किन्नर नहीं दीदी हूँ।

15 अक्तूबर 2019   |  जानू नागर   (419 बार पढ़ा जा चुका है)

किन्नर नहीं दीदी हूँ।

पो... सरपट रेल चली छुक-छुक पो...

चटाक पटाक ताली बजाती दीदी आई|

अरे वो जीजा शाली को ध्यान दो,

चुलबुला लड़का बोला किन्नर तो लगती नहीं हो|

अरे बेटा किन्नर को छोड़ बुआ हूँ तेरी,

सामने बैठे युवक का नोच गाल क्या सोच रहा हैं?

दे-दे दस पाँच रुपया तेरा भला होगा, सफर सुहाना होगा|

घर जाते ही बी॰बी बच्चों का प्यार मिलेगा |

खड़े बुड्डे ने कहा थोड़ शर्म खाओ,

खड़ा रह बुड्डे तेरा दिमाग सठिया गया हैं,

हम किन्नर नहीं दीदियाँ हैं|

दीदियो को देखसुन सब शर्मा गए,

उनकी हरकते किन्नरो से कम ना थी|

सिर्फ फर्क इतना किन्नरो की आवाज ना थी|

हर मुसाफिर से रिस्ता बनाती कहती हम दीदी हैं|

रख बेशर्मी मे पैर,बन दीदियाँ कमाने खाने लगी|

अगर कोई कुछ कहता उन्हे वह चुप कराती,

कहती हम किन्नर नहीं दीदियाँ|

अगला लेख: जुबा चुप क्यो?



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
सम्बंधित
लोकप्रिय
12 अक्तूबर 2019
10 अक्तूबर 2019
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x