जुबा चुप क्यो?

14 अक्तूबर 2019   |  जानू नागर   (4307 बार पढ़ा जा चुका है)


जुबा चुप क्यो?

आपकी खामोश जुबा ने ,महफ़िल की नज़रों में चोर बना दिया|

ताकते रहे आपकी नज़रों को, कभी तो इधर उठेगी, कुछ कहेंगी|

ता उम्र साथ देने का वादा करती रही, खुशियों के फूल भरती रही|

खुशियों के फूलो को संभाला बहुत, आपकी एक मुस्कान के लिए|

साथ जीने मरने के वादे करते रहे तुमसे, रोज प्यार पाने के लिए |

लड़ते रहे उस ज़माने से, जिस ज़माने मे पलते बढ़ते रहे हम दोनों |

छोड़ दो अब ये खामोशी वरना, ले डूबेगी तुम्हें एक दो पल के लिए|

रहने दो हमे भी जिंदा, तोड़ अपनी खामोशी को जहर न बनने दो|

पी गए गर महफिल मे इस जहर को, मरने से तुम ना रोक पाओगी|

फिर कही भूले बिसरे गीतो में, गुनगुनाओगी हमे अपनी जुबा से|

कहना चाहती हैं नजरे, इन्हे चोर ना बनाओ इस महफ़िल में|

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