"दो जून की रोटी"

09 मई 2020   |  जानू नागर   (1698 बार पढ़ा जा चुका है)

"दो जून की रोटी"
न पेट होता, न रोटी का झगड़ा होता।
रोटी के स्वाद अनेक, पर पेट एक है।
हाथ मे रोटी, सब के कर्म की है रोटी ।
अमीरी गरीबी की पहचान है यह रोटी।
फ़िल्म में रोटियां की दास्तां निराली है।
जग संसार मे रोटी की कहानी निराली।
यह रोटी मौत की सौदागर बन गई है कही।
घर द्वार जग संसार का बटवारा है रोटी।
मानव भवसागर में जिक्र है रोजी रोटी का।
यह रोटियां ही जी जान से कमाई जाती है।
मौत के साथ रेलवे ट्रैक में बिखरी नही देखी रोटियां।
यह मंजर भी अजीब है चलते राह में सुलाती है रोटियां।

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