हार कर घर कर गई ।

13 फरवरी 2019   |  जानू नागर   (62 बार पढ़ा जा चुका है)

हार कर घर कर गई ।

हार कर घर कर गई ।

बना रहा था याद मे उसकी तस्वीर जो कभी मिली नहीं।गुम था उसी की यादों मे जो कभी बोली नहीं। चाहत थी उसे पाने की फूलो की तरह, वह फूल नहीं, माला बन गईं न जाने किसके गले का हार बन गई। हार गया उसे भी हार मे। हार के बगीचे मे बैठे सोचता रहा उस हार के बारे मे जो कभी अपना हुआ नहीं । रात भी गुजर गई ख्वाबो के साए मे, ऐसे ख्याल इसी महीने मे आते हैं। जब घर के कोने मे रखे गमले मे फूल निकल आते हैं । दूर पार्क मे एंटी रोमियो नज़र आते हैं । अभी भी घर कर जाती हैं उसकी बाते जब वह मलहम लगाने आती हैं इस उभरती तस्वीर मे।

हार (हार, गले का हार, खेत खलियान, बगीचा)

घर ( घर, किसी की बात का लग जाना, घाव)

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