लघुकथा ............वीरानगी

02 दिसम्बर 2019   |  SURENDRA ARORA   (4135 बार पढ़ा जा चुका है)

लघुकथा


वीरानगी



" तो फिर तूने उनका पीछा किया ! "

" हां किया , मेरे पास और कोई चारा नहीं है ।"

" कितनी दूर तक गयी ? "

" जब तक कि वे मुझसे औझल नहीं हो गये ।"

" अगर उन्हें पता लग गया तो ?"

" तो क्या ? मैं उन्हें एसा सबक सिखाऊँगी कि सारी ऊमर याद रखेंगें " वो बहुत आवेश में थी ।

" तुझे पूरा यकीन है कि वे किसी अफेयर में हैं ? "

" और क्या ! एसे ही थोड़े कोई अपने बीबी - बच्चों को बिना बताये अचानक गायब हो जाता है ? " उसकी आवाज भर्राने को थी और आंखों से आँसूं टपकना चाहते थे ।

"

"चल मैं तेरी चिंता से एग्री करती हूँ। कुछ न कुछ मामला है जरुर । पर क्या है ,इस बारे में विश्वास से कहना कठिन है ।" सहेली ने दिलासा देने की कोशिश की ।

" अरे बड़े दिल - फेंक हैं ,क्या मैं जानती नहीं ? पटा लिया होगा किसी तितली को ,या आ गये होंगें किसी कुल्टा के चक्कर में । आजकल बहुत भागी फिरती हैं मुफ्त के सैर - सपाटे वालीयां ! सोचती हैं , क्या बिगड़ेगा ? यही सही ।" आवेश उसके चेहरे पर आग की तरह फैला हुआ था ।

" अभी तक पक्का तो हुआ नहीं कि तेरे मियां का किसी से कोई चक्कर है पर हो सकता है ,तेरी बात ठीक भी हो , इससे मैं इन्कार नहीं करूंगी । "

सुनकर , वो रोने लगी ।

" देख रोने - धोने से तो कुछ भी हल निकलने से रहा । अगर घर में तूफान खड़ा किया तो तेरे हसबेन्ड तो अपसेट होंगें ही ,तू भी चेन से नहीं रह पायेगी ।अच्छे - भले घर की छत में दरारें जरुर पड़ जायेंगी और दरारों वाले घर आखीर में ढह ही जाते हैं । "

" तो मैं करूं क्या । घर की शान्ती के नाम पर उनका छिछोरापन बर्दाश्त करती रहूँ । ये नहीं चलेगा । " उसका गुस्सा चरम पर था ।

" मैं तेरी चिंता समझ सकती हूँ । पर तेरे दिमाग में जो हल है ,वो भी कोई ठीक हल नहीं है ,ये तू भी समझ ले । " सहेली अब भी अपनी बात पर दृढ़ थी और उसकी रुआसी आंखोंं में प्रश्न उभरे हुए थे ।

" देख , अपना आपा और रूटीन खराब मत कर । यदि एसी कोई बात है भी ,जो तुझे पसंद नहीं है तब भी तू उनको समय दे , अन्तराल दे । उन्हें उनके अच्छे या बुरे अनुभवों से होकर गुजर जाने दे । इतना ही नहीं ,उनकी पसंद - नापसंद की भागीदार बन । एक दिन वे तुझसे अपने मन की बात खुद ही खोल देंगें , हैं तो तेरे ही न । "

" मेरे लिये ये काम मुश्किल है । वे मेरे हैं तो बस मेरे ही हैं । "

" यही तो मुश्किल है , जिसे समझना है। हम पिंजरा क्यों बने । पिंजरे में तो जानवर रहते हैं या रह सकते हैं इन्सान नहीं । हर कोई स्पेस चाहता है । स्पेस से गुजर लेने के बाद तो हर एक को अपने आशियाने में ही आना होता है ,अपनी ही छत के नीचे । " सहेली ने एक अजीब सी सच्चाई से उसे रुबरु करवाने की कोशिश की ।

वो अचरज भरी नजरों से उसे देखती रही ।

"ये तो मैने सोचा ही नहीं । तूने ये सब कहां से सीखा ? "

" सीखना कहां से है ! इसी दुनिया में होता है सब कुछ । ये तो हमारी मर्जी है कि हम देखना क्या चाहते हैं ।"

वो अब मुस्कुरा रही थी ।

" चल , रेडी हो जा । कहीं दूर विराने में चलते हैं , हमें भी तो स्पेस चाहिये । "


सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा

डी 184 ,श्याम पार्क एक्सटेंशन ,साहिबाबाद , 201005 (ऊ प्र )

02/12/2019

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