सालज़्बर्ग में आख़िरी दिन - अप्रैल 12-18, 2018 - दिनेश डाक्टर

28 जुलाई 2020   |  दिनेश डॉक्टर   (316 बार पढ़ा जा चुका है)

सालज़्बर्ग में आख़िरी दिन - अप्रैल 12-18, 2018 - दिनेश डाक्टर

सालज़्बर्ग में आख़िरी दिन - अप्रैल 12-18, 2018

साल्ज़ाश नदी के किनारे बसे इसी पुराने शहर के दूसरे छोर पर एक भव्य और खूबसूरत प्राचीन केथेड्रेल था । कुछ प्रार्थना जैसी हो रही थी । मैँ भी बन्द आंखों से शांत होकर बैठ गया । थोड़ी देर बाद वहां से निकल कर लव लॉक ब्रिज के पास से साल्ज़ाश नदी के किनारे बसे पुराने शहर का जल मार्ग से क्रूज़ कराने वाली एक बड़ी बोट में सवार हो गया। जो साल्जबर्ग कार्ड मैंने खरीदा था, यह क्रूज़ भी उसी में शामिल था । डेढ़ घंटे तक बड़ी बोट में सवार सभी टूरिस्ट्स क्रूज़ का मज़ा लेते रहे । दोनों क्रूज़ गाइड्स ने बड़ी अच्छी तरह जर्मन और अंग्रेजी भाषा में हर बिल्डिंग और रास्ते में पड़ने वाले सभी पुलों के बारे में बड़ी विस्तृत जानकारी दी । ज्यादातर पुल लगभग पांच सौ साल पुराने थे । बिल्डिंग्स भी हालांकि बहुत पुरानी ही थी फिर भी कई बार उनका जीर्णोद्धार हो चुका था । गाइड्स यह बताना भी नही भूले कि नदी के किनारे दूर तक बसे वे मकान शहर के सबसे महंगे इलाके में स्थित हैं और पुराने वक्त से ही उनमें बड़े अमीर व्यापारी और राज परिवार के खास लोग ही रहते आये हैं ।

धीरे धीरे एक मोड़ काट कर क्रूज़ बोट शहर की बस्ती से बाहर निकल आयी । अब साल्ज़ाश नदी की मीलों लंबी सीधी धार के ठीक सामने बर्फ से ढकी वही ऊंची पर्वत श्रंखला नज़र आ रही थी, जिस पर आज सुबह ही मै केबल कार द्वारा हो आया था । दृश्य बहुत सुंदर और अप्रतिम था इसीलिए सब पर्यटकों के कैमरे खटाखट हरकत में आ गए । मैंने भी अपने कैमरा फोन से कई तस्वीरें खींची । थोड़ा आगे जाकर क्रूज़ बोट वापसी की यात्रा पर रवाना हो गयी । इस बार गति थोड़ी तेज़ थी क्योंकि गाइड्स पहले ही सब कुछ दिखा चुके थे । वापस लव लॉक ब्रिज के पास पहुंचकर बोट के कैप्टन ने पर्यटकों के मनोरंजन के लिए बोट को कई बार तेज़ गति से गोल गोल उल्टा सीधा घुमा कर अच्छा खासा थ्रिल पैदा किया और बोट को धीरे धीरे किनारे लगा दिया ।

साल्जबर्ग में आज मेरी आखिरी शाम है । कल सुबह दस बजे मुझे विएना के लिए ट्रेन पकड़नी है । लगभग सारी खास खास जगहें देख ही ली हैं । काफी देर नदी के किनारे इधर उधर घूम कर पुराने शहर को और गहराई से देखता रहा । थक गया तो वापस होटल आकर सो गया ।

अगली सुबह जल्दी उठ कर पैकिंग कर ली । ऐसी यात्राओं में सामान जितना कम हो उतना ही सुभीता रहता है । तीन जोड़ी अंतर्वस्त्र या अंडर गारमेंट्स, तीन कमीज़ें, दो जोड़ी जुराब, एक अदद आल वेदर जैकेट और एक जीन बहुत है । पर्यटन का जज़्बा अच्छा जंचने दिखने का मोहताज नही होता । कपड़े ऐसे हों कि प्रेस वगैरा करने की ज़रूरत न हो । बस धोओ और पहन लो । कपड़े धोने सुखाने की मशीनें अक्सर मिल ही जाती हैं । अब तो जब से एयर बी एन्ड बी मतलब ऑनलाइन बेड एंड ब्रेकफास्ट सर्विस का कंसेप्ट आया है तो बड़ी सुविधा हो गयी है । किराया तो खैर होटल से कम होता ही है साथ ही कपड़े धोने की मशीन, फ्रिज, पूर्ण सज्जित रसोई की सुविधा भी मिल जाती है । विएना और प्राग, जो मेरे अगले मुकाम थे, वहाँ के लिए मैंने एयर बी एन्ड बी का ही आवास बुक कर लिया था ।

ट्रेन स्टेशन क्योंकि पंद्रह बीस मिनट की पैदल की दूरी पर ही था, बैक पैक कमर पर लादा और आठ बजे ही होटल से चेक आउट कर निकल पड़ा । खूबसूरत साल्जबर्ग को छोड़ते हुए मन थोड़ा उदास सा हो आया । जब से मेरे महान भारत की जनसंख्या बेसाख्ता बढ़ी है और सोशल सेनिटेशन की जागरूकता के अभाव में जगह जगह कूड़े और गंदगी के भद्दे अनियंत्रित ढेरों के साथ साथ सामाजिक व्यवहार में बदतमीज़ी, भोंडेपन और भद्देपन का बोलबाला हुआ है तब से जैसे ही ऐसे खूबसूरत स्थलों पर पहुंचता हूँ , वहीं बसने का मन होने लगता है ।

खैर !!! यूरोप घूमना है तो ट्रेन से ही घूमने का मज़ा है । अपने देश में तो ट्रेन यात्राओं का सौम्यतापूर्ण रोमांस बेसाख्ता बढ़ती जनसंख्या की वजह से सालों पहले ही खत्म हो चुका है । भले ही बुलेट ट्रेन चला दीजिये या सुपर लक्जरी गाड़ियां, हर सरकारी चीज़ को मिस यूज़ करने की, उसे नष्ट करने, गंदी करने और उसमे चोरी करने की जो घटिया मानसिकता दिनों दिन बढ़ रही है , उसके चलते सब अच्छे प्रयास नैराश्यपूर्ण अवसाद की भेंट चढ़ जाते हैं ।

सालज़्बर्ग में आख़िरी दिन - अप्रैल 12-18, 2018 - दिनेश डाक्टर
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