बीत रहा दशक

04 नवम्बर 2019   |  मंजू गीत   (481 बार पढ़ा जा चुका है)

एक दशक बीतने वाला है, बहुत कुछ बदल गया है, बदल रहा है। अगले दशक में जाने से पहले एक नजर देख ले। ये दशक बेटियों की दहशत और आदमी की वहशीपन की आबादगी का रहा। 16की निर्भया और दुधमुंही बच्चियों के जिस्म को नोचने का रहा। नोटों से गांधी गायब नहीं हुआ, बस ये शुक्र रहा। नोट गायब करने की साजिशों का रहा। कितने ही जवान भेंट चढ़े? राजनीति, कूटनीति, दहशतगर्दी की। 2014 में बना प्रधानमंत्री 2019 में भी बना रहा। देश विदेश घूमता रहा और नयी, नयी नीतियां स्वदेश में लागू कर छाया रहा। देशभर में बेहिसाब कारोबार बंद हो गये, गरीब और गरीब बनता रहा। सोने का भाव बढ़ता रहा, आर्थिक मंदी बढ़ने लगी। संत, महात्माओं के चरित्र हनन उजागर हुए। भक्तों की आंखों का नूर फिका हुआ। देश के गांवों, कस्बों, शहरों, कालोनियों की सड़कों के गढ्ढे भर नहीं पाये, चांद पर जाने को मचलता रहा। खुदाई, कटाई चलती रही, मूरतों की ऊंचाई बढ़ती रही। युवा भविष्य की सोच, अवसाद में धंसता रहा। पकोड़े तलने के व्यवसाय मास्टर डिग्री वालों के लिए रोजगार रुप में बताया गया। किस्तों पर लिये वाहन चालान हाथ में आते ही गायब हो गए। दहेज में मिली बाईक, कारों के चालान ससुराल में भिजवाये गये। खुद का पैसा हाथ से निकल, ना जाने कहां गया। प्रदूषण को नापने के पैरामीटर ऊंचे हो गये। गरीब की पन्नी बंद हो रही। कुरकुरे, चिप्स की पन्नी खाने को सेफ कर रही। ये दशक कुछ यूं गुजर गया। कोई शादी कर के फंस गया, कोई बिता जिंदगी गुजर गया।



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