते चेहरों को साफ साफ दिखा रही थी | शराब के नशे में झूमते लोग रुक रुक कर मोलभाव कर रहे थे | सब कुछ देखता समझता चला जा रहा था कि दो पेड़ों के झुरमुट तले एक हाथ पर लटकी छोटी सी लाल छतरी नज़र आयी | ये वो ही थी | कल वाली लड़की | तो क्या ये भी ? परम्परागत आस्थाओं से कंडीशन्ड माइंड को एक झटका सा लगा | वो किसी ग्राहक से सौदेबाज़ी कर रही थी | कनखियों से देखता आगे बढ़ गया |

खाना खाकर वापस लौटा तो वो वहां नहीं थी | होटल पहुंचकर देर रात अजीब अजीब से खयाल आते रहे कि ये क्या मांगती होगी अपनी पूजा में | खूब धंधा हो - पैसे वाले बहुत सारे ग्राहक मिलें |

एक बरस बाद काम के सिलसिले में फिर उसी शहर लौटना हुआ | शाम को अपने पसंदीदा रेस्तरां में होटल से पैदल ही उसी रास्ते से निकलाl उन्हीं दो पेड़ो के झुरमुट के पास वही छोटी सी लाल छतरी हाथ में पकड़े चुस्त पैंट में खड़ी थी | इस बार अकेली थी | हमारी नज़रें टकराई | उसने मुस्कराकर हैलो कहा | मैंने भी मुस्कराकर हल्की सी गर्दन हिलाई और आगे बढ़ गया | वापसी में फिर उसी रास्ते से लौटना था | वो अब भी वहीं खड़ी थी | उसने फिर उम्मीद भरी नज़रों से मुझे ताड़ा और फिर मुस्करा कर हैलो कहा | इस बार मैं रुक गया | टूटी फूटी अंग्रेजी में बात शुरू हुई | मैंने पूछा कि क्या हुआ कोई ग्राहक नहीं मिला | उसने बताया धंधा बड़ा मंदा है | पता नहीं क्यों टूरिस्ट बहुत कम आ रहे हैं - आज एक भी ग्राहक नहीं मिला | मैंने पूछा आज मंदिर में अगरबत्ती जला कर फूल और केले चढ़ाकर मन्नत नहीं मांगी | इस बार वो थोड़ा चौंक कर बोली - क्या तुम मेरा पीछा करते हो | मैंने हंस कर बताया कि एक साल पहले मैं उसे समुद्र किनारे वाले मंदिर में अत्यंत श्रद्धा और तन्मयता से पूजा करते देख बड़ा प्रभावित हुआ था |

वहीं पास ही पत्थर की बैंच पर बैठ कर बात होने लगी | उसने पूछा कि मैं कहाँ ठहरा हूँ | मेरा होटल पास ही था |

'तो मुझे ले चलो - जो मर्जी आये दे देना | आज सुबह से ऐसे ही खड़ी हूँ -एक भी ग्राहक नहीं पटा |'

'मेरी पत्नी होटल में मेरा इंतज़ार कर रही है' मैं झूठ बोलकर उठ खड़ा हुआ और चल पड़ा |

दो बरस बाद फिर काम के सिलसिले में उसी शहर में जाना हुआ | अपने पुराने होटल ही में रुका | अगली सुबह जब नाश्ता करने के लिए लिफ्ट से बाहर निकला तो देखा तो बांये हाथ पर छतरी लटकाए वो लाबी में किसी से बात कर रही थी | फिर वो रेस्टोरेंट की तरफ गयी और कुछ बात करके होटल से बाहर निकलने को बढ़ी | वो मुझे पहचान नहीं पायी | मैं उसकी तरफ बढ़ा तो रुक गयी |

'आज समुद्र किनारे वाले मंदिर में केले फूल चढ़ाकर अगरबत्तियां जलाई ?' मैंने मुस्कराते हुए पूछा तो फौरन पहचान कर हँसने लगी |

'तुम यहीं ठहरे हो'

'हाँ ! कल ही आया हूँ | और तुम यहाँ कैसे ?'

'रात भर एक ग्राहक के साथ थी | अभी नीचे उतरी हूँ | भूख लगी थी तो सोचा यहीं नाश्ता कर लूँ | नाश्ते का बुफे तो बहुत बढ़िया है पर मेरे लिए बहुत महंगा है | मेरे एक शार्ट टाइम कस्टमर की पेमेंट जितना' उसने कुछ निराश से स्वर में कहा |

मैं क्योंकि अपने क्लाइंट के सौजन्य से बिजनेस सूट में अकेला ही ठहरा हुआ था तो मेरे पैकेज में दो आदमियों का मुफ्त ब्रेकफास्ट शामिल था |

'चलो तुम्हें ब्रेकफास्ट कराता हूँ| मेरे पैसे नहीं लगेंगे |'

'सच तुम्हें फ्री मिलेगा - मेरे लिए भी' कहती हुई वो मेरे साथ हो ली |

लगा कि बहुत भूखी थी | चार बड़े साइज़ की प्लेट भर कर सब कुछ खा गयी | उसकी कद काठी और कमर से लगा हुआ पेट देख कर मुझे यकीन ही नहीं हुआ कि वो इतना खा लेगी | चुपचाप खाते हुए बीच बीच में मुस्कराते हुए मेरी तरफ देखती रही |

'तुमने बहुत कम खाया | और तुम इतनी सिगरेटें क्यों पीते हो' उसने गर्म काफी का लंबा सिप लेते हुए सवाल किया |

मैं मेज पर बांयी तरफ करीने से रक्खी उसकी छोटी सी लाल छतरी को देख रहा था जो काफी पुरानी पड़ कर मटमैली हो गयी थी और कई सारे छेद भी उसमें हो चुके थे |

'तुम हमेशा ये छतरी अपने साथ क्यों रखती हो ? न तो इस शहर में ज्यादा बारिश ही होती है और न ही धूप भी इतनी तेज़ निकलती है' उसके सवाल को अनसुना करते हुए मैंने पूछा |

काफी पीते पीते उसने कप नीचे रख दिया और छतरी उठा कर दिल से लगा ली | 'मेरी मां की निशानी है | वो कहती थी कि जब तक ये छतरी मेरे पास रहेगी और समुद्र के किनारे वाले मंदिर के देवता का आशीर्वाद रहेगा मुझे कभी भी ग्राहकों की कमी नहीं रहेगी | जितने दिन मां धंधे में रही ये छतरी ही उसकी निशानी थी | हालांकि वो अब धंधे में नहीं है पर ये बात अब भी सही है | लड़कियां पूरे पूरे दिन खड़ी रहती है तब उन्हें मुश्किल से एक या दो ग्राहक मिलते है | और मेरा तो मंदे भी धंधा अच्छा चलता है |हमेशा ग्राहक मिलते ही रहते है | साल में शायद एक या हद से हद दो दिन ही कभी परेशानी के होते हों ' उसने जैसे खुद से ही कहा |

"और तुम्हारा परिवार, पति बच्चे वगैरह" मैंने कहानी में दिलचस्पी लेते हुए पूछा |

" पति ! बच्चे !!' कह कर वो हंसने लगी | उसकी खूबसूरत आंखें, दंतपंक्तियाँ और भरे हुए ओठ और भी खूबसूरत लगने लगे|

"आप भी समझ नहीं पाए | दरअसल कोई भी नहीं समझ पाता | मैं लेडी ब्वाय हूँ | मतलब आधी लड़की और आधा लड़का | तुमने कभी ट्राई नही किया ? "

जैसे ही उसने देखा कि मेरी हैरान निगाहें उसकी छाती के खूबसूरत भरे भरे उभारों की तरफ हैं तो वो हंस कर बोली या बोला "ये सिलिकॉन हैं - सर्जरी से करवाये हैं- काफी पैसे लगे थे दस बरस पहले"

तभी मेरा सेल फोन बजने लगा | क्लाइंट का फोन था | वो होटल के बाहर कार में इंतज़ार कर रहा था | "तुम्हें तसल्ली से जितना खाना है खाओ - मुझे तुरन्त जाना है" कह कर घबराया सा बाहर निकल आया | पलट कर देखा तो अत्यंत कृतज्ञ और विनम्र भाव से वो मुझे हाथ जोड़कर नमस्कार कर रहा/रही थी |

https://shabd.in/travel/112345/lal-chhatr-wali-ladki-dinesh-doctor

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